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केंद्र बनाम राज्य: शीर्ष नौकरशाहों को क्यों याद दिलाना पड़ रहा है ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’, ‘भयभीत’ हैं आईएएस!

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सार
अलपन बंदोपाध्याय का मामला सामने आने के बाद केंद्र सरकार, शीर्ष नौकरशाहों की भूमिका को लेकर बहुत कुछ सोच रही है। सूत्र बताते हैं कि इस बाबत प्रधानमंत्री कार्यालय और डीओपीटी में फाइलें पलटी जा रही हैं। जल्द ही नए नियम और बदलावों का खाका सामने आ सकता है…

अलपन बनर्जी बाएं नए मुख्य सचिव एचके द्विवेदी को पदभार सौंपते हुए।
– फोटो : ANI (File)

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केंद्र सरकार और शीर्ष नौकरशाहों के बीच का माहौल कुछ तनातनी वाला हो रहा है। नौकरशाह जैसा कुछ बता रहे हैं, वह मौजूदा परिस्थितियों को ‘भय’ की तरफ ले जाता है। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय और पीएमओ के बीच शुरू हुए विवाद को केंद्र सरकार भुला नहीं पा रही है। तभी तो केंद्र ने अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को सरदार पटेल द्वारा कही गई पंक्तियां याद दिलानी पड़ रही हैं। आजादी से चार माह पहले यानी 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेट्कॉफ हाउस में पटेल ने आईएएस अधिकारियों को ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ कहा था। उन्होंने केवल युवा अधिकारियों को प्रेरित करने के लिए इस वाक्य का प्रयोग नहीं किया था, बल्कि इसके पीछे कई दूसरे अर्थ भी रहे हैं।भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है जहां इन राज्यों के शासकों के अपने हित और अहंकार होंगे। दूसरी तरफ केंद्र ने रिटायर्ड अधिकारियों को चेतावनी दे डाली है कि उन्होंने कुछ ऐसा वैसा लिखा तो पेंशन रोक ली जाएगी। अलपन बंदोपाध्याय को नोटिस जारी हो चुका है और दिल्ली के मुख्य सचिव को लेकर भी केंद्रीय गृह मंत्रालय खफा है। दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव पीके त्रिपाठी कहते हैं कि आईएएस अपनी लाइन पर होता है। वह प्रोटोकॉल का पालन भी करता है, लेकिन नेताओं की कहासुनी में अफसरों को निशाना न बनाया जाए।
केंद्र ने नौकरशाहों तक संदेश भिजवा दिया है…
अलपन बंदोपाध्याय का मामला सामने आने के बाद केंद्र सरकार, शीर्ष नौकरशाहों की भूमिका को लेकर बहुत कुछ सोच रही है। सूत्र बताते हैं कि इस बाबत प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और डीओपीटी में फाइलें पलटी जा रही हैं। जल्द ही नए नियम और बदलावों का खाका सामने आ सकता है। जाहिर सी बात है कि उसमें वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के ‘पर’ काटने जैसा ही कुछ रहेगा। इस बार केंद्र पीछे हटने के भाव में नहीं है। बुधवार को केंद्र ने अपने ‘सरकारी सूत्रों’ के जरिए नौकरशाहों तक कई संदेश भिजवा दिए।पहला तो यही था कि रिटायरमेंट के बाद कोई अधिकारी सोच समझ कर लिखे। खासतौर पर, वह अधिकारी किसी इंटेलीजेंस या सुरक्षा संबंधित संस्थान से रिटायर हुआ हो। केंद्र सरकार ने उनके लिए नियम तय कर दिए हैं। रिटायर होने वाले सरकारी कार्मिक लेख या किताब अपनी मर्जी से नहीं प्रकाशित कर सकते हैं। इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें अपने संस्थान से पूर्व मंजूरी लेनी होगी, जहां से वे काम करके रिटायर हुए हैं। यह नोटिफिकेशन मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक ग्रीवेंस एंड पेंशन के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने जारी किया है। अगर रिटायरमेंट के बाद वह अंडरटेकिंग की शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है।
इस बात से झलक पड़ा केंद्र का दर्द
केंद्र ने सरदार पटेल का हवाला देते हुए कई दूसरी बातें भी कही हैं। जैसे पटेल ने कहा था, ऐसी संवेदनशीलताओं से सुरक्षा प्रदान करने के लिए, भारतीय संघीय ढांचे में आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी। केंद्र उनका संवर्ग नियंत्रण प्राधिकरण भी होगा, जबकि उनकी सेवाएं राज्यों को दी जाएंगी। शासन और समन्वय से संबंधित मुद्दों पर इन अधिकारियों को केंद्र एवं राज्यों के बीच एक सेतु भी बनना है। इस सेवा का निर्माण इस तरह से किया गया है कि इन अधिकारियों से, राज्य और राष्ट्र के सर्वोत्तम हित में किसी विषय पर अधिक तर्कसंगत और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की उम्मीद की जाती है। इस बात से केंद्र का वह दर्द झलकता है जो उसे अलपन बंदोपाध्याय के मामले में झेलना पड़ा है। प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय का न आना केंद्र को बहुत ज्यादा दुखी कर रहा है। पीएम को एक अधिकारी के आने का इंतजार करना पड़ा। वह अधिकारी बिना कोई प्रस्तुतिकरण दिए, बैठक छोड़कर चला जाता है। बता दें कि पीएम वहां तूफान से हुए जान माल के नुकसान का पता लगाने आए थे।
सीएम गलत या ठीक है, ये एक अलग बहस का विषय है
केंद्र सरकार द्वारा नौकरशाहों के लिए जारी संदेश में कहा गया है कि अलपन बंदोपाध्याय के मामले में केंद्र और राज्य की तकरार अलग बात है। सीएम गलत थीं या ठीक हैं, ये एक अलग बहस का विषय है। राज्य के मुख्य सचिव को पीएम के समक्ष प्रस्तुतिकरण देना चाहिए था। अलपन बंदोपाध्याय के पास जो पद है, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे उसके समतुल्य व्यवहार करेंगे। बैठक छोड़कर जाने का बंदोपाध्याय का कदम दूसरे अधिकारियों को क्या सीखने के लिए प्रोत्साहित करेगा, इसका अंदाजा किसी को नहीं है।राज्य में एक शीर्ष नौकरशाह ने अपने मुख्यमंत्री के बलबूते कई मान्यताओं को ताक पर रख दिया। उसे अगले दिन उसका ईनाम भी मिल गया। वह नौकरशाह पोस्ट रिटायरमेंट पद पर बैठा दिया जाता है। केंद्र ने कहा है कि चीफ सेक्रेटरी, मुख्यमंत्री के पर्सनल स्टाफ की तरह काम नहीं कर सकता। वह राज्य का मुख्य सचिव है। राष्ट्रपति भवन, केंद्र सरकार, कोर्ट या राज्यपाल की तरफ से जो भी पत्राचार होता है, वह राज्य के मुख्य सचिव को ही भेजा जाता है।
दिल्ली के अफसर मुख्य सचिव की बैठक में न जायें तो…
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि अलपन बंदोपाध्याय को पीएम के समक्ष राज्य की रिपोर्ट रखना चाहिए थी। इससे बड़ी हैरानी क्या हो सकती है कि पीएम बैठक में मौजूद हैं, लेकिन मुख्य सचिव नहीं हैं। मुख्य सचिव आते हैं और दो मिनट में वापस चले जाते हैं। ममता बनर्जी ने इस विवाद में पीएम मोदी से कहा था कि वे उनके अधिकारी को परेशान कर रहे हैं। वे उसे दिल्ली बुला रहे हैं। ऐसे तो पश्चिम बंगाल के अनेक अधिकारी दिल्ली में तैनात हैं। मैं भी उन सभी को वापस बुलाने लगी तो क्या होगा। अब केंद्र ने भी उसी लहजे में ममता बनर्जी को जवाब दिया है।केंद्र सरकार के अधिकारी, पीएसयू या एनडीएमए के अफसर अगर मुख्य सचिव की बैठक में न जाएं तो कैसी स्थिति होगी। ये बातें तो सहकारी संघवाद के ढांचे को तोड़ने वाली हैं। ये भारत है, यहां तीन स्तरीय ढांचा है। केंद्र, राज्य और पंचायती राज। वहां भी अगर कोई डीएम, जिला परिषद हेड या पंचायत मुख्य सचिव के साथ समन्वय करने से मना कर दे तो क्या होगा। अलपन बंदोपाध्याय द्वारा किया अशोभनीय व्यवहार आईएएस पर एक दाग की तरह है। ये वही सेवा है, जिसके बारे में सरदार पटेल ने ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

विस्तार

केंद्र सरकार और शीर्ष नौकरशाहों के बीच का माहौल कुछ तनातनी वाला हो रहा है। नौकरशाह जैसा कुछ बता रहे हैं, वह मौजूदा परिस्थितियों को ‘भय’ की तरफ ले जाता है। पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय और पीएमओ के बीच शुरू हुए विवाद को केंद्र सरकार भुला नहीं पा रही है। तभी तो केंद्र ने अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को सरदार पटेल द्वारा कही गई पंक्तियां याद दिलानी पड़ रही हैं। आजादी से चार माह पहले यानी 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेट्कॉफ हाउस में पटेल ने आईएएस अधिकारियों को ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ कहा था। उन्होंने केवल युवा अधिकारियों को प्रेरित करने के लिए इस वाक्य का प्रयोग नहीं किया था, बल्कि इसके पीछे कई दूसरे अर्थ भी रहे हैं।

भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है जहां इन राज्यों के शासकों के अपने हित और अहंकार होंगे। दूसरी तरफ केंद्र ने रिटायर्ड अधिकारियों को चेतावनी दे डाली है कि उन्होंने कुछ ऐसा वैसा लिखा तो पेंशन रोक ली जाएगी। अलपन बंदोपाध्याय को नोटिस जारी हो चुका है और दिल्ली के मुख्य सचिव को लेकर भी केंद्रीय गृह मंत्रालय खफा है। दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव पीके त्रिपाठी कहते हैं कि आईएएस अपनी लाइन पर होता है। वह प्रोटोकॉल का पालन भी करता है, लेकिन नेताओं की कहासुनी में अफसरों को निशाना न बनाया जाए।

केंद्र ने नौकरशाहों तक संदेश भिजवा दिया है…
अलपन बंदोपाध्याय का मामला सामने आने के बाद केंद्र सरकार, शीर्ष नौकरशाहों की भूमिका को लेकर बहुत कुछ सोच रही है। सूत्र बताते हैं कि इस बाबत प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और डीओपीटी में फाइलें पलटी जा रही हैं। जल्द ही नए नियम और बदलावों का खाका सामने आ सकता है। जाहिर सी बात है कि उसमें वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के ‘पर’ काटने जैसा ही कुछ रहेगा। इस बार केंद्र पीछे हटने के भाव में नहीं है। बुधवार को केंद्र ने अपने ‘सरकारी सूत्रों’ के जरिए नौकरशाहों तक कई संदेश भिजवा दिए।पहला तो यही था कि रिटायरमेंट के बाद कोई अधिकारी सोच समझ कर लिखे। खासतौर पर, वह अधिकारी किसी इंटेलीजेंस या सुरक्षा संबंधित संस्थान से रिटायर हुआ हो। केंद्र सरकार ने उनके लिए नियम तय कर दिए हैं। रिटायर होने वाले सरकारी कार्मिक लेख या किताब अपनी मर्जी से नहीं प्रकाशित कर सकते हैं। इसे प्रकाशित करने के लिए उन्हें अपने संस्थान से पूर्व मंजूरी लेनी होगी, जहां से वे काम करके रिटायर हुए हैं। यह नोटिफिकेशन मिनिस्ट्री ऑफ पब्लिक ग्रीवेंस एंड पेंशन के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग ने जारी किया है। अगर रिटायरमेंट के बाद वह अंडरटेकिंग की शर्तों का उल्लंघन करते हैं तो उनकी पेंशन रोकी जा सकती है।
इस बात से झलक पड़ा केंद्र का दर्द
केंद्र ने सरदार पटेल का हवाला देते हुए कई दूसरी बातें भी कही हैं। जैसे पटेल ने कहा था, ऐसी संवेदनशीलताओं से सुरक्षा प्रदान करने के लिए, भारतीय संघीय ढांचे में आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी। केंद्र उनका संवर्ग नियंत्रण प्राधिकरण भी होगा, जबकि उनकी सेवाएं राज्यों को दी जाएंगी। शासन और समन्वय से संबंधित मुद्दों पर इन अधिकारियों को केंद्र एवं राज्यों के बीच एक सेतु भी बनना है। इस सेवा का निर्माण इस तरह से किया गया है कि इन अधिकारियों से, राज्य और राष्ट्र के सर्वोत्तम हित में किसी विषय पर अधिक तर्कसंगत और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की उम्मीद की जाती है। इस बात से केंद्र का वह दर्द झलकता है जो उसे अलपन बंदोपाध्याय के मामले में झेलना पड़ा है। प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय का न आना केंद्र को बहुत ज्यादा दुखी कर रहा है। पीएम को एक अधिकारी के आने का इंतजार करना पड़ा। वह अधिकारी बिना कोई प्रस्तुतिकरण दिए, बैठक छोड़कर चला जाता है। बता दें कि पीएम वहां तूफान से हुए जान माल के नुकसान का पता लगाने आए थे।

सीएम गलत या ठीक है, ये एक अलग बहस का विषय है
केंद्र सरकार द्वारा नौकरशाहों के लिए जारी संदेश में कहा गया है कि अलपन बंदोपाध्याय के मामले में केंद्र और राज्य की तकरार अलग बात है। सीएम गलत थीं या ठीक हैं, ये एक अलग बहस का विषय है। राज्य के मुख्य सचिव को पीएम के समक्ष प्रस्तुतिकरण देना चाहिए था। अलपन बंदोपाध्याय के पास जो पद है, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे उसके समतुल्य व्यवहार करेंगे। बैठक छोड़कर जाने का बंदोपाध्याय का कदम दूसरे अधिकारियों को क्या सीखने के लिए प्रोत्साहित करेगा, इसका अंदाजा किसी को नहीं है।राज्य में एक शीर्ष नौकरशाह ने अपने मुख्यमंत्री के बलबूते कई मान्यताओं को ताक पर रख दिया। उसे अगले दिन उसका ईनाम भी मिल गया। वह नौकरशाह पोस्ट रिटायरमेंट पद पर बैठा दिया जाता है। केंद्र ने कहा है कि चीफ सेक्रेटरी, मुख्यमंत्री के पर्सनल स्टाफ की तरह काम नहीं कर सकता। वह राज्य का मुख्य सचिव है। राष्ट्रपति भवन, केंद्र सरकार, कोर्ट या राज्यपाल की तरफ से जो भी पत्राचार होता है, वह राज्य के मुख्य सचिव को ही भेजा जाता है।
दिल्ली के अफसर मुख्य सचिव की बैठक में न जायें तो…
केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि अलपन बंदोपाध्याय को पीएम के समक्ष राज्य की रिपोर्ट रखना चाहिए थी। इससे बड़ी हैरानी क्या हो सकती है कि पीएम बैठक में मौजूद हैं, लेकिन मुख्य सचिव नहीं हैं। मुख्य सचिव आते हैं और दो मिनट में वापस चले जाते हैं। ममता बनर्जी ने इस विवाद में पीएम मोदी से कहा था कि वे उनके अधिकारी को परेशान कर रहे हैं। वे उसे दिल्ली बुला रहे हैं। ऐसे तो पश्चिम बंगाल के अनेक अधिकारी दिल्ली में तैनात हैं। मैं भी उन सभी को वापस बुलाने लगी तो क्या होगा। अब केंद्र ने भी उसी लहजे में ममता बनर्जी को जवाब दिया है।केंद्र सरकार के अधिकारी, पीएसयू या एनडीएमए के अफसर अगर मुख्य सचिव की बैठक में न जाएं तो कैसी स्थिति होगी। ये बातें तो सहकारी संघवाद के ढांचे को तोड़ने वाली हैं। ये भारत है, यहां तीन स्तरीय ढांचा है। केंद्र, राज्य और पंचायती राज। वहां भी अगर कोई डीएम, जिला परिषद हेड या पंचायत मुख्य सचिव के साथ समन्वय करने से मना कर दे तो क्या होगा। अलपन बंदोपाध्याय द्वारा किया अशोभनीय व्यवहार आईएएस पर एक दाग की तरह है। ये वही सेवा है, जिसके बारे में सरदार पटेल ने ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

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एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

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विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

विस्तार

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

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नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

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शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

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वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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