Connect with us

India

अलीगढ़ के टीके नोएडा में: अवैध था जेपी ग्रींस में लगा कैंप, आयोजकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज

Published

on

आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Sun, 06 Jun 2021 10:29 PM IST

सार
टीकाकरण कैंप को लेकर एफआईआर दर्ज होने का देश में यह पहला मामला है। हालांकि सीएमओ, एसडीएम और एसीपी की संयुक्त जांच करने वाली टीम ने पाया कि मई के अंतिम सप्ताह में लगाए गए टीकों की वायल का बैच नंबर अलीगढ़ के नाम पर अलॉट था। जांच में यह पुष्टि नहीं हो सकी कि कैंप में 187 लोगों को लगाए गए सभी टीके वास्तव में असली थे या उनमें पानी भरा था।

ख़बर सुनें

ख़बर सुनें

आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अपनी जांच में पुष्टि कर दी कि ग्रेटर नोएडा की जेपी ग्रींस सोसाइटी में कोरोना टीकाकरण के नाम पर जो कैंप लगाया गया था, वह पूर्णत: अवैध था। बगैर अनुमति के देश के सबसे महत्वपूर्ण टीकाकरण कैंप को आयोजित कराने और लापरवाही बरतने पर आयोजकों के खिलाफ बीटा थाने में एफआईआर दर्ज करवा दी गई है। पूरे देश में यह पहला मामला है जब कोविड टीकाकरण कैंप की संदिग्धता पर एफआईआर दर्ज हुई है।सीएमओ, एसडीएम और एसीपी की संयुक्त जांच करने वाली टीम ने पाया कि मई के अंतिम सप्ताह में लगाए गए टीकों की वायल का बैच नंबर अलीगढ़ के नाम पर अलॉट था। जांच में यह पुष्टि नहीं हो सकी कि कैंप में 187 लोगों को लगाए गए सभी टीके वास्तव में असली थे या उनमें पानी भरा था। यह पुष्टि इसलिए नहीं हो सकी कि जो वायल टीका लगाने के बाद तीन दिनों तक बचा कर रखनी जरूरी होता है वो नष्ट कर दिया गया। पूरे मामले की जांच रिपोर्ट नोएडा के जिलाधिकारी को सौंप दी गई है। इस बात की जानकारी मामले की जांच कर रहे मुख्य चिकित्सा अधिकारी नोएडा डॉक्टर दीपक ओहरी ने दी।सीएमओ बोले-आयोजकों पर कड़ी कार्रवाई की सिफारिशइस पूरे मामले की जांच कर रहे मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपक ने बताया कि उनकी टीम शनिवार रात और रविवार सुबह जेपी ग्रीन सोसाइटी में जांच करने गई थी। उन्होंने पाया कि जो टीकाकरण कैंप (कोवाक्सिन) का जेपी ग्रींस सोसाइटी में कराया गया, वो पूरी तरह से अवैध था। सीएमओ के मुताबिक यह संदिग्ध कैंप था, इसकी न स्वास्थ्य विभाग और न जिला प्रशासन को कोई जानकारी थी। सीएमओ के मुताबिक देश के सबसे महत्वपूर्ण टीकाकरण अभियान में ऐसे संदिग्ध कैंप के आयोजकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए बीटा थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई है। पुलिस अपनी कार्रवाई करेगी। जबकि शासन स्तर पर जांच आगे भी जारी रहेगी।आयोजक जांच में मदद को तैयार नहींसीएमओ ने बताया कि इस पूरे मामले में कैंप के आयोजक किसी भी तरीके की जांच में मदद करने को तैयार नहीं हैं। बल्कि जांच करने गई टीम के साथ आयोजकों ने अभद्रता भी की। सीएमओ के मुताबिक उनकी टीम को यहां कैंप के आयोजन के बाद इस्तेमाल की गई वैक्सीन की वायल तक नहीं मिली। जिससे इस बात का पता चल सके कि वास्तव में इन वैक्सीन में था क्या। हालांकि उन्होंने बताया कि जांच में इस बात की पुष्टि हुई है जो टीके नोएडा के जेपी ग्रीन्स सोसाइटी में लगाए गए, उनका बैच नंबर अलीगढ़ का था। सीएमओ का कहना है जांच में पाया गया कि अलीगढ़ के जिस सेंटर का प्रमाणपत्र जेपी ग्रीन्स वालों को मिल रहा था, दरसल अलीगढ़ के उस सेंटर पर तो कोवाक्सिन टीका ही नहीं लग रहा है। वहां तो कोविशील्ड टीका लगाया जा रहा है। ऐसे में अब संदेह यह होता है कि आखिर जो टीके के नाम पर यहां के लोगों को लगाया गया वो है क्या। सीएमओ का कहना है वो कुछ भी हो सकता है, पानी भी। क्योंकि सब कुछ गलत तरीके से हुआ।अलीगढ़ सीएमओ के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अमित मोहन प्रसाद ने जल्द से जल्द मामले की जांच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। अलीगढ़ सीएमओ के मुताबिक उन्होंने दो डॉक्टरों की कमेटी बना दी है, जो जल्द ही रिपोर्ट सौंप देगी।इस पूरे मामले में जिलाधिकारी नोएडा सुहास एलवाय कहते हैं कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच कराई गई है। जो मुझे अधिकारियों ने सूचना दी है उसके मुताबिक प्रथम दृष्टया मामला गंभीर है। अब आगे विधिक कार्रवाई होगी। 

विस्तार

आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की टीम ने अपनी जांच में पुष्टि कर दी कि ग्रेटर नोएडा की जेपी ग्रींस सोसाइटी में कोरोना टीकाकरण के नाम पर जो कैंप लगाया गया था, वह पूर्णत: अवैध था। बगैर अनुमति के देश के सबसे महत्वपूर्ण टीकाकरण कैंप को आयोजित कराने और लापरवाही बरतने पर आयोजकों के खिलाफ बीटा थाने में एफआईआर दर्ज करवा दी गई है। पूरे देश में यह पहला मामला है जब कोविड टीकाकरण कैंप की संदिग्धता पर एफआईआर दर्ज हुई है।

सीएमओ, एसडीएम और एसीपी की संयुक्त जांच करने वाली टीम ने पाया कि मई के अंतिम सप्ताह में लगाए गए टीकों की वायल का बैच नंबर अलीगढ़ के नाम पर अलॉट था। जांच में यह पुष्टि नहीं हो सकी कि कैंप में 187 लोगों को लगाए गए सभी टीके वास्तव में असली थे या उनमें पानी भरा था। यह पुष्टि इसलिए नहीं हो सकी कि जो वायल टीका लगाने के बाद तीन दिनों तक बचा कर रखनी जरूरी होता है वो नष्ट कर दिया गया। पूरे मामले की जांच रिपोर्ट नोएडा के जिलाधिकारी को सौंप दी गई है। इस बात की जानकारी मामले की जांच कर रहे मुख्य चिकित्सा अधिकारी नोएडा डॉक्टर दीपक ओहरी ने दी।

सीएमओ बोले-आयोजकों पर कड़ी कार्रवाई की सिफारिश
इस पूरे मामले की जांच कर रहे मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दीपक ने बताया कि उनकी टीम शनिवार रात और रविवार सुबह जेपी ग्रीन सोसाइटी में जांच करने गई थी। उन्होंने पाया कि जो टीकाकरण कैंप (कोवाक्सिन) का जेपी ग्रींस सोसाइटी में कराया गया, वो पूरी तरह से अवैध था। सीएमओ के मुताबिक यह संदिग्ध कैंप था, इसकी न स्वास्थ्य विभाग और न जिला प्रशासन को कोई जानकारी थी। सीएमओ के मुताबिक देश के सबसे महत्वपूर्ण टीकाकरण अभियान में ऐसे संदिग्ध कैंप के आयोजकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए बीटा थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई है। पुलिस अपनी कार्रवाई करेगी। जबकि शासन स्तर पर जांच आगे भी जारी रहेगी।
आयोजक जांच में मदद को तैयार नहीं
सीएमओ ने बताया कि इस पूरे मामले में कैंप के आयोजक किसी भी तरीके की जांच में मदद करने को तैयार नहीं हैं। बल्कि जांच करने गई टीम के साथ आयोजकों ने अभद्रता भी की। सीएमओ के मुताबिक उनकी टीम को यहां कैंप के आयोजन के बाद इस्तेमाल की गई वैक्सीन की वायल तक नहीं मिली। जिससे इस बात का पता चल सके कि वास्तव में इन वैक्सीन में था क्या। हालांकि उन्होंने बताया कि जांच में इस बात की पुष्टि हुई है जो टीके नोएडा के जेपी ग्रीन्स सोसाइटी में लगाए गए, उनका बैच नंबर अलीगढ़ का था। 
सीएमओ का कहना है जांच में पाया गया कि अलीगढ़ के जिस सेंटर का प्रमाणपत्र जेपी ग्रीन्स वालों को मिल रहा था, दरसल अलीगढ़ के उस सेंटर पर तो कोवाक्सिन टीका ही नहीं लग रहा है। वहां तो कोविशील्ड टीका लगाया जा रहा है। ऐसे में अब संदेह यह होता है कि आखिर जो टीके के नाम पर यहां के लोगों को लगाया गया वो है क्या। सीएमओ का कहना है वो कुछ भी हो सकता है, पानी भी। क्योंकि सब कुछ गलत तरीके से हुआ।

अलीगढ़ सीएमओ के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अमित मोहन प्रसाद ने जल्द से जल्द मामले की जांच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। अलीगढ़ सीएमओ के मुताबिक उन्होंने दो डॉक्टरों की कमेटी बना दी है, जो जल्द ही रिपोर्ट सौंप देगी।
इस पूरे मामले में जिलाधिकारी नोएडा सुहास एलवाय कहते हैं कि मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच कराई गई है। जो मुझे अधिकारियों ने सूचना दी है उसके मुताबिक प्रथम दृष्टया मामला गंभीर है। अब आगे विधिक कार्रवाई होगी। 

Continue Reading

India

एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

Published

on

By

विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

ख़बर सुनें

ख़बर सुनें

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

विस्तार

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

आगे पढ़ें

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

Continue Reading

India

नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

Published

on

By

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

Continue Reading

India

शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

Published

on

By

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

ख़बर सुनें

ख़बर सुनें

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

Continue Reading
Advertisement

Trending

Copyright © 2017 Zox News Theme. Theme by MVP Themes, powered by WordPress.