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लापरवाही की मिसाल: उत्तर प्रदेश में हो रहा वैक्सीनेशन में बड़ा खेल, अलीगढ़ का टीका लग रहा नोएडा में

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आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 04 Jun 2021 05:49 PM IST

सार
अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा में कैसे लगी, इसे अलीगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर बीपी सिंह कल्याणी सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं है। हालांकि उनका तर्क था कि नोएडा के लोग अलीगढ़ में आकर अगर टीका लगवा कर गए हैं तो उन्हें मिलने वाले प्रमाण पत्र पर नौरंगाबाद सीएचसी का ही स्थान दर्ज होगा…

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जब कोविड के टीके की वायल जिले के एक सेंटर से दूसरे सेंटर तक नहीं जा सकती, तो अलीगढ़ के लिए अलॉट हुई वैक्सीन की पूरी खेप नोएडा कैसे पहुंच गई। वह भी तब जब स्वास्थ्य विभाग के सरकारी दस्तावेजों में रोजाना इन टीकों की ऑडिट होती हो। बावजूद इसके नोएडा की जेपी ग्रींस सोसाइटी में अलीगढ़ जिले को आवंटित टीकों की एक बड़ी खेप लगा भी दी गई। इस पूरे मामले पर नोएडा और अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग कोई भी सटीक जवाब नहीं दे पा रहा है। ऐसे में तो सवाल उठने लाजमी हैं। सवाल ये कि क्या वास्तव में यह कोई एक बड़ा रैकेट है जो अधिकारियों की मिलीभगत से टीकों का हेर फेर कर रहा है। सवाल यह भी है कि जो टीके स्वास्थ्य विभाग के निगरानी में लगाए जाने चाहिए वह एक व्यक्ति के घर पर कैसे लगाए जा रहे हैं। लोगों ने सवाल उठाए हैं की क्या हकीकत में इन टीकों में जीवन रक्षक दवा ही है या कुछ और।मामला नोएडा की जेपी ग्रींस सोसायटी का है। यहां मई के अंतिम सप्ताह में लगाए गए टीकों को लेकर बहुत सवालिया निशान उठ रहे हैं। सोसायटी में रहने वाले लोगों ने नोएडा के जिला अधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को चिट्ठी लिखकर शिकायत की है कि दरअसल इस सोसाइटी में जो टीके लगाए गए वह सभी टीके अलीगढ़ के थे। यही नहीं नोएडा में यह टीके जिस तारीख को लगे और जो टीका लगवाने के बाद प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ उस पर तारीख भी अलग है। टीकाकरण का स्थान नोएडा के जेपी ग्रींस सोसाइटी की जगह पर अलीगढ़ के नौरंगाबाद पीएचसी का दिया गया है।जेपी सोसायटी में रहने वाले रिटायर्ड आईएएस और भारत सरकार में पूर्व संयुक्त सचिव रहे शंकर अग्रवाल कहते हैं टीकाकरण को लेकर मंशा किसी की भी कुछ हो लेकिन यह कैसे संभव है कि अलीगढ़ की वैक्सीन बगैर किसी स्वास्थ्य विभाग की देखरेख में नोएडा के जेपी ग्रींस सोसाइटी में लगा दी जाए। सोसायटी के लोगों ने अमर उजाला डॉट कॉम को भेजे गए प्रमाण पत्र में बताया कि टीका तो उन्होंने नोएडा के जेपी ग्रीन्स सोसायटी में लगाया था और जो प्रमाण पत्र आया है उसमें टीका लगाने का स्थान अलीगढ़ का दिखा रहा है। जो पूरी तरीके से गलत है।
जिम्मेदारों की सांसें अटकी, कुछ बोल नहीं पा रहे हैं
इस पूरे मामले में जब नोएडा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर दीपक को फोन किया गया तो उन्होंने अपना फोन अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अमित को पकड़ा दिया। डॉ दीपक से जब अलीगढ़ की वैक्सीन को नोएडा में लगाने के बारे में सवाल किया तो उनका कहना है ऐसा संभव ही नहीं कि अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा में लग जाए। वह कहते हैं की एक-एक वैक्सीन का रोजाना ऑडिट होता है। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा की किसी सोसाइटी में लगा दी जाए। जब उन्हें सबूत के साथ इस बात की जानकारी दी गई कि ऐसा हुआ है तो वह कहने लगे कि इस मामले में उनका सीधा कोई रोल नहीं है। अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने कहा कि इसकी देखरेख जिला टीकाकरण अधिकारी करते हैं।अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा में कैसे लगी, इसे अलीगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर बीपी सिंह कल्याणी सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं है। हालांकि उनका तर्क था कि नोएडा के लोग अलीगढ़ में आकर अगर टीका लगवा कर गए हैं तो उन्हें मिलने वाले प्रमाण पत्र पर नौरंगाबाद सीएचसी का ही स्थान दर्ज होगा। उनको जब यह बताया गया कि सोसाइटी के लोग तो अलीगढ़ आए ही नहीं, तो उन्हें प्रमाणपत्र कैसे अलीगढ़ का मिल सकता है। इस पर उनका कहना था कि अब वह इस मामले में जांच करवाएंगे कि ऐसा कैसे हुआ।इस कैंप का आयोजन करने वाले जेपी ग्रींस सोसाइटी के शुभ गौतम से संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन उनका फोन बंद था। शुभ गौतम को मैसेज भी भेजा गया लेकिन शाम तक कोई जवाब नहीं आया।

विस्तार

जब कोविड के टीके की वायल जिले के एक सेंटर से दूसरे सेंटर तक नहीं जा सकती, तो अलीगढ़ के लिए अलॉट हुई वैक्सीन की पूरी खेप नोएडा कैसे पहुंच गई। वह भी तब जब स्वास्थ्य विभाग के सरकारी दस्तावेजों में रोजाना इन टीकों की ऑडिट होती हो। बावजूद इसके नोएडा की जेपी ग्रींस सोसाइटी में अलीगढ़ जिले को आवंटित टीकों की एक बड़ी खेप लगा भी दी गई। इस पूरे मामले पर नोएडा और अलीगढ़ स्वास्थ्य विभाग कोई भी सटीक जवाब नहीं दे पा रहा है। ऐसे में तो सवाल उठने लाजमी हैं। सवाल ये कि क्या वास्तव में यह कोई एक बड़ा रैकेट है जो अधिकारियों की मिलीभगत से टीकों का हेर फेर कर रहा है। सवाल यह भी है कि जो टीके स्वास्थ्य विभाग के निगरानी में लगाए जाने चाहिए वह एक व्यक्ति के घर पर कैसे लगाए जा रहे हैं। लोगों ने सवाल उठाए हैं की क्या हकीकत में इन टीकों में जीवन रक्षक दवा ही है या कुछ और।

मामला नोएडा की जेपी ग्रींस सोसायटी का है। यहां मई के अंतिम सप्ताह में लगाए गए टीकों को लेकर बहुत सवालिया निशान उठ रहे हैं। सोसायटी में रहने वाले लोगों ने नोएडा के जिला अधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी को चिट्ठी लिखकर शिकायत की है कि दरअसल इस सोसाइटी में जो टीके लगाए गए वह सभी टीके अलीगढ़ के थे। यही नहीं नोएडा में यह टीके जिस तारीख को लगे और जो टीका लगवाने के बाद प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ उस पर तारीख भी अलग है। टीकाकरण का स्थान नोएडा के जेपी ग्रींस सोसाइटी की जगह पर अलीगढ़ के नौरंगाबाद पीएचसी का दिया गया है।

जेपी सोसायटी में रहने वाले रिटायर्ड आईएएस और भारत सरकार में पूर्व संयुक्त सचिव रहे शंकर अग्रवाल कहते हैं टीकाकरण को लेकर मंशा किसी की भी कुछ हो लेकिन यह कैसे संभव है कि अलीगढ़ की वैक्सीन बगैर किसी स्वास्थ्य विभाग की देखरेख में नोएडा के जेपी ग्रींस सोसाइटी में लगा दी जाए। सोसायटी के लोगों ने अमर उजाला डॉट कॉम को भेजे गए प्रमाण पत्र में बताया कि टीका तो उन्होंने नोएडा के जेपी ग्रीन्स सोसायटी में लगाया था और जो प्रमाण पत्र आया है उसमें टीका लगाने का स्थान अलीगढ़ का दिखा रहा है। जो पूरी तरीके से गलत है।
जिम्मेदारों की सांसें अटकी, कुछ बोल नहीं पा रहे हैं
इस पूरे मामले में जब नोएडा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर दीपक को फोन किया गया तो उन्होंने अपना फोन अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अमित को पकड़ा दिया। डॉ दीपक से जब अलीगढ़ की वैक्सीन को नोएडा में लगाने के बारे में सवाल किया तो उनका कहना है ऐसा संभव ही नहीं कि अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा में लग जाए। वह कहते हैं की एक-एक वैक्सीन का रोजाना ऑडिट होता है। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा की किसी सोसाइटी में लगा दी जाए। जब उन्हें सबूत के साथ इस बात की जानकारी दी गई कि ऐसा हुआ है तो वह कहने लगे कि इस मामले में उनका सीधा कोई रोल नहीं है। अतिरिक्त मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने कहा कि इसकी देखरेख जिला टीकाकरण अधिकारी करते हैं।
अलीगढ़ की वैक्सीन नोएडा में कैसे लगी, इसे अलीगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर बीपी सिंह कल्याणी सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि ऐसा संभव ही नहीं है। हालांकि उनका तर्क था कि नोएडा के लोग अलीगढ़ में आकर अगर टीका लगवा कर गए हैं तो उन्हें मिलने वाले प्रमाण पत्र पर नौरंगाबाद सीएचसी का ही स्थान दर्ज होगा। उनको जब यह बताया गया कि सोसाइटी के लोग तो अलीगढ़ आए ही नहीं, तो उन्हें प्रमाणपत्र कैसे अलीगढ़ का मिल सकता है। इस पर उनका कहना था कि अब वह इस मामले में जांच करवाएंगे कि ऐसा कैसे हुआ।

इस कैंप का आयोजन करने वाले जेपी ग्रींस सोसाइटी के शुभ गौतम से संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई लेकिन उनका फोन बंद था। शुभ गौतम को मैसेज भी भेजा गया लेकिन शाम तक कोई जवाब नहीं आया।

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एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

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विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

विस्तार

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

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नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

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शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

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वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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