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Corona vaccine: 50 फीसदी केंद्रों पर एक हजार रुपये में मिल रही वैक्सीन

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परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।
Published by: Amit Mandal
Updated Fri, 04 Jun 2021 06:02 AM IST

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सुप्रीम कोर्ट ने जहां निजी क्षेत्र में चल रहे टीकाकरण से जुड़ी व्यवस्था को लेकर नाराजगी व्यक्त की है। वहीं देश के इन निजी अस्पतालों में एक ही तरह के वैक्सीन की अलग-अलग कीमतें भी सामने आई हैं। हर अस्पताल न सिर्फ अपने अनुसार वैक्सीन की कीमत तय कर रहा है बल्कि उस पर सेवा शुल्क इत्यादि भी अपने ही मुताबिक जनता से वसूल रहा है। गंभीर बात यह है कि एक मई से पहले तक इन्हीं अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने के लिए सेवा शुल्क केवल 100 रुपये प्रति खुराक देना पड़ता था लेकिन अब यह राशि बढ़कर तीन गुना तक हो गई है। ज्यादातर अस्पतालों में वैक्सीन लगाने के लिए सेवा शुल्क कम से कम 250 से 300 रुपये लिया जा रहा है।कोविन वेबसाइट पर मौजूद देश के 455 प्राइवेट केंद्रों को लेकर जब अमर उजाला ने पड़ताल की तो हकीकत चौंकाने वाली सामने आई। वेबसाइट पर जाकर राज्य और जिला वार जब निजी केंद्रों की सूची निकाली गई तो वहां प्रति खुराक वैक्सीन की कीमत भी लिखी हुई थी। जांच में पता चला कि देश के करीब 50 फीसदी केंद्रों पर कोविशील्ड की एक खुराक कम से कम एक हजार रुपये में दी जा रही है। वहीं 30 फीसदी केंद्रों पर कीमत 1200 से 1400 रुपये के बीच मिली। नौ राज्यों के 20 केंद्र पर वैक्सीन सबसे महंगीइतना ही नहीं दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक सहित नौ राज्यों में 20 निजी केंद्र ऐसे भी मिले जहां पूरे देश की तुलना में सबसे महंगी वैक्सीन दी जा रही है। इसमें शीर्ष पर एक नई दिल्ली स्थित ईस्ट वेस्ट मेडिकल सेंटर है जहां कोविशील्ड की प्रति खुराक 1800 रुपये में दी जा रही है जबकि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का कहना है कि उनके यहां से निजी अस्पतालों को एक वैक्सीन 600 रुपये प्रति खुराक में दी जा रही है। इस पर पांच फीसदी जीएसटी शुल्क अलग से है। बहरहाल कोविन वेबसाइट पर मौजूद जानकारी से साफ जाहिर है कि देश के प्राइवेट स्वास्थ्य क्षेत्र में एक ही वैक्सीन की अलग-अलग कीमतें हैं जिन्हें जनता को चुकाना पड़ रहा है क्योंकि राज्य सरकारों के पास वैक्सीन पर्याप्त नहीं हैं।हर महीने 50 फीसदी केंद्र और 25 फीसदी वैक्सीन राज्य सरकार को दी जा रही है। निजी अस्पतालों के पास केवल 25 फीसदी वैक्सीन आ रही है। ऐसे में अगर देखा जाए तो सरकार के पास 75 फीसदी वैक्सीन है। फिर निजी अस्पतालों के पास ज्यादा वैक्सीन कैसे हो सकती है? सेवा शुल्क और प्रति खुराक कीमत को लेकर सरकार को कुछ तय किया नहीं है। कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं जो उसी दाम (650 रुपये) में कोविशील्ड दे रहे हैं जितने में उन्हें सीरम या भारत बायोटेक कंपनी ने दी है। – डॉ. गिरधर ज्ञानी, महानिदेशक, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स देश एक, वैक्सीन की कीमत अनेकनिजी केंद्र                      कीमत प्रति खुराक255                                 800-1000131                                 1200-140021                                   600-80020                                   600 से कम15                                 1000-120007                               1400 से भी अधिक                                   (कीमत रुपये में)ये हैं देश के पांच सबसे महंगे केंद्रकेंद्र का नाम                        राज्य                   वैक्सीन              (कीमत रुपये में)ईस्ट वेस्ट मेडिकल सेंटर        दिल्ली                कोविशील्ड               1800केयर मैक्स अस्पताल            पंजाब                 कोवाक्सिन               1500मातुल्य वूमेन्स अस्पताल        गुजरात               कोवाक्सिन                1500मेडिकवर अस्पताल             तेलंगाना               कोवाक्सिन                1500मूलचंद अस्पताल                 दिल्ली                 कोवाक्सिन                1450

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सुप्रीम कोर्ट ने जहां निजी क्षेत्र में चल रहे टीकाकरण से जुड़ी व्यवस्था को लेकर नाराजगी व्यक्त की है। वहीं देश के इन निजी अस्पतालों में एक ही तरह के वैक्सीन की अलग-अलग कीमतें भी सामने आई हैं। हर अस्पताल न सिर्फ अपने अनुसार वैक्सीन की कीमत तय कर रहा है बल्कि उस पर सेवा शुल्क इत्यादि भी अपने ही मुताबिक जनता से वसूल रहा है। गंभीर बात यह है कि एक मई से पहले तक इन्हीं अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने के लिए सेवा शुल्क केवल 100 रुपये प्रति खुराक देना पड़ता था लेकिन अब यह राशि बढ़कर तीन गुना तक हो गई है। ज्यादातर अस्पतालों में वैक्सीन लगाने के लिए सेवा शुल्क कम से कम 250 से 300 रुपये लिया जा रहा है।

कोविन वेबसाइट पर मौजूद देश के 455 प्राइवेट केंद्रों को लेकर जब अमर उजाला ने पड़ताल की तो हकीकत चौंकाने वाली सामने आई। वेबसाइट पर जाकर राज्य और जिला वार जब निजी केंद्रों की सूची निकाली गई तो वहां प्रति खुराक वैक्सीन की कीमत भी लिखी हुई थी। जांच में पता चला कि देश के करीब 50 फीसदी केंद्रों पर कोविशील्ड की एक खुराक कम से कम एक हजार रुपये में दी जा रही है। वहीं 30 फीसदी केंद्रों पर कीमत 1200 से 1400 रुपये के बीच मिली। 

नौ राज्यों के 20 केंद्र पर वैक्सीन सबसे महंगी
इतना ही नहीं दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक सहित नौ राज्यों में 20 निजी केंद्र ऐसे भी मिले जहां पूरे देश की तुलना में सबसे महंगी वैक्सीन दी जा रही है। इसमें शीर्ष पर एक नई दिल्ली स्थित ईस्ट वेस्ट मेडिकल सेंटर है जहां कोविशील्ड की प्रति खुराक 1800 रुपये में दी जा रही है जबकि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का कहना है कि उनके यहां से निजी अस्पतालों को एक वैक्सीन 600 रुपये प्रति खुराक में दी जा रही है। इस पर पांच फीसदी जीएसटी शुल्क अलग से है। बहरहाल कोविन वेबसाइट पर मौजूद जानकारी से साफ जाहिर है कि देश के प्राइवेट स्वास्थ्य क्षेत्र में एक ही वैक्सीन की अलग-अलग कीमतें हैं जिन्हें जनता को चुकाना पड़ रहा है क्योंकि राज्य सरकारों के पास वैक्सीन पर्याप्त नहीं हैं।
हर महीने 50 फीसदी केंद्र और 25 फीसदी वैक्सीन राज्य सरकार को दी जा रही है। निजी अस्पतालों के पास केवल 25 फीसदी वैक्सीन आ रही है। ऐसे में अगर देखा जाए तो सरकार के पास 75 फीसदी वैक्सीन है। फिर निजी अस्पतालों के पास ज्यादा वैक्सीन कैसे हो सकती है? सेवा शुल्क और प्रति खुराक कीमत को लेकर सरकार को कुछ तय किया नहीं है। कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं जो उसी दाम (650 रुपये) में कोविशील्ड दे रहे हैं जितने में उन्हें सीरम या भारत बायोटेक कंपनी ने दी है। – डॉ. गिरधर ज्ञानी, महानिदेशक, एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स 
देश एक, वैक्सीन की कीमत अनेक
निजी केंद्र                      कीमत प्रति खुराक
255                                 800-1000
131                                 1200-1400
21                                   600-800
20                                   600 से कम
15                                 1000-1200
07                               1400 से भी अधिक

                                   (कीमत रुपये में)
ये हैं देश के पांच सबसे महंगे केंद्र
केंद्र का नाम                        राज्य                   वैक्सीन              (कीमत रुपये में)
ईस्ट वेस्ट मेडिकल सेंटर        दिल्ली                कोविशील्ड               1800
केयर मैक्स अस्पताल            पंजाब                 कोवाक्सिन               1500
मातुल्य वूमेन्स अस्पताल        गुजरात               कोवाक्सिन                1500
मेडिकवर अस्पताल             तेलंगाना               कोवाक्सिन                1500
मूलचंद अस्पताल                 दिल्ली                 कोवाक्सिन                1450

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एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

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विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

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नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

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शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

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वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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