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यूपी : प्रदेश में ब्लैक फंगस के एक हजार मरीज, 54 की निकाली गईं आंखें, 80 की मौत

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कोरोना वायरस के खतरों के बीच प्रदेश में ब्लैक फंगस भी कहर बरपा रहा है। अब तक मरीजों की संख्या एक हजार के करीब पहुंच गई है। 54 मरीजों की आंखें निकालनी पड़ी हैं, जबकि 80 लोगों ने जान गंवा दी है। दावों के विपरीत हकीकत यह है कि अब तक इसका मुकम्मल इलाज ठीक से शुरू नहीं हो सका है। बड़े शहरों में तो तत्काल इलाज मिल भी रहा है, लेकिन छोटे शहरों से मरीजों को सिर्फ रेफर किया जा रहा है। जब तक वह हायर सेंटर पहुंच रहे हैं तबतक हालत बिगड़ चुकी होती है। दवाएं और इंजेक्शन न मिलने की शिकायतें भी कई जगह से मिल रही हैं। इंजेक्शन के इंतजार में चली गई जानगाजियाबाद के एक मरीज में तीनों ही फंगस के लक्षण थे। उसे बचाने के लिए इंजेक्शन की जरूरत थी, लेकिन इंजेक्शन नहीं मिल सका और उसकी मौत हो गई। इलाज वक्त पर नहीं मिल रहा है इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि शाहजहांपुर में 5 मरीज मिले थे लेकिन जब तक वह रेफर होकर बड़े शहर पहुंचते दो मरीजों की मौत हो गई। इसी तरह पीलीभीत में तीन ही मरीज मिले लेकिन उनमें से भी एक को बचाया नहीं जा सकामुरादाबाद में 17 मरीज मिले, सबकी आंखें निकालनी पड़ींप्रदेश में सबसे ज्यादा असर मुरादाबाद में देखने को मिला। यहां 17 मरीज में ब्लैक फंगस के लक्षण पाए गए थे और सभी की आंखें निकालनी पड़ी। वाराणसी में कुल 128 मरीजों में 19 की मौत हो गई, जबकि 14 की आंखें निकालनी पड़ीं। यह आंकड़े फंगस की भयावहता की गवाही देते हैं। अपर जिला जज ने भी गंवाई थी ब्लैक फंगस से जानबिजनौर के एडीजे राजू प्रसाद की मौत भी ब्लैक फंगस की वजह से ही होनी बतायी जा रही है। हालांकि प्रशासन पुष्टि नहीं कर रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जो लक्षण उनमें थे वह फंगस के ही थे, उसका ही इलाज चल रहा था।निगेटिव मरीजों पर भी फंगस का असरमेरठ मेडिकल कॉलेज में फिलहाल 84 ब्लैक फंगस के मरीजों का इलाज चल रहा है, लेकिन इनमें 33 कोरोना पॉजिटिव हैं, 51 मरीज निगेटिव हैं, फिर भी उन्हें फंगस ने अपनी चपेट में ले लिया है। एसजीपीजीआई को बनाया गया नोडल सेंटरलखनऊ एसजीपीजीआई को ब्लैक फंगस के इलाज का नोडल सेंटर बनाया गया है। यहां 13 डॉक्टरों की टीम तैनात की गई है, जो प्रदेश के दूसरे सेंटरों के डॉक्टरों से समन्वय कर यहां से देखरेख कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने भी अफसरों को हेल्पलाइन के जरिए मरीजों से बातचीत करने के आदेश दिए हैं। उन्होंने इलाज के लिए जरूरी इंजेक्शन एम्फोटेरेसिन-बी और दो अन्य टैबलेट की कमी न होने देने के आदेश दिए हैं। हालांकि दवाओं की उपलब्धता जांचने की कोई व्यवस्था नहीं है।  
जिलों में ब्लैक फंगस के मरीजों की मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। निजी अस्पतालों में कई लोग इलाज करा रहे हैं लेकिन इनके आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं। यही नहीं जब जिलों से मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है तो कोई आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं रहता है। वह बाद में यह जानने की कोशिश भी नहीं कर रहे कि उनका मरीज किस हाल में है। इसलिए जिलों के पास मरीजों का अपडेट भी नहीं मिल रहा। अपडेट न मिलने से इलाज की व्यवस्था भी ठीक से नहीं कराई जा पा रही है। जिला          रोगी     मौत   आंखें निकालींबुलंदशहर      4       1        0मैनपुरी          6       2        1कासगंज        1       1        0अलीगढ़        13      0        7 (रोशनी गई)गौतमबुद्धनगर   72      7        0मुरादाबाद       17      0        17रामपुर           6       1         0अमरोहा         5       1         1   संभल           1       0          0मेरठ            184     16        5मुजफ्फरनगर      6       1         0शामली            5       0         0सहारनपुर          6       1         1गोरखपुर           15       5         0 बस्ती               4        1        0महराजगंज          3,       0        0देवरिया             1        0         0गाजियाबाद         65       2        हापुड़               7         3        1वाराणसी           128       19      14आगरा              46        4         2मथुरा               9         2          0फिरोजाबाद          3         1          2झांसी                45       4         2प्रयागराज             13      0          0बरेली                 47      0          0लखीमपुर खीरी        5       1          0पीलीभीत              3       1          0शाहजहांपुर            5        2          0बदायूं                  2        0          0कानपुर                 31      8          1औरैया                  1        1          0 लखनऊ               310     32         0कुल मरीज             1069   112       54

विस्तार

कोरोना वायरस के खतरों के बीच प्रदेश में ब्लैक फंगस भी कहर बरपा रहा है। अब तक मरीजों की संख्या एक हजार के करीब पहुंच गई है। 54 मरीजों की आंखें निकालनी पड़ी हैं, जबकि 80 लोगों ने जान गंवा दी है। दावों के विपरीत हकीकत यह है कि अब तक इसका मुकम्मल इलाज ठीक से शुरू नहीं हो सका है। बड़े शहरों में तो तत्काल इलाज मिल भी रहा है, लेकिन छोटे शहरों से मरीजों को सिर्फ रेफर किया जा रहा है। जब तक वह हायर सेंटर पहुंच रहे हैं तबतक हालत बिगड़ चुकी होती है। दवाएं और इंजेक्शन न मिलने की शिकायतें भी कई जगह से मिल रही हैं। 

इंजेक्शन के इंतजार में चली गई जान
गाजियाबाद के एक मरीज में तीनों ही फंगस के लक्षण थे। उसे बचाने के लिए इंजेक्शन की जरूरत थी, लेकिन इंजेक्शन नहीं मिल सका और उसकी मौत हो गई। इलाज वक्त पर नहीं मिल रहा है इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि शाहजहांपुर में 5 मरीज मिले थे लेकिन जब तक वह रेफर होकर बड़े शहर पहुंचते दो मरीजों की मौत हो गई। इसी तरह पीलीभीत में तीन ही मरीज मिले लेकिन उनमें से भी एक को बचाया नहीं जा सका

मुरादाबाद में 17 मरीज मिले, सबकी आंखें निकालनी पड़ीं
प्रदेश में सबसे ज्यादा असर मुरादाबाद में देखने को मिला। यहां 17 मरीज में ब्लैक फंगस के लक्षण पाए गए थे और सभी की आंखें निकालनी पड़ी। वाराणसी में कुल 128 मरीजों में 19 की मौत हो गई, जबकि 14 की आंखें निकालनी पड़ीं। यह आंकड़े फंगस की भयावहता की गवाही देते हैं। 
अपर जिला जज ने भी गंवाई थी ब्लैक फंगस से जान
बिजनौर के एडीजे राजू प्रसाद की मौत भी ब्लैक फंगस की वजह से ही होनी बतायी जा रही है। हालांकि प्रशासन पुष्टि नहीं कर रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जो लक्षण उनमें थे वह फंगस के ही थे, उसका ही इलाज चल रहा था।
निगेटिव मरीजों पर भी फंगस का असर
मेरठ मेडिकल कॉलेज में फिलहाल 84 ब्लैक फंगस के मरीजों का इलाज चल रहा है, लेकिन इनमें 33 कोरोना पॉजिटिव हैं, 51 मरीज निगेटिव हैं, फिर भी उन्हें फंगस ने अपनी चपेट में ले लिया है। 

एसजीपीजीआई को बनाया गया नोडल सेंटर

लखनऊ एसजीपीजीआई को ब्लैक फंगस के इलाज का नोडल सेंटर बनाया गया है। यहां 13 डॉक्टरों की टीम तैनात की गई है, जो प्रदेश के दूसरे सेंटरों के डॉक्टरों से समन्वय कर यहां से देखरेख कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने भी अफसरों को हेल्पलाइन के जरिए मरीजों से बातचीत करने के आदेश दिए हैं। उन्होंने इलाज के लिए जरूरी इंजेक्शन एम्फोटेरेसिन-बी और दो अन्य टैबलेट की कमी न होने देने के आदेश दिए हैं। हालांकि दवाओं की उपलब्धता जांचने की कोई व्यवस्था नहीं है।  

मरीजों की मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं

जिलों में ब्लैक फंगस के मरीजों की मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है। निजी अस्पतालों में कई लोग इलाज करा रहे हैं लेकिन इनके आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं। यही नहीं जब जिलों से मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है तो कोई आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं रहता है। वह बाद में यह जानने की कोशिश भी नहीं कर रहे कि उनका मरीज किस हाल में है। इसलिए जिलों के पास मरीजों का अपडेट भी नहीं मिल रहा। अपडेट न मिलने से इलाज की व्यवस्था भी ठीक से नहीं कराई जा पा रही है। जिला          रोगी     मौत   आंखें निकालींबुलंदशहर      4       1        0मैनपुरी          6       2        1कासगंज        1       1        0अलीगढ़        13      0        7 (रोशनी गई)गौतमबुद्धनगर   72      7        0मुरादाबाद       17      0        17रामपुर           6       1         0अमरोहा         5       1         1   संभल           1       0          0मेरठ            184     16        5मुजफ्फरनगर      6       1         0शामली            5       0         0सहारनपुर          6       1         1गोरखपुर           15       5         0 बस्ती               4        1        0महराजगंज          3,       0        0देवरिया             1        0         0गाजियाबाद         65       2        हापुड़               7         3        1वाराणसी           128       19      14आगरा              46        4         2मथुरा               9         2          0फिरोजाबाद          3         1          2झांसी                45       4         2प्रयागराज             13      0          0बरेली                 47      0          0लखीमपुर खीरी        5       1          0पीलीभीत              3       1          0शाहजहांपुर            5        2          0बदायूं                  2        0          0कानपुर                 31      8          1औरैया                  1        1          0 लखनऊ               310     32         0कुल मरीज             1069   112       54

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मरीजों की मॉनिटरिंग की व्यवस्था नहीं

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एक्सक्लूसिव: दूसरे जंगल में छोड़ने के बाद भी अपने ‘घर’ लौट आए तेंदुए, रेडियो कॉलर से पहली बार मिले साक्ष्य

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विजेंद्र श्रीवास्तव, अमर उजाला, हल्द्वानी
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 24 Jun 2021 02:01 AM IST

सार
रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। 

तेंदुआ
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

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उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।
मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

विस्तार

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से पकड़कर करीब सौ किलोमीटर दूर दूसरे जंगल में छोड़े गए तेंदुए अपने पुराने वास स्थल में लौट रहे हैं। रेडियो कॉलर लगाकर छोड़े गए तेंदुओं के अपने पुराने वास स्थल में लौट आने से इसकी पुष्टि हुई है।  

बाघ, तेंदुए अपने वास वाले भूभाग की सीमा निर्धारण के लिए पेड़ों पर पंजे से निशान बनाने से लेकर सीमा पर यूरिन करने तक के उपाय करते हैं। जब उनके क्षेत्र में कोई अन्य बाघ या तेंदुआ आ जाता है तो उनमें संघर्ष भी होता है। इसमें जो कमजोर साबित होता है, उसे इलाके से हटना पड़ता है।

कई बार आपसी संघर्ष में ये जीव मारे भी जाते हैं। अब रेडियो कॉलर लगाए जाने से पता चला है कि तेंदुओं में अपने वास स्थल को पहचानने का खास गुण होता है। बागेश्वर वन प्रभाग में पिछले साल नवंबर और मार्च-2021 में दो तेंदुए पकड़े गए थे।
इन तेंदुओं की हलचल पर नजर रखने के लिए वीएचएस तकनीक पर आधारित और सेटेलाइट पर काम करने वाले रेडियो कॉलर लगाया गया। बागेश्वर वन प्रभाग के तत्कालीन डीएफओ और वर्तमान में तराई पश्चिम वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी बीएस शाही बताते हैं कि नवंबर में पकड़े गए करीब सात साल के तेंदुए को उसके वास स्थल से करीब अस्सी किमी दूर दूसरे जंगल में छोड़ा गया।
इसी तरह मार्च में दूसरे तेंदुए को भी सौ किमी दूर छोड़ा गया। उनकी गतिविधि कीजानकारी रेडियो कॉलर से मिल रही थी। ये तेंदुए कई किमी चलकर अपने पुराने प्राकृतिक वास स्थल में पहुंच गए। उन्हें अपने पुराने वास स्थल में पहुंचने में कई दिन भी लगे थे।

लंबी दूरी तय करते हैं तेंदुए

मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं डॉ. तेजिस्वनी पाटिल का कहना है कि यह पहली बार है जब वास स्थल से दूर छोड़े गए तेंदुओं के अपने वास स्थल को पहचान कर वापस वहीं पहुंचने का पुष्ट साक्ष्य मिला है। वन्यजीवों और पक्षियों को दूसरे क्षेत्र में छोड़ने पर उनके फिर से अपने इलाके में लौटने की क्षमता को घर लौटने की प्रवृत्ति (होमिंग इन्स्टिंक्ट) कहते हैं। मसलन कबूतर, बिल्ली आदि में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है।हल्द्वानी अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के पूर्व उप निदेशक व वन्यजीव विशेषज्ञ जीएस कार्की का कहना है कि तेंदुए का वास स्थल कई बातों पर निर्भर करता है। एक तो एक ही इलाके में दो नर तेंदुए तो नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नर तेंदुओं में आपसी संघर्ष होगा। दूसरा, वास स्थल में तेंदुए के शिकार और भोजन के लिए जानवर  हैं कि नहीं। तेंदुए अपनी सीमा बनाने के साथ पहचान के निशान छोड़ते हैं। वह लंबी दूरी भी तय करते हैं। ऐसे में संभावना है कि वह परिस्थितियों और सीमा बनाने की आदत के चलते अपने इलाके में पहुंच गए हों। यह एक संयोग भी हो सकता है।

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नैनीताल: कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही पर्यटकों से गुलजार हुई सरोवर नगरी, पार्किंग भी फुल, तस्वीरें… 

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 24 Jun 2021 12:16 AM IST

कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप कम होते ही नैनीताल आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। बुधवार को नैनीताल में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहा। इसके चलते मल्लीताल डीएसए कार पर्किंग में दोपहर के बाद पार्किंग फुल का बोर्ड लग गया। दूसरी ओर पुलिसकर्मी भी दिनभर यातायात व्यवस्था बनाने में जुटे रहे।
शहर में बीते एक सप्ताह से पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने लगी है। बुधवार को भी नैनीताल के पर्यटक स्थलों पर बड़ी संख्या में सैलानी नजर आए। देर शाम तक तल्लीताल स्थित लेक ब्रिज और बारापत्थर से लगभग एक हजार पर्यटक वाहनों ने शहर में प्रवेश किया।
उत्तराखंड में कोरोना: 24 घंटे में मिले 149 नए संक्रमित, पांच की मौत, 95.36 फीसदी पहुंचा रिकवरी रेट
इससे नैनीताल के डीएसए की पार्किंग फुल हो गई। इधर पूरे दिन पंतपार्क, मॉलरोड, चाट बाजार और बैंड स्टैंड में पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ था। सैलानियों ने पूरे दिन नैनीझील में नौकायन का लुत्फ उठाया।
बारिश से आफत: 30 घंटे में तय हो रहा चार घंटे का सफर, लकड़ी के लट्ठों के सहारे नाले पार कर रहे लोग, तस्वीरें…
बारापत्थर में पर्यटकों ने घुड़सवारी का आनंद भी लिया। पर्यटकों ने सुहावने मौसम के बीच खूब मौजमस्ती की। पर्यटकों की बढ़ती संख्या को देखकर कारोबारियों के चेहरे पर भी रौनक आ गई है।

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शर्मनाक: जिस लैब से फैला कोरोना, चीन ने अवार्ड के लिए किया नामित

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वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बीजिंग
Published by: Jeet Kumar
Updated Thu, 24 Jun 2021 01:45 AM IST

सार
चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए वुहान लैब को शीर्ष अवार्ड देने के इरादे से उसे नामित किया है

वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी
– फोटो : विकी कॉमन

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कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोनाडॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

विस्तार

कोरोना वायरस ने दुनिया भर में एक साल से ज्यादा का समय पूरा कर लिया है, लाखों जानें ले चुका ये वायरस दुनिया जानती है कि चीन स्थित वुहान लैब से निकला। पहला केस भी वुहान में पाया गया था। वहीं हैरान करने वाली बात यह है इस विवादित लैब को चीन ने अवार्ड के लिए नामित किया है।

चीन ने वुहान की इस विवादित लैब को चाइनीज अकाडेमी ऑफ साइंसेज ने कोविड-19 पर बेहतरीन रिसर्च करने की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए सबसे बड़े अवार्ड को देने के इरादे से उसे नामित किया है। 

कई रिपोर्ट्स में यह बताया जा रहा है कि चीन की अकाडेमी ऑफ साइंसेज की तरफ से कहा गया है कि इस लैब द्वारा किए गए महत्वपूर्व रिसर्च की बदौलत कोरोना वायरस की उत्पति, महामारी विज्ञान और इसके रोगजनक मैकनिज्म को समझने में मदद मिली है। 
इसके परिणामों के फलस्वरूप कोरोना वायरस के खिलाफ दवाओं और वैक्सीन को बनाने का रास्ता साफ हुआ। साथ ही वुहान लैब ने महामारी के प्रसार को रोकने और बचाव के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक और तकनीकी समर्थन मुहैया कराया। अकाडेमी के अनुसार, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के रिसर्च ने कोरोना वायरस महामारी की रोकथाम और कोरोना की काट यानी कोरोना की वैक्सीन बनाने की दिशा में अभूतपूर्व योगदान दिया है। 
डॉ. फॉसी ने जताई थी आशंका, लैब से फैला कोरोना
डॉ. फॉसी ने कहा था, वह शुरू से ही कोरोना वायरस के प्रयोगशाला लीक होने की थ्योरी को लेकर तैयार थे। उन्होंने माना कि ये संभवतया एक इंजीनियर्ड वायरस हो सकता है जिसका प्रयोगशाला से आकस्मिक रिसाव हो गया। 

हालांकि लीक थ्योरी का समर्थन करने के बावजूद फॉसी का मानना है कि जानवरों के प्रसार के कारण इस महामारी की उत्पत्ति की अधिक संभावना है। 
एक फरवरी को वैज्ञानिकों से फोन कॉल पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए फॉसी ने कहा, मुझे अच्छी तरह याद है कि हमने तत्कालीन स्थिति पर सावधानीपूर्वक गौर करने का निर्णय लिया। उस कॉन्फ्रेंस कॉल पर जुड़े कई वैज्ञानिकों में से एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ क्रिस्टन एंडरसन भी थे। 

एंडरसन ने ही इस कॉल से एक दिन पहले फॉसी को लिखे ईमेल में कोरोना वायरस की असामान्य विशेषताओं का जिक्र किया था। उन्होंने इसके कुछ इंजीनियर्ड दिखने वाले गुणों का पता लगाने के लिए इसके सभी अनुक्रमों की करीबी पड़ताल करने की जरूरत बताई थी। 

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