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पड़ताल: कहां से आया कोरोना, 2019 में फैला या 16 साल से चल रहा था शोध, शी झेंगली पर आरोप क्यों, जानें सबकुछ

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वुहान लैब भले ही कोरोना वायरस बनाने और फैलाने के आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। हालांकि, यह भी सच है कि शी झेंगली और उनकी टीम कोरोना फैलने यानी 2019 से 16 साल पहले से इस वायरस पर काम कर रही थी। वहीं, 2019 तक इसके 19,000 से अधिक नमूने एकत्रित कर चुकी थी।

शी झेंगली
– फोटो : साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट

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पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना वायरस की चपेट में है। दुनिया का हर देश इस महामारी से त्राहिमाम कर रहा है। ऐसे में अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोविड-26 और कोविड-32 से बचना है तो कोविड-19 की उत्पत्ति जानना बेहद जरूरी है। दरअसल, वैज्ञानिक का दावा है कि अगर इस वायरस के बनने का पता नहीं लग पाया तो पूरी दुनिया 2026 और 2032 में एक बार फिर महामारी की चपेट में होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि यह कोरोना क्या 2019 में ही फैला या पिछले 16 साल से दुनिया को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार हो रहा था? इस रिपोर्ट में जानने की कोशिश करते हैं कि कोरोना आया कहां से? इसकी उत्पत्ति आखिर कैसे हुई? क्यों इसे फैलाने का आरोप चीन स्थित वुहान लैब में चमगादड़ों पर रिसर्च करने वाली शी झेंगली पर लगा?
अगर कोरोना की कहानी जाननी है तो सबसे पहले हमें कैलेंडर के पन्ने पलटने होंगे और शुरुआत 30 दिसंबर, 2019 से करनी होगी, जब दुनिया पहली बार कोरोना के नाम से रूबरू हुई। दरअसल, उस दिन चीन में कोरोना का पहला मरीज सामने आया था। इसके बाद यह महामारी पूरी दुनिया में फैलती चली गई। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में सेंटर फॉर इमर्जिंग इंफेक्शियस डिजीज (बेहद संक्रामक रोगों की जानकार) की निदेशक शी झेंगली इसका खुलासा करती हैं। वह कहती हैं कि 30 दिसंबर, 2019 को शाम 7 बजे का वक्त हो रहा था। उस दौरान उन्हें सार्स सीओवी-2 (SARS-CoV-2) के बारे में पहली सूचना मिली, जिसे अब दुनिया भर में फैले कोविड-19 के सोर्स वायरस के रूप में जाना जाता है।
एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में झेंगली ने बताया कि उस दिन उनके पास एक फोन कॉल आया। कॉलर ने उन्हें बताया कि वुहान लैब में कुछ रोगियों के नमूने आए हैं, जो एक असामान्य निमोनिया से पीड़ित हैं। झेंगली से कहा गया कि वह जो कुछ भी कर रही हैं, तत्काल छोड़ दें। तुरंत वुहान लैब लौटें और वायरस पर शोध करें। झेंगली उस वक्त वुहान से करीब 800 किमी दूर थीं। उन्होंने तुरंत ट्रेन पकड़ी और वुहान लैब पहुंच गईं। इसके बाद उन्होंने उस असामान्य निमोनिया पर शोध किया, जिसे बाद में कोरोना वायरस का नाम दिया गया। 
गौरतलब है कि मार्च-अप्रैल 2021 तक पूरी दुनिया और वैज्ञानिक यही मानते रहे कि SARS-CoV-2 वायरस जानवरों और मनुष्यों के बीच संपर्क से फैसला। इसके पीछे तर्क दिया गया कि चमगादड़ से कोरोनावायरस की दूसरी प्रजाति के वायरस से इंसान संक्रमित हो गए। हालांकि, इस कनेक्शन के पीछे किसी भी तरह का तर्क नहीं दिया गया। इस बीच एक और चर्चा शुरू हुई, जिसमें कहा गया कि कोरोना वायरस लैब मेड हो सकता है। इसे वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में तैयार किया गया। हालांकि, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के बाद इस अवधारणा को भी खारिज कर दिया गया, लेकिन अब वुहान लैब एक बार फिर हर किसी के निशाने पर है। 
वुहान लैब भले ही कोरोना वायरस बनाने और फैलाने के आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। हालांकि, यह भी सच है कि शी झेंगली और उनकी टीम कोरोना फैलने यानी 2019 से 16 साल पहले से इस वायरस पर काम कर रही थी। वहीं, 2019 तक इसके 19,000 से अधिक नमूने एकत्रित कर चुकी थी। फिलहाल, यह कहा जा रहा है कि कोरोना ‘लैब-मेड’ वायरस नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से उन वायरसों में से एक हो सकता है, जिनका वहां अध्ययन किया जा रहा था। इस मामले में शी झेंगली पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया गया है, लेकिन वह खुद को क्लीन चिट दे चुकी हैं। 
चीन के वुहान में कोरोना फैलने के कुछ ही महीनों बाद इसका प्रकोप पूरी दुनिया में नजर आने लगा। ऐसे में शी झेंगली की टीम ने दो सप्ताह तक इस वायरस पर शोध किया। उन्होंने वायरस के जीनोम में हुए बदलाव की जानकारी डब्ल्यूएचओ के साथ साझा की। हालांकि, जब तक महामारी का असली रूप सामने आया, तब तक 80 लोगों इसके शिकार बन चुके थे। झेंगली और उनकी टीम के शोध में दावा किया गया कि यह वायरस प्राकृतिक तरीके से फैला। इस नए निमोनिया का संभावित स्रोत एक जलाशय बताया गया, जहां चमगादड़ मरे हुए मिले थे। फरवरी 2020 में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया कि नया वायरस पुराने सार्स से 79.6 फीसदी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें चमगादड़ में मिलने वाले कोरोनावायरस 96 फीसदी से अधिक हैं। हालांकि, बाद में यह दावा भी किया गया कि वुहान के सी-फूड मार्केट से यह महामारी फैली। यह भी कहा गया कि शी झेंगली इसका पता लगाने गई थीं, जिसके बाद वायरस के ट्रेसेज लैब के दरवाजों व अन्य जगह मिले। 
कोरोना फैलने को लेकर शुरुआत में दो तरह के दावे किए गए। पहला यह कि चमगादड़ में पाए जाने वाले कोरोनावायरस से यह 96 फीसदी मिलता-जुलता है। दूसरा यह कि वायरस सी-फूड मार्केट से फैला। अहम बात यह है कि दोनों ही अवधारणाएं एक-दूसरे के उलट थीं। हालांकि, लगातार जारी हो रहे उल्लेखों, उद्धरणों, बयानों और साक्षात्कारों के बीच एक अस्पष्ट कहानी भी सामने आई। इसमें कहा गया कि कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए 16 साल से शोध चल रहा था, जिसके ट्रेसेज लैब के दरवाजे पर मिले थे। दरअसल, शी झेंगली ने अपने बयानों में एक ऐसे वायरस की जानकारी भी दी, जो SARS-CoV-2 जैसा था, जिसे RaTG13 नाम दिया गया। इसके बाद झेंगली द्वारा वायरस फैलने की आशंका जाहिर की जाने लगी। 
गौरतलब है कि अप्रैल 2012 के दौरान चीन में 6 नाबालिग रहस्यमयी निमोनिया की चपेट में आ गए। इसका असर बच्चों के रेस्पिरेटरी सिस्टम पर हुआ और तीन की मौत हो गई। ये लोग एक बंद पड़ी कॉपर की खदान में काम करते वक्त चमगादड़ों की चपेट में आ गए थे। इसी साल कुछ महीने बाद शी झेंगली और उनकी टीम को 4 सीरो सैंपल मिले, जिनमें तीन मरीज बच गए, लेकिन एक की मौत हो गई। उन्होंने इसका मिलान इबोला, निपाह और सार्स से किया, लेकिन रिपोर्ट निगेटिव आई। उसके बाद 2015 तक झेंगली और उनकी टीम ने उन गुफाओं से 1322 सैंपल जुटाए, जिनमें 293 सैंपल अलग-अलग तरीकों के कोरोनावायरस के थे। इनमें 8 सैंपल बीटा कोरोनावायरस के थे, जबकि इन 8 में से एक RaTG13 वायरस था, जिसकी पहचान 2016 में हुई। इसे RaBtCoV/4991 नाम दिया गया। यह वायरस पुराने सार्स वायरस से एकदम अलग था, जिसे वायरस का नया स्ट्रेन कहा गया। उस दौरान माना गया कि बीटा कोरोना वायरस सार्स और मर्स के नए रूप हैं। 
दो साल बाद यानी 2018 में RaTG13 वायरस और ज्यादा अनुक्रमित हो गया। वहीं, इसके दो साल बाद यानी 2020 में जब इसका मिलान SARS-CoV-2 से किया गया तो 96.2 फीसदी समानता मिली। हालांकि, नवंबर 2020 में प्रकाशित एक लेख में झेंगली ने फरवरी 2020 के उस दावे को दोहराया, जिसमें कहा गया था कि 2012 के दौरान संक्रमित हुए मजदूरों के सैंपल का मिलान SARS-CoV-2 से किया गया था, लेकिन नतीजे निगेटिव आए थे। इसका मतलब यह था कि मजदूरों कोरोना से संक्रमित नहीं हुए थे। यह निष्कर्ष लैब से कोरोना फैलने की अवधारणा सामने आने के कुछ महीने बाद दिया गया। हालांकि, कुछ शोध में यह दावा किया गया कि उन मजदूरों को चमगादड़ों के चलते संक्रमण हुआ था, लेकिन झेंगली ने कहा कि अगर ऐसा होता तो खदान में लंबे समय तक वायरस मिलता। झेंगली ने कहा कि वे मजदूर एक जलाशय में फैले फंगल निमोनिया के संपर्क में आए थे। 

विस्तार

पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना वायरस की चपेट में है। दुनिया का हर देश इस महामारी से त्राहिमाम कर रहा है। ऐसे में अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोविड-26 और कोविड-32 से बचना है तो कोविड-19 की उत्पत्ति जानना बेहद जरूरी है। दरअसल, वैज्ञानिक का दावा है कि अगर इस वायरस के बनने का पता नहीं लग पाया तो पूरी दुनिया 2026 और 2032 में एक बार फिर महामारी की चपेट में होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि यह कोरोना क्या 2019 में ही फैला या पिछले 16 साल से दुनिया को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार हो रहा था? इस रिपोर्ट में जानने की कोशिश करते हैं कि कोरोना आया कहां से? इसकी उत्पत्ति आखिर कैसे हुई? क्यों इसे फैलाने का आरोप चीन स्थित वुहान लैब में चमगादड़ों पर रिसर्च करने वाली शी झेंगली पर लगा?

30 दिसंबर 2019 को मिला पहला मामला

अगर कोरोना की कहानी जाननी है तो सबसे पहले हमें कैलेंडर के पन्ने पलटने होंगे और शुरुआत 30 दिसंबर, 2019 से करनी होगी, जब दुनिया पहली बार कोरोना के नाम से रूबरू हुई। दरअसल, उस दिन चीन में कोरोना का पहला मरीज सामने आया था। इसके बाद यह महामारी पूरी दुनिया में फैलती चली गई। वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में सेंटर फॉर इमर्जिंग इंफेक्शियस डिजीज (बेहद संक्रामक रोगों की जानकार) की निदेशक शी झेंगली इसका खुलासा करती हैं। वह कहती हैं कि 30 दिसंबर, 2019 को शाम 7 बजे का वक्त हो रहा था। उस दौरान उन्हें सार्स सीओवी-2 (SARS-CoV-2) के बारे में पहली सूचना मिली, जिसे अब दुनिया भर में फैले कोविड-19 के सोर्स वायरस के रूप में जाना जाता है।

800 किमी दूर से जांच करने लौंटी झेंगली

एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में झेंगली ने बताया कि उस दिन उनके पास एक फोन कॉल आया। कॉलर ने उन्हें बताया कि वुहान लैब में कुछ रोगियों के नमूने आए हैं, जो एक असामान्य निमोनिया से पीड़ित हैं। झेंगली से कहा गया कि वह जो कुछ भी कर रही हैं, तत्काल छोड़ दें। तुरंत वुहान लैब लौटें और वायरस पर शोध करें। झेंगली उस वक्त वुहान से करीब 800 किमी दूर थीं। उन्होंने तुरंत ट्रेन पकड़ी और वुहान लैब पहुंच गईं। इसके बाद उन्होंने उस असामान्य निमोनिया पर शोध किया, जिसे बाद में कोरोना वायरस का नाम दिया गया। 

कोरोना की उत्पत्ति पर अब तक हुई यह चर्चा

गौरतलब है कि मार्च-अप्रैल 2021 तक पूरी दुनिया और वैज्ञानिक यही मानते रहे कि SARS-CoV-2 वायरस जानवरों और मनुष्यों के बीच संपर्क से फैसला। इसके पीछे तर्क दिया गया कि चमगादड़ से कोरोनावायरस की दूसरी प्रजाति के वायरस से इंसान संक्रमित हो गए। हालांकि, इस कनेक्शन के पीछे किसी भी तरह का तर्क नहीं दिया गया। इस बीच एक और चर्चा शुरू हुई, जिसमें कहा गया कि कोरोना वायरस लैब मेड हो सकता है। इसे वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में तैयार किया गया। हालांकि, डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के बाद इस अवधारणा को भी खारिज कर दिया गया, लेकिन अब वुहान लैब एक बार फिर हर किसी के निशाने पर है। 

झेंगली ने 16 साल में लिए 19 हजार नमूने

वुहान लैब भले ही कोरोना वायरस बनाने और फैलाने के आरोपों को सिरे से खारिज करती रही है। हालांकि, यह भी सच है कि शी झेंगली और उनकी टीम कोरोना फैलने यानी 2019 से 16 साल पहले से इस वायरस पर काम कर रही थी। वहीं, 2019 तक इसके 19,000 से अधिक नमूने एकत्रित कर चुकी थी। फिलहाल, यह कहा जा रहा है कि कोरोना ‘लैब-मेड’ वायरस नहीं था, लेकिन निश्चित रूप से उन वायरसों में से एक हो सकता है, जिनका वहां अध्ययन किया जा रहा था। इस मामले में शी झेंगली पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया गया है, लेकिन वह खुद को क्लीन चिट दे चुकी हैं। 

फिर दुनिया में फैला कोरोना का खौफ

चीन के वुहान में कोरोना फैलने के कुछ ही महीनों बाद इसका प्रकोप पूरी दुनिया में नजर आने लगा। ऐसे में शी झेंगली की टीम ने दो सप्ताह तक इस वायरस पर शोध किया। उन्होंने वायरस के जीनोम में हुए बदलाव की जानकारी डब्ल्यूएचओ के साथ साझा की। हालांकि, जब तक महामारी का असली रूप सामने आया, तब तक 80 लोगों इसके शिकार बन चुके थे। झेंगली और उनकी टीम के शोध में दावा किया गया कि यह वायरस प्राकृतिक तरीके से फैला। इस नए निमोनिया का संभावित स्रोत एक जलाशय बताया गया, जहां चमगादड़ मरे हुए मिले थे। फरवरी 2020 में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया कि नया वायरस पुराने सार्स से 79.6 फीसदी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें चमगादड़ में मिलने वाले कोरोनावायरस 96 फीसदी से अधिक हैं। हालांकि, बाद में यह दावा भी किया गया कि वुहान के सी-फूड मार्केट से यह महामारी फैली। यह भी कहा गया कि शी झेंगली इसका पता लगाने गई थीं, जिसके बाद वायरस के ट्रेसेज लैब के दरवाजों व अन्य जगह मिले। 

एक-दूसरे की विरोधी थीं शुरुआती अवधारणाएं

कोरोना फैलने को लेकर शुरुआत में दो तरह के दावे किए गए। पहला यह कि चमगादड़ में पाए जाने वाले कोरोनावायरस से यह 96 फीसदी मिलता-जुलता है। दूसरा यह कि वायरस सी-फूड मार्केट से फैला। अहम बात यह है कि दोनों ही अवधारणाएं एक-दूसरे के उलट थीं। हालांकि, लगातार जारी हो रहे उल्लेखों, उद्धरणों, बयानों और साक्षात्कारों के बीच एक अस्पष्ट कहानी भी सामने आई। इसमें कहा गया कि कोरोना के प्रकोप को रोकने के लिए 16 साल से शोध चल रहा था, जिसके ट्रेसेज लैब के दरवाजे पर मिले थे। दरअसल, शी झेंगली ने अपने बयानों में एक ऐसे वायरस की जानकारी भी दी, जो SARS-CoV-2 जैसा था, जिसे RaTG13 नाम दिया गया। इसके बाद झेंगली द्वारा वायरस फैलने की आशंका जाहिर की जाने लगी। 

2012 में मिला था रहस्यमयी निमोनिया

गौरतलब है कि अप्रैल 2012 के दौरान चीन में 6 नाबालिग रहस्यमयी निमोनिया की चपेट में आ गए। इसका असर बच्चों के रेस्पिरेटरी सिस्टम पर हुआ और तीन की मौत हो गई। ये लोग एक बंद पड़ी कॉपर की खदान में काम करते वक्त चमगादड़ों की चपेट में आ गए थे। इसी साल कुछ महीने बाद शी झेंगली और उनकी टीम को 4 सीरो सैंपल मिले, जिनमें तीन मरीज बच गए, लेकिन एक की मौत हो गई। उन्होंने इसका मिलान इबोला, निपाह और सार्स से किया, लेकिन रिपोर्ट निगेटिव आई। उसके बाद 2015 तक झेंगली और उनकी टीम ने उन गुफाओं से 1322 सैंपल जुटाए, जिनमें 293 सैंपल अलग-अलग तरीकों के कोरोनावायरस के थे। इनमें 8 सैंपल बीटा कोरोनावायरस के थे, जबकि इन 8 में से एक RaTG13 वायरस था, जिसकी पहचान 2016 में हुई। इसे RaBtCoV/4991 नाम दिया गया। यह वायरस पुराने सार्स वायरस से एकदम अलग था, जिसे वायरस का नया स्ट्रेन कहा गया। उस दौरान माना गया कि बीटा कोरोना वायरस सार्स और मर्स के नए रूप हैं। 

झेंगली लगातार खारिज करती रहीं कोरोना की थ्योरी

दो साल बाद यानी 2018 में RaTG13 वायरस और ज्यादा अनुक्रमित हो गया। वहीं, इसके दो साल बाद यानी 2020 में जब इसका मिलान SARS-CoV-2 से किया गया तो 96.2 फीसदी समानता मिली। हालांकि, नवंबर 2020 में प्रकाशित एक लेख में झेंगली ने फरवरी 2020 के उस दावे को दोहराया, जिसमें कहा गया था कि 2012 के दौरान संक्रमित हुए मजदूरों के सैंपल का मिलान SARS-CoV-2 से किया गया था, लेकिन नतीजे निगेटिव आए थे। इसका मतलब यह था कि मजदूरों कोरोना से संक्रमित नहीं हुए थे। यह निष्कर्ष लैब से कोरोना फैलने की अवधारणा सामने आने के कुछ महीने बाद दिया गया। हालांकि, कुछ शोध में यह दावा किया गया कि उन मजदूरों को चमगादड़ों के चलते संक्रमण हुआ था, लेकिन झेंगली ने कहा कि अगर ऐसा होता तो खदान में लंबे समय तक वायरस मिलता। झेंगली ने कहा कि वे मजदूर एक जलाशय में फैले फंगल निमोनिया के संपर्क में आए थे। 

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30 दिसंबर 2019 को मिला पहला मामला

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एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

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विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

विस्तार

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

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नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

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शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

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वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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