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कुरुक्षेत्र: केशव मौर्य हो सकते हैं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तो योगी के सामने आचार्य को उतार सकती है कांग्रेस

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सार
अगले साल पहले होने वाले चार राज्यों और उसके बाद दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में पंजाब को छोड़कर पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और कोरोना काल की विपत्ति से जूझते माहौल में भाजपा के सामने इन पांचों राज्यों को बचाने की चुनौती है…

केशव प्रसाद मौर्य और आचार्य प्रमोद कृष्णम
– फोटो : Amar Ujala

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कोरोना के दूसरे आक्रमण से जूझते देश में अब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर है। रविवार को भाजपा नेतृत्व की शीर्ष स्तर की लंबी बैठक के बाद बनी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में सत्ताकेंद्र को विकेंद्रित करने, संगठन को सरकार के समानांतर शक्ति संपन्न बनाने का फैसला किया गया है। यह जानकारी देने वाले सूत्रों का कहना है कि उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को एक बार फिर प्रदेश संगठन का अध्यक्ष बनाया जा सकता है और गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर अधिकार संपन्न किया जा सकता है। लेकिन इन दोनों मामलों में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य से चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।उधर कांग्रेस के भीतर भी प्रदेश में किसी ऐसे चेहरे को आगे करने का दबाव बढ़ता जा रहा है, जो भाजपा के हिंदुत्व के ध्रुवीकरण को रोक सके और राजनीतिक विमर्श (नैरेटिव) बदल सके। इसके लिए पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार रहे कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम को प्रदेश संगठन या चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपने का सुझाव पार्टी नेतृत्व को दिया है।
अगले साल पहले होने वाले चार राज्यों और उसके बाद दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में पंजाब को छोड़कर पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और कोरोना काल की विपत्ति से जूझते माहौल में भाजपा के सामने इन पांचों राज्यों को बचाने की चुनौती है। वहीं भाजपा विरोधी दल इस महामारी से उत्पन्न आपदा को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश में जुट गए हैं। क्योंकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव वर्ष 2021 के आखिर नवंबर दिसंबर में होने हैं, इसलिए ज्यादा सरगर्मी अभी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा को लेकर है।कांग्रेस की कोशिश उत्तराखंड, गोवा में सरकार बनाने और पंजाब में अपनी सरकार दोबारा लाने की है, उत्तर प्रदेश में भी पार्टी यह अवसर देख रही है कि वह अपनी पिछली सात सीटों को कम से कम सत्तर या उससे ज्यादा तक पहुंचा सके तो प्रदेश में भविष्य में उसकी वापसी की उम्मीद बन सके और 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी अपने बलबूते कुछ सीटें जीत सके। वहीं समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में वापसी की राह देख रही है। सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लगता है कि भाजपा का मुकाबला सीधा सपा-रालोद गठबंधन से होगा, जिसमें कोरोना से हुई तबाही की नाराजगी का लाभ सपा को ही मिलेगा। क्योंकि बसपा और कांग्रेस, सपा के मुकाबले भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं।पहले बात भाजपा की। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को पश्चिम बंगाल की हार के बाद उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक चिंता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की एक बैठक हुई और इसके बाद नड्डा और शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देर रात तक बैठक की। बैठक में प्रदेश संगठन में फेरबदल करने और राज्य की नौकरशाही के साथ तालमेल बढ़ाने के लिए विधान परिषद सदस्य अरविंद शर्मा को मंत्रिमंडल में लेकर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने पर भी सहमति बनी। शर्मा ने जिस तरह प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में कोरोना संकट को नियंत्रित किया है, उसे लेकर भी केंद्रीय नेतृत्व उनका उपयोग अब राज्य स्तर पर करना चाहता है।बताया जाता है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के कामकाज पर भी चर्चा हुई। माना जा रहा है कि मौजूदा स्थितियों में उनके कामकाज को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि जिस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं में लगातार असंतोष बढ़ रहा है उसे देखते हुए प्रदेश संगठन में बदलाव की जरूरत है। इसलिए मौजूदा उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य को फिर से संगठन की कमान देकर पार्टी कार्यकर्ताओं विधायकों सांसदों के असंतोष को खत्म किया जा सकता है।इसके कुछ दिन पहले पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ बातचीत की और उन्हें कोरोना पीड़ितों की मदद करने और लोगों के बीच जाकर कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वार उठाए जा रहे कदमों की जानकारी देने का निर्देश दिया। पार्टी सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यह वक्त घर बैठने का नहीं लोगों के बीच काम करने का है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब महज आठ महीने का वक्त बचा है और अगर पार्टी को 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना है तो पहले उत्तर प्रदेश जीतना सबसे ज्यादा जरूरी है।बैठक में मौजूद एक सांसद के मुताबिक नड्डा ने सांसदों से प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामकाज का भी ब्यौरा लिया। बैठक में कुछ सांसदों ने राज्य सरकार में नौकरशाही के हावी होने और विधायकों-सांसदों की सुनवाई न होने की शिकायत भी की। इस पर पार्टी अध्यक्ष ने नसीहत दी कि यह वक्त आपसी मनमुटाव का नहीं मिलजुल कर काम करने का है। उन्होंने कहा कि हमें सेवा भावना से जुटना होगा और कोरोना की वजह से जो मुश्किल हालात बने हैं उसमें अगर हम जनता के बीच सेवा भावना से काम करेंगे तो लोगों की नाराजगी दूर होगी और भाजपा को फिर आम जनता का पहले जैसा समर्थन मिलेगा। भाजपा अध्यक्ष ने सांसदों से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और छवि का फायदा भाजपा को जरूर मिलेगा क्योंकि इनके टक्कर का कोई नेता विपक्ष के पास न देश में है न प्रदेश में।
इधर कांग्रेस में भी खासी हलचल है। पश्चिम बंगाल में सफाए और असम, केरल और पुद्दुचेरी में हार से पार्टी नेतृत्व बेहद असहज है। क्योंकि केरल से खुद राहुल गांधी सासंद हैं और उन्होंने प्रियंका गांधी के साथ केरल, असम और तमिलनाडु चुनावों में खासी मेहनत की थी। अब क्योंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव हैं और उनके ऊपर ही राज्य में पार्टी को चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी है, इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी विशेषरूप से चिंतित हैं। क्योंकि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कुछ बेहतर नहीं कर पाई तो उसका सीधा असर प्रियंका की छवि और लोकप्रियता पर पड़ेगा। राज्य में अब तक हुए विधानसभा उपचुनावों और पंचायत चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू मेहनती और संघर्षशील कार्यकर्ता होने के बावजूद पूरे प्रदेश में पार्टी का चेहरा नहीं बन सके हैं। उनकी संगठन पर वैसी पकड़ भी नहीं है जैसी कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री, सलमान खुर्शीद और राजबब्बर की थी।प्रियंका गांधी को लगातार यह फीडबैक भी मिल रहा है कि अगर पार्टी अजय लल्लू के नेतृत्व में चुनाव में गई तो मौजूदा सात सीटें भी बचेंगी या नहीं यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तब मुकाबला सीधा भाजपा बनाम सपा-रालोद गठबंधन के बीच हो जाएगा। इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी तीनों ही चिंतित हैं। इसलिए एक सुझाव जल्दी से जल्दी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने का भी है।उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प है समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके उसके द्वारा दी जाने वाली बमुश्किल तीस से 40 सीटों पर संतोष कर लेना। दूसरा विकल्प है येन केन प्रकारेण किसी तरह बसपा से गठबंधन करके इतनी या इससे कुछ ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना। तीसरा विकल्प है जैसी भी ही हालत हो सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ना या जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करके सौ सीटें रालोद को देकर खुद तीन सौ पर मैदान में उतरना। अब पहले विकल्प की संभावना इसलिए बेहद कम हो जाती है कि पिछला चुनाव कांग्रेस-सपा ने मिलकर लड़ा था और सपा को 47 व कांग्रेस को सात सीटें ही मिली थीं। क्योंकि दोनों का ही वोट एक-दूसरे को स्थानांतरित नहीं हुआ और अभी भी हो पाएगा इसकी कोई संभावना नहीं है। क्योंकि सपा-कांग्रेस का समान जनाधार मुस्लिम तो एक दूसरे के उम्मीदवार को मिल जाता है, लेकिन सपा का यादव और कांग्रेस का सवर्ण जनाधार एक-दूसरे के उम्मीदवार को न मिलकर अपने दल के उम्मीदवार की गैर-मौजूदगी में भाजपा को चला जाता है और भाजपा को इसका अतिरिक्त लाभ मिल जाता है जिससे उसकी उन सीटों पर जीत सुनिश्चित हो जाती है।वैसे भी अखिलेश इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए बहुत उत्सुक नहीं हैं। दूसरा विकल्प कांग्रेस बसपा गठबंधन का है। यह प्रयोग 1996 में हो चुका है और तब बसपा ने तीन सौ सीटें लड़कर सिर्फ 67 सीटें और कांग्रेस ने 125 सीटें लड़कर महज 33 सीटें जीती थीं। वैसे भी मायावती घोषणा कर चुकी हैं कि इस बार वह किसी दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगी, इसलिए यह संभावना न के बराबर है। तीसरा विकल्प कांग्रेस और रालोद गठबंधन का है, लेकिन रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मिलकर चौधऱी चरण सिंह की सियासी विरासत को फिर से सहेजने में जुटे हैं और पंचायत चुनावों में दोनों ने मिलकर भाजपा को पछाड़ा है। ऐसे में रालोद कांग्रेस के साथ समझौता करेगा इसकी संभावना फिलहाल न के बराबर है।
अब कांग्रेस के पास सभी 403 सीटों पर अकेले या कुछ छोटे-छोटे दलों को मिलाकर चुनाव लड़ने का है। लेकिन क्या उसके पास आज के हालात में सभी सीटों पर ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं जो कम से कम चुनावी टक्कर दे सकें। अभी तो हाल यह है कि पार्टी ने 2017 में जो सात सीटें जीती थीं, उनमें से एक रायबरेली की विधायक अदिति सिंह भाजपा के साथ हैं और दो सीटें जिनमें एक रामपुर खास जहां से आराधना मिश्रा यानी मोना जो प्रमोद तिवारी की बेटी हैं, वह विधायक हैं और दूसरी सीट देवरिया से प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू विधायक हैं। चूंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं और पूरा चुनाव अभियान उनके जिम्मे है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों, उपचुनावों और पंचायत चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व प्रियंका गांधी को चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाने का जोखिम नहीं उठाएगा और अजय लल्लू अभी तक पूरे प्रदेश का चेहरा नहीं बन सके हैं। तब अगर कांग्रेस बिना किसी नेता को आगे किए लड़ेगी तो कितने वोट और कितनी सीट पाएगी यह कहने में भी संकोच होता है।लेकिन कोविड काल में राज्य सरकार की विफलता गंगा में तैरती और किनारों पर दफन लाशों, श्मशानों और कब्रिस्तानों पर लंबी कतारें, अस्पतालों में इलाज और ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ते मरीजों और बेड के इंतजार में अस्पतालों के बाहर एंबुलेंसों की लाइनों में तड़पते मरीज और उनके परिजनों की भीड़, दवाई के लिए भटकते लोगों से ही साबित हो चुकी है। कांग्रेस को इसमें अपनी वापसी का अवसर दिख तो रहा है लेकिन संगठन और प्रदेश नेतृत्व की मौजूदा हालत की वजह से उसके कार्यकर्ताओं में मनोबल और विश्वास की कमी है। ऐसे में कांग्रेस को अगर उत्तर प्रदेश में कुछ भी कमाल करके प्रियंका गांधी की साख और राजनीतिक भविष्य बचाना है तो कुछ न कुछ करना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है उत्तर प्रदेश कांग्रेस का चेहरा बदलना और ऐसे नेता को आगे लाना जो न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं और बचे-खुचे जनाधार का मनोबल बढ़ा सके, उनमें जीत का विश्वास पैदा कर सके बल्कि चुनाव का समीकरण, व्याकरण और गणित भी बदल सके। भाजपा के नारों और विमर्श का जवाब देकर अपने पक्ष में नया विमर्श जिसे सियासी भाषा में नैरेटिव कहा जाता है, वो बना सके।उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण के लिहाज से कांग्रेस के पास सिर्फ कुछ मुस्लिम और कुछ समर्पित पुराने कांग्रेसियों का वोट ही बचा है और जहां कोई मजबूत उम्मीदवार कुछ अतिरिक्त वोट जुटा लेता है वह मुकाबले में आ जाता है। क्योंकि कांग्रेस का मूल जनाधार सर्वण, दलित, मुस्लिम भाजपा-बसपा और सपा में बंट चुका है। अब कांग्रेस की वापसी तभी संभव है जब वह भाजपा से सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण, सपा से मुस्लिम और बसपा से दलितों को वापस ले। इसके लिए कांग्रेस पिछले तीस सालों में कई प्रयोग करके देख चुकी है। लेकिन उसका ग्राफ गिरता गया है। जितेंद्र प्रसाद, सलमान खुर्शीद, अरुण सिंह मुन्ना, जगदंबिका पाल, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री और राजबब्बर जैसे दिग्गजों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के बावजूद पार्टी उत्तर प्रदेश में न तो अपना खोया जनाधार पा सकी और न ही अपनी सीटों की संख्या तीन दर्जन से आगे कर सकी।
अब 2022 विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस के लिए देश के सबसे बड़े राज्य में कुछ कर दिखाने का मौका है। बशर्ते कि कांग्रेस अपने पत्ते सही खेले। उत्तर प्रदेश में भाजपा इन दिनों जबर्दस्त भीतरी खींचतान और जातीय संघर्ष से जूझ रही है। चुनावों से पहले केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश अध्यक्ष थे और बिना उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए भी भाजपा ने पिछड़ों को यह संदेश दे दिया था कि सरकार बनने पर मौर्य ही मुख्यमंत्री होंगे, जबकि सवर्णों में दिनेश शर्मा, महेंद्र नाथ पांडे, मनोज सिन्हा जैसे नाम चलाए गए। लेकिन जब पार्टी को 325 सीटों का जबरदस्त बहुमत मिला तो अचानक योगी आदित्यनाथ को कमान दे दी गई। केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ों और ब्राह्रणों को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन अब चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं भाजपा के भीतर जातीय आधार पर खेमेबंदी तेज होती जा रही है। योगी सरकार पर एक जाति विशेष को विशेष संरक्षण देने के आरोप न सिर्फ विपक्षी दल बल्कि भाजपा के भीतर भी दबी जुबान से लगाए जाते हैं।भाजपा की इस अंदरूनी खींचतान को कांग्रेस के कुछ नेता पार्टी के लिए अवसर मानते हैं। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के मुताबिक यह सही वक्त है जब किसी ब्राह्मण चेहरे को आगे करके पार्टी राज्य में ब्राह्मणों को अपनी ओर खींच सकती है। कभी कांग्रेस के युवा चेहरों में शुमार रहे इस कांग्रेस नेता का कहना है कि अगर कांग्रेस आक्रामक तरीके से ब्राह्मण कार्ड खेले तो सिर्फ संघ के शाखाधारी ब्राह्मणों को छोडकर ज्यादातर ब्राह्मण अपनी पुरानी पार्टी के साथ आ जाएंगे। क्योंकि उनके परिवारों ने पीढ़ियों से कांग्रेस का ही साथ दिया है और अगर ब्राह्मण कांग्रेस में वापस होते हैं तो मुसलमानों की बड़ी तादाद और अन्य जातियों का भी एक बड़ा हिस्सा वापस कांग्रेस की तरफ लौट सकता है। ऐसा होने पर आज सात सीटों वाली कांग्रेस 2022 में सौ सीटों के आसपास पहुंच सकती है, जो 2024 में लोकसभा की कम से कम 20 से 25 सीटें जीतने की जमीन तैयार कर सकती है जैसा कि 2009 में हुआ था।अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास ऐसे कौन से चेहरे हैं, जिनमें से किसी एक को आगे करके राज्य के 12 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचने का दांव पार्टी चल सके। पिछली बार प्रशांत किशोर ने शीला दीक्षित को बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करवाया था और इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में कुछ जान भी आई थी, लेकिन बाद में सर्जिकल स्ट्राइक और सपा के साथ गठबंधन ने सारी रणनीति पर पानी फेर दिया था। इस बार कांग्रेस में ब्राह्मण नेताओं के नाम पर पूर्व मंत्री प्रमोद तिवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद, पूर्व सांसद राजेश मिश्रा, दिग्गज नेता पं.कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेश त्रिपाठी, पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी जैसे कुछ नाम हैं। जबकि एक समय के दिग्गज ब्राह्मण नेता सत्यदेव त्रिपाठी, भूधर नारायण मिश्र, नेकचंद पांडे जैसों को कांग्रेस ने बाहर का रास्ता दिखाया हुआ है।इनके अलावा एक और चर्चित नाम कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का है। प्रमोद कृष्णम जो साधु बनने से पहले कांग्रेस में ही थे और युवक कांग्रेस से लेकर कांग्रेस संगठन में कई पदों पर रह चुके हैं, उन गिने चुने साधुओं में हैं जो खुलकर कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार के लिए मीडिया में डटकर बोलते हैं। पार्टी उन्हें दो बार अपनी टिकट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा चुकी है। 2014 में वह संभल से और 2019 में लखनऊ में राजनाथ सिंह के खिलाफ वह चुनाव लड़ चुके हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कई विधानसभा चुनावों में कांग्रेस उन्हें बतौर स्टार प्रचारक चुनाव प्रचार के लिए भेज चुकी है।पिछले काफी समय से आचार्य प्रमोद कृष्णम उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा उत्पीड़न और उन पर अत्याचार का आरोप लगाते हुए काफी हमले कर रहे हैं। कानपुर के विकास दुबे कांड में विकास और उसके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर भी प्रमोद कृष्णम मीडिया में बहुत आक्रामक रहे हैं। ब्राह्मणों के मुद्दे पर कई बार उन्होंने कांग्रेस पार्टी की नीतियों की सीमा भी लांघी है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर आचार्य के बाद जितिन प्रसाद भी खासे मुखर रहे हैं। पार्टी द्वारा पश्चिम बंगाल का चुनाव प्रभारी बनाए जाने से पहले उन्होंने पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का एक पूरा नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए बनाकर जहां भी किसी ब्राह्मण की हत्या या कोई और घटना हुई, जितिन प्रसाद ने उसका संज्ञान लेकर पूरी सूची जारी की और राज्य सरकार से पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा और सुरक्षा देने की मांग करके इस मुद्दे को गरम किया।
अब सवाल है कि क्या कांग्रेस इनमें से किसी को उत्तर प्रदेश में चेहरा बनाएगी। प्रमोद तिवारी जिनकी उत्तर प्रदेश में गाजियाबद से गोरखपुर तक पार्टी संगठन पर पकड़ भी है और पहचान भी, कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं में सबसे बड़ा नाम हैं। लेकिन कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक उनकी दिलचस्पी खुद प्रदेश अध्यक्ष या चेहरा न बन कर अपनी बेटी आराधना यानी मोना मिश्रा को आगे करने में है। जबकि राजेश मिश्रा उस वाराणसी से हैं जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं। इसलिए मोदी के मुकाबले उनका व्यक्तित्व कहीं नहीं ठहरता और उनका असर भी पूर्वांचल के वाराणसी के आसपास के जिलों तक ही सीमित है। बड़ी पारिवारिक विरासत के बावजूद यही स्थिति ललितेश त्रिपाठी की भी है।जबकि जितिन प्रसाद को पार्टी ने पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब केंद्र में मंत्री बने रहने और राष्ट्रीय राजनीति में ही बने रहने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी थी। हालांकि अब उन्हें अगर प्रदेश संगठन की कमान दी जाती है तो उन्हें बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी। इसी तरह बुंदेलखंड के पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी का प्रभाव भी महज बुंदेलखंड तक ही सीमित है। पूर्वांचल, मध्यप्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी कोई खास पहचान नहीं है।अब बात आचार्य प्रमोद कृष्णम की। लगातार मीडिया में कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार का बेहद मजबूती और आक्रामक तरीके बचाव करने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में उनकी खासी लोकप्रियता हो गई है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर उनकी अत्याधिक मुखरता और साधुवेश ने उन्हें प्रदेश में कांग्रेस का एक आक्रामक ब्राह्मण नेता बना दिया है। कल्कि पीठाधीश्वर होने के कारण उन्हें आगे करके कांग्रेस चुनावों को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचा सकती है। साथ ही योगी बनाम आचार्य का मुकाबला बेहद दिलचस्प इसलिए भी हो जाएगा कि देश-प्रदेश के साधु समाज में भी खासा विभाजन हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े संत जहां भाजपा और योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े दिखाई देंगे तो वहीं इनके दायरे से बाहर के साधु संत आचार्य प्रमोद कृष्णम के साथ आ सकते हैं। 2018 के मध्यप्रदेश चुनाव में आचार्य यह करिश्मा कर चुके हैं, जब कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में हजारों साधुओं ने कांग्रेस के पक्ष में जबलपुर में जुलूस निकालकर अपना समर्थन दिया था। भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस का यह हिंदू कार्ड मुसलमानों को भी इसलिए परेशान नहीं करेगा क्योंकि आचार्य प्रमोद कृष्णम की मुसलमानों में भी अच्छी खासी लोकप्रियता है और देश-प्रदेश के नामी गिरामी मुस्लिम धर्मगुरु उनके साथ आ सकते हैं।लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की समस्या ये है कि उसे फैसला और वह भी सही फैसला लेने में इतना वक्त लग जाता है कि तब तक उस फैसले का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए उत्तर प्रदेश में जहां अब एक-एक दिन अहम है, कांग्रेस अभी इसी उहापोह में है कि वह प्रदेश में अपना नेतृत्व और चेहरा बदले या जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दे। और प्रताप सिंह कैरो की कार से कुचलने वाले खरगोश की चर्चित कहानी कि खरगोश इसलिए मरा कि वह तय नहीं कर सका कि उसे आगे जाना है या पीछे जाना है। कांग्रेस पिछले लंबे समय से इसी दौर से गुजर रही है।

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कोरोना के दूसरे आक्रमण से जूझते देश में अब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर है। रविवार को भाजपा नेतृत्व की शीर्ष स्तर की लंबी बैठक के बाद बनी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में सत्ताकेंद्र को विकेंद्रित करने, संगठन को सरकार के समानांतर शक्ति संपन्न बनाने का फैसला किया गया है। यह जानकारी देने वाले सूत्रों का कहना है कि उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को एक बार फिर प्रदेश संगठन का अध्यक्ष बनाया जा सकता है और गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर अधिकार संपन्न किया जा सकता है। लेकिन इन दोनों मामलों में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य से चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।

उधर कांग्रेस के भीतर भी प्रदेश में किसी ऐसे चेहरे को आगे करने का दबाव बढ़ता जा रहा है, जो भाजपा के हिंदुत्व के ध्रुवीकरण को रोक सके और राजनीतिक विमर्श (नैरेटिव) बदल सके। इसके लिए पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार रहे कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम को प्रदेश संगठन या चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपने का सुझाव पार्टी नेतृत्व को दिया है।

अगले साल पहले होने वाले चार राज्यों और उसके बाद दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में पंजाब को छोड़कर पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और कोरोना काल की विपत्ति से जूझते माहौल में भाजपा के सामने इन पांचों राज्यों को बचाने की चुनौती है। वहीं भाजपा विरोधी दल इस महामारी से उत्पन्न आपदा को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश में जुट गए हैं। क्योंकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव वर्ष 2021 के आखिर नवंबर दिसंबर में होने हैं, इसलिए ज्यादा सरगर्मी अभी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा को लेकर है।कांग्रेस की कोशिश उत्तराखंड, गोवा में सरकार बनाने और पंजाब में अपनी सरकार दोबारा लाने की है, उत्तर प्रदेश में भी पार्टी यह अवसर देख रही है कि वह अपनी पिछली सात सीटों को कम से कम सत्तर या उससे ज्यादा तक पहुंचा सके तो प्रदेश में भविष्य में उसकी वापसी की उम्मीद बन सके और 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी अपने बलबूते कुछ सीटें जीत सके। वहीं समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में वापसी की राह देख रही है। सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लगता है कि भाजपा का मुकाबला सीधा सपा-रालोद गठबंधन से होगा, जिसमें कोरोना से हुई तबाही की नाराजगी का लाभ सपा को ही मिलेगा। क्योंकि बसपा और कांग्रेस, सपा के मुकाबले भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं।पहले बात भाजपा की। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को पश्चिम बंगाल की हार के बाद उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक चिंता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की एक बैठक हुई और इसके बाद नड्डा और शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देर रात तक बैठक की। बैठक में प्रदेश संगठन में फेरबदल करने और राज्य की नौकरशाही के साथ तालमेल बढ़ाने के लिए विधान परिषद सदस्य अरविंद शर्मा को मंत्रिमंडल में लेकर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने पर भी सहमति बनी। शर्मा ने जिस तरह प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में कोरोना संकट को नियंत्रित किया है, उसे लेकर भी केंद्रीय नेतृत्व उनका उपयोग अब राज्य स्तर पर करना चाहता है।बताया जाता है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के कामकाज पर भी चर्चा हुई। माना जा रहा है कि मौजूदा स्थितियों में उनके कामकाज को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि जिस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं में लगातार असंतोष बढ़ रहा है उसे देखते हुए प्रदेश संगठन में बदलाव की जरूरत है। इसलिए मौजूदा उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य को फिर से संगठन की कमान देकर पार्टी कार्यकर्ताओं विधायकों सांसदों के असंतोष को खत्म किया जा सकता है।इसके कुछ दिन पहले पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ बातचीत की और उन्हें कोरोना पीड़ितों की मदद करने और लोगों के बीच जाकर कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वार उठाए जा रहे कदमों की जानकारी देने का निर्देश दिया। पार्टी सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यह वक्त घर बैठने का नहीं लोगों के बीच काम करने का है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब महज आठ महीने का वक्त बचा है और अगर पार्टी को 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना है तो पहले उत्तर प्रदेश जीतना सबसे ज्यादा जरूरी है।बैठक में मौजूद एक सांसद के मुताबिक नड्डा ने सांसदों से प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामकाज का भी ब्यौरा लिया। बैठक में कुछ सांसदों ने राज्य सरकार में नौकरशाही के हावी होने और विधायकों-सांसदों की सुनवाई न होने की शिकायत भी की। इस पर पार्टी अध्यक्ष ने नसीहत दी कि यह वक्त आपसी मनमुटाव का नहीं मिलजुल कर काम करने का है। उन्होंने कहा कि हमें सेवा भावना से जुटना होगा और कोरोना की वजह से जो मुश्किल हालात बने हैं उसमें अगर हम जनता के बीच सेवा भावना से काम करेंगे तो लोगों की नाराजगी दूर होगी और भाजपा को फिर आम जनता का पहले जैसा समर्थन मिलेगा। भाजपा अध्यक्ष ने सांसदों से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और छवि का फायदा भाजपा को जरूर मिलेगा क्योंकि इनके टक्कर का कोई नेता विपक्ष के पास न देश में है न प्रदेश में।

इधर कांग्रेस में भी खासी हलचल है। पश्चिम बंगाल में सफाए और असम, केरल और पुद्दुचेरी में हार से पार्टी नेतृत्व बेहद असहज है। क्योंकि केरल से खुद राहुल गांधी सासंद हैं और उन्होंने प्रियंका गांधी के साथ केरल, असम और तमिलनाडु चुनावों में खासी मेहनत की थी। अब क्योंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव हैं और उनके ऊपर ही राज्य में पार्टी को चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी है, इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी विशेषरूप से चिंतित हैं। क्योंकि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कुछ बेहतर नहीं कर पाई तो उसका सीधा असर प्रियंका की छवि और लोकप्रियता पर पड़ेगा। राज्य में अब तक हुए विधानसभा उपचुनावों और पंचायत चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू मेहनती और संघर्षशील कार्यकर्ता होने के बावजूद पूरे प्रदेश में पार्टी का चेहरा नहीं बन सके हैं। उनकी संगठन पर वैसी पकड़ भी नहीं है जैसी कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री, सलमान खुर्शीद और राजबब्बर की थी।प्रियंका गांधी को लगातार यह फीडबैक भी मिल रहा है कि अगर पार्टी अजय लल्लू के नेतृत्व में चुनाव में गई तो मौजूदा सात सीटें भी बचेंगी या नहीं यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तब मुकाबला सीधा भाजपा बनाम सपा-रालोद गठबंधन के बीच हो जाएगा। इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी तीनों ही चिंतित हैं। इसलिए एक सुझाव जल्दी से जल्दी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने का भी है।उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प है समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके उसके द्वारा दी जाने वाली बमुश्किल तीस से 40 सीटों पर संतोष कर लेना। दूसरा विकल्प है येन केन प्रकारेण किसी तरह बसपा से गठबंधन करके इतनी या इससे कुछ ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना। तीसरा विकल्प है जैसी भी ही हालत हो सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ना या जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करके सौ सीटें रालोद को देकर खुद तीन सौ पर मैदान में उतरना। अब पहले विकल्प की संभावना इसलिए बेहद कम हो जाती है कि पिछला चुनाव कांग्रेस-सपा ने मिलकर लड़ा था और सपा को 47 व कांग्रेस को सात सीटें ही मिली थीं। क्योंकि दोनों का ही वोट एक-दूसरे को स्थानांतरित नहीं हुआ और अभी भी हो पाएगा इसकी कोई संभावना नहीं है। क्योंकि सपा-कांग्रेस का समान जनाधार मुस्लिम तो एक दूसरे के उम्मीदवार को मिल जाता है, लेकिन सपा का यादव और कांग्रेस का सवर्ण जनाधार एक-दूसरे के उम्मीदवार को न मिलकर अपने दल के उम्मीदवार की गैर-मौजूदगी में भाजपा को चला जाता है और भाजपा को इसका अतिरिक्त लाभ मिल जाता है जिससे उसकी उन सीटों पर जीत सुनिश्चित हो जाती है।वैसे भी अखिलेश इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए बहुत उत्सुक नहीं हैं। दूसरा विकल्प कांग्रेस बसपा गठबंधन का है। यह प्रयोग 1996 में हो चुका है और तब बसपा ने तीन सौ सीटें लड़कर सिर्फ 67 सीटें और कांग्रेस ने 125 सीटें लड़कर महज 33 सीटें जीती थीं। वैसे भी मायावती घोषणा कर चुकी हैं कि इस बार वह किसी दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगी, इसलिए यह संभावना न के बराबर है। तीसरा विकल्प कांग्रेस और रालोद गठबंधन का है, लेकिन रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मिलकर चौधऱी चरण सिंह की सियासी विरासत को फिर से सहेजने में जुटे हैं और पंचायत चुनावों में दोनों ने मिलकर भाजपा को पछाड़ा है। ऐसे में रालोद कांग्रेस के साथ समझौता करेगा इसकी संभावना फिलहाल न के बराबर है।

अब कांग्रेस के पास सभी 403 सीटों पर अकेले या कुछ छोटे-छोटे दलों को मिलाकर चुनाव लड़ने का है। लेकिन क्या उसके पास आज के हालात में सभी सीटों पर ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं जो कम से कम चुनावी टक्कर दे सकें। अभी तो हाल यह है कि पार्टी ने 2017 में जो सात सीटें जीती थीं, उनमें से एक रायबरेली की विधायक अदिति सिंह भाजपा के साथ हैं और दो सीटें जिनमें एक रामपुर खास जहां से आराधना मिश्रा यानी मोना जो प्रमोद तिवारी की बेटी हैं, वह विधायक हैं और दूसरी सीट देवरिया से प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू विधायक हैं। चूंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं और पूरा चुनाव अभियान उनके जिम्मे है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों, उपचुनावों और पंचायत चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व प्रियंका गांधी को चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाने का जोखिम नहीं उठाएगा और अजय लल्लू अभी तक पूरे प्रदेश का चेहरा नहीं बन सके हैं। तब अगर कांग्रेस बिना किसी नेता को आगे किए लड़ेगी तो कितने वोट और कितनी सीट पाएगी यह कहने में भी संकोच होता है।लेकिन कोविड काल में राज्य सरकार की विफलता गंगा में तैरती और किनारों पर दफन लाशों, श्मशानों और कब्रिस्तानों पर लंबी कतारें, अस्पतालों में इलाज और ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ते मरीजों और बेड के इंतजार में अस्पतालों के बाहर एंबुलेंसों की लाइनों में तड़पते मरीज और उनके परिजनों की भीड़, दवाई के लिए भटकते लोगों से ही साबित हो चुकी है। कांग्रेस को इसमें अपनी वापसी का अवसर दिख तो रहा है लेकिन संगठन और प्रदेश नेतृत्व की मौजूदा हालत की वजह से उसके कार्यकर्ताओं में मनोबल और विश्वास की कमी है। ऐसे में कांग्रेस को अगर उत्तर प्रदेश में कुछ भी कमाल करके प्रियंका गांधी की साख और राजनीतिक भविष्य बचाना है तो कुछ न कुछ करना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है उत्तर प्रदेश कांग्रेस का चेहरा बदलना और ऐसे नेता को आगे लाना जो न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं और बचे-खुचे जनाधार का मनोबल बढ़ा सके, उनमें जीत का विश्वास पैदा कर सके बल्कि चुनाव का समीकरण, व्याकरण और गणित भी बदल सके। भाजपा के नारों और विमर्श का जवाब देकर अपने पक्ष में नया विमर्श जिसे सियासी भाषा में नैरेटिव कहा जाता है, वो बना सके।उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण के लिहाज से कांग्रेस के पास सिर्फ कुछ मुस्लिम और कुछ समर्पित पुराने कांग्रेसियों का वोट ही बचा है और जहां कोई मजबूत उम्मीदवार कुछ अतिरिक्त वोट जुटा लेता है वह मुकाबले में आ जाता है। क्योंकि कांग्रेस का मूल जनाधार सर्वण, दलित, मुस्लिम भाजपा-बसपा और सपा में बंट चुका है। अब कांग्रेस की वापसी तभी संभव है जब वह भाजपा से सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण, सपा से मुस्लिम और बसपा से दलितों को वापस ले। इसके लिए कांग्रेस पिछले तीस सालों में कई प्रयोग करके देख चुकी है। लेकिन उसका ग्राफ गिरता गया है। जितेंद्र प्रसाद, सलमान खुर्शीद, अरुण सिंह मुन्ना, जगदंबिका पाल, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री और राजबब्बर जैसे दिग्गजों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के बावजूद पार्टी उत्तर प्रदेश में न तो अपना खोया जनाधार पा सकी और न ही अपनी सीटों की संख्या तीन दर्जन से आगे कर सकी।

अब 2022 विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस के लिए देश के सबसे बड़े राज्य में कुछ कर दिखाने का मौका है। बशर्ते कि कांग्रेस अपने पत्ते सही खेले। उत्तर प्रदेश में भाजपा इन दिनों जबर्दस्त भीतरी खींचतान और जातीय संघर्ष से जूझ रही है। चुनावों से पहले केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश अध्यक्ष थे और बिना उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए भी भाजपा ने पिछड़ों को यह संदेश दे दिया था कि सरकार बनने पर मौर्य ही मुख्यमंत्री होंगे, जबकि सवर्णों में दिनेश शर्मा, महेंद्र नाथ पांडे, मनोज सिन्हा जैसे नाम चलाए गए। लेकिन जब पार्टी को 325 सीटों का जबरदस्त बहुमत मिला तो अचानक योगी आदित्यनाथ को कमान दे दी गई। केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ों और ब्राह्रणों को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन अब चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं भाजपा के भीतर जातीय आधार पर खेमेबंदी तेज होती जा रही है। योगी सरकार पर एक जाति विशेष को विशेष संरक्षण देने के आरोप न सिर्फ विपक्षी दल बल्कि भाजपा के भीतर भी दबी जुबान से लगाए जाते हैं।भाजपा की इस अंदरूनी खींचतान को कांग्रेस के कुछ नेता पार्टी के लिए अवसर मानते हैं। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के मुताबिक यह सही वक्त है जब किसी ब्राह्मण चेहरे को आगे करके पार्टी राज्य में ब्राह्मणों को अपनी ओर खींच सकती है। कभी कांग्रेस के युवा चेहरों में शुमार रहे इस कांग्रेस नेता का कहना है कि अगर कांग्रेस आक्रामक तरीके से ब्राह्मण कार्ड खेले तो सिर्फ संघ के शाखाधारी ब्राह्मणों को छोडकर ज्यादातर ब्राह्मण अपनी पुरानी पार्टी के साथ आ जाएंगे। क्योंकि उनके परिवारों ने पीढ़ियों से कांग्रेस का ही साथ दिया है और अगर ब्राह्मण कांग्रेस में वापस होते हैं तो मुसलमानों की बड़ी तादाद और अन्य जातियों का भी एक बड़ा हिस्सा वापस कांग्रेस की तरफ लौट सकता है। ऐसा होने पर आज सात सीटों वाली कांग्रेस 2022 में सौ सीटों के आसपास पहुंच सकती है, जो 2024 में लोकसभा की कम से कम 20 से 25 सीटें जीतने की जमीन तैयार कर सकती है जैसा कि 2009 में हुआ था।अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास ऐसे कौन से चेहरे हैं, जिनमें से किसी एक को आगे करके राज्य के 12 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचने का दांव पार्टी चल सके। पिछली बार प्रशांत किशोर ने शीला दीक्षित को बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करवाया था और इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में कुछ जान भी आई थी, लेकिन बाद में सर्जिकल स्ट्राइक और सपा के साथ गठबंधन ने सारी रणनीति पर पानी फेर दिया था। इस बार कांग्रेस में ब्राह्मण नेताओं के नाम पर पूर्व मंत्री प्रमोद तिवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद, पूर्व सांसद राजेश मिश्रा, दिग्गज नेता पं.कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेश त्रिपाठी, पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी जैसे कुछ नाम हैं। जबकि एक समय के दिग्गज ब्राह्मण नेता सत्यदेव त्रिपाठी, भूधर नारायण मिश्र, नेकचंद पांडे जैसों को कांग्रेस ने बाहर का रास्ता दिखाया हुआ है।इनके अलावा एक और चर्चित नाम कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का है। प्रमोद कृष्णम जो साधु बनने से पहले कांग्रेस में ही थे और युवक कांग्रेस से लेकर कांग्रेस संगठन में कई पदों पर रह चुके हैं, उन गिने चुने साधुओं में हैं जो खुलकर कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार के लिए मीडिया में डटकर बोलते हैं। पार्टी उन्हें दो बार अपनी टिकट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा चुकी है। 2014 में वह संभल से और 2019 में लखनऊ में राजनाथ सिंह के खिलाफ वह चुनाव लड़ चुके हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कई विधानसभा चुनावों में कांग्रेस उन्हें बतौर स्टार प्रचारक चुनाव प्रचार के लिए भेज चुकी है।पिछले काफी समय से आचार्य प्रमोद कृष्णम उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा उत्पीड़न और उन पर अत्याचार का आरोप लगाते हुए काफी हमले कर रहे हैं। कानपुर के विकास दुबे कांड में विकास और उसके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर भी प्रमोद कृष्णम मीडिया में बहुत आक्रामक रहे हैं। ब्राह्मणों के मुद्दे पर कई बार उन्होंने कांग्रेस पार्टी की नीतियों की सीमा भी लांघी है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर आचार्य के बाद जितिन प्रसाद भी खासे मुखर रहे हैं। पार्टी द्वारा पश्चिम बंगाल का चुनाव प्रभारी बनाए जाने से पहले उन्होंने पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का एक पूरा नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए बनाकर जहां भी किसी ब्राह्मण की हत्या या कोई और घटना हुई, जितिन प्रसाद ने उसका संज्ञान लेकर पूरी सूची जारी की और राज्य सरकार से पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा और सुरक्षा देने की मांग करके इस मुद्दे को गरम किया।

अब सवाल है कि क्या कांग्रेस इनमें से किसी को उत्तर प्रदेश में चेहरा बनाएगी। प्रमोद तिवारी जिनकी उत्तर प्रदेश में गाजियाबद से गोरखपुर तक पार्टी संगठन पर पकड़ भी है और पहचान भी, कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं में सबसे बड़ा नाम हैं। लेकिन कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक उनकी दिलचस्पी खुद प्रदेश अध्यक्ष या चेहरा न बन कर अपनी बेटी आराधना यानी मोना मिश्रा को आगे करने में है। जबकि राजेश मिश्रा उस वाराणसी से हैं जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं। इसलिए मोदी के मुकाबले उनका व्यक्तित्व कहीं नहीं ठहरता और उनका असर भी पूर्वांचल के वाराणसी के आसपास के जिलों तक ही सीमित है। बड़ी पारिवारिक विरासत के बावजूद यही स्थिति ललितेश त्रिपाठी की भी है।जबकि जितिन प्रसाद को पार्टी ने पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब केंद्र में मंत्री बने रहने और राष्ट्रीय राजनीति में ही बने रहने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी थी। हालांकि अब उन्हें अगर प्रदेश संगठन की कमान दी जाती है तो उन्हें बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी। इसी तरह बुंदेलखंड के पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी का प्रभाव भी महज बुंदेलखंड तक ही सीमित है। पूर्वांचल, मध्यप्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी कोई खास पहचान नहीं है।अब बात आचार्य प्रमोद कृष्णम की। लगातार मीडिया में कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार का बेहद मजबूती और आक्रामक तरीके बचाव करने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में उनकी खासी लोकप्रियता हो गई है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर उनकी अत्याधिक मुखरता और साधुवेश ने उन्हें प्रदेश में कांग्रेस का एक आक्रामक ब्राह्मण नेता बना दिया है। कल्कि पीठाधीश्वर होने के कारण उन्हें आगे करके कांग्रेस चुनावों को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचा सकती है। साथ ही योगी बनाम आचार्य का मुकाबला बेहद दिलचस्प इसलिए भी हो जाएगा कि देश-प्रदेश के साधु समाज में भी खासा विभाजन हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े संत जहां भाजपा और योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े दिखाई देंगे तो वहीं इनके दायरे से बाहर के साधु संत आचार्य प्रमोद कृष्णम के साथ आ सकते हैं। 2018 के मध्यप्रदेश चुनाव में आचार्य यह करिश्मा कर चुके हैं, जब कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में हजारों साधुओं ने कांग्रेस के पक्ष में जबलपुर में जुलूस निकालकर अपना समर्थन दिया था। भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस का यह हिंदू कार्ड मुसलमानों को भी इसलिए परेशान नहीं करेगा क्योंकि आचार्य प्रमोद कृष्णम की मुसलमानों में भी अच्छी खासी लोकप्रियता है और देश-प्रदेश के नामी गिरामी मुस्लिम धर्मगुरु उनके साथ आ सकते हैं।लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की समस्या ये है कि उसे फैसला और वह भी सही फैसला लेने में इतना वक्त लग जाता है कि तब तक उस फैसले का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए उत्तर प्रदेश में जहां अब एक-एक दिन अहम है, कांग्रेस अभी इसी उहापोह में है कि वह प्रदेश में अपना नेतृत्व और चेहरा बदले या जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दे। और प्रताप सिंह कैरो की कार से कुचलने वाले खरगोश की चर्चित कहानी कि खरगोश इसलिए मरा कि वह तय नहीं कर सका कि उसे आगे जाना है या पीछे जाना है। कांग्रेस पिछले लंबे समय से इसी दौर से गुजर रही है।

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चीन की उन्नत समाजवादी देश परियोजना: उपनिवेशवाद तथा कब्जे के नए तरीके जिनसे दुनिया है हैरान

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इस समय चीन न केवल भारत, बल्कि अमेरिका सहित दुनिया के कई अन्य देशों के लिए भी अलग-अलग वजहों से परेशानी का कारण बना हुआ है। एक साल पहले गलवां घाटी में भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद केंद्र सरकार ने टिकटॉक समेत ढेरों चाइनीज एप्स पर देश में पाबंदी लगा दी थी। इन एप्स से भारत की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरा बताया गया था। हालांकि विशेषज्ञ एप्स पर लगे प्रतिबंध को चीन के प्रति आशंकाओं का एक बहुत ही छोटा-सा हिस्सा मानते हैं। उस समय युद्ध जैसे हालात बनते बनते रह गए थे।दूसरी ओर यह देश भारत के पड़ोसी देशों में अपनी पकड़ लगातार बढ़ाता जा रहा है। पाकिस्तान को उसने पहले ही अपने कर्ज के जाल में फंसा रखा है। श्रीलंका में भी उसकी पैठ गहराती जा रही है। नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में भी उसका दखल बढ़ रहा है।दुनिया इस समय कोरोना महामारी से जूझने में जुटी हुई है और चीन विस्तारवाद की राह पर अपनी गति बढ़ा रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में कोविड से बचाव के टीकों को अधिक से अधिक लोगों को लगाने की जद्दोजहद चल रही है। वहीं विकासशील देशों में टीकों का टोटा चल रहा है और चीन इसका फायदा उठाने में जुटा हुआ है। भारत अभी भी अपनी पहली स्वदेशी कोविड वैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन से मान्यता दिलाने की प्रक्रिया में है और चीन की दो वैक्सीन को यह अनुमति दी जा चुकी है।इतना ही नहीं चीन दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माता और उत्पादक देश अमेरिका को पीछे छोड़ने से कुछ ही कदम पीछे रह गया है। उसने अब तक औसतन प्रत्येक 100 में से 50 नागरिकों को कोविड का टीका लगा दिया है। इतना ही नहीं चीन दुनिया के 60 देशों को मुफ्त या सस्ती वैक्सीन भी उपलब्ध करा चुका है।कोरोना से बढ़ रही मौतों से चिंतित अमेरिका ने दुनिया के जरूरतमंद देशों को वैक्सीन देने का काम कुछ समय के लिए रोक दिया था। भारत में भी कोरोना की दूसरी लहर ही वजह से यह काम रोक दिया गया था। उसी समय चीन ने दुनिया के अलग अलग भौगोलिक स्थिति वाले देशों को अपनी वैक्सीन दी। चीन में इस समय 49 वैक्सीन पर शोध किया जा रहा है और छह को वह अपने नागरिकों को लगा रहा है। चीन ने पिछले साल 2020 में ही छह कोविड वैक्सीन को देश के भीतर उपयोग की अनुमि दे दी थी और अब तक इनका प्रयोग किया जा रहा है।वैक्सीन उपनिवेशवादअमेरिका में इस समय 66 वैक्सीन पर शोध और उत्पादन का कार्य किया जा रहा है। चीन इस मामले में दूसरे नंबर पर पहुंच चुका है और तीसरे नंबर पर यूरोप के देश हैं। 2021 की शुरुआत के बाद चीन ने वैक्सीन राष्ट्रवाद का फायदा उठाया और मेक्सिको, पेरू, चिली, अर्जेंटीना, रूस, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे एक दर्जन से ज्यादा देशों में अपनी वैक्सीन का ट्रायल किया।वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने देश को ‘एडवांस्ड सोशलिस्ट कंट्री’ बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। इससे अमेरिका और अन्य विकसित देश परेशान हैं। ‘एडवांस्ड सोशलिस्ट कंट्री’ प्रोजेक्ट के तहत चीन खुद को 2049 तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक ताकत के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहता है। यदि वह इसे प्राप्त कर लेता है तो अमेरिका दूसरे पायदान पर पहुंच जाएगा। वहीं तकनीकी मोर्चे पर आगे दिखाई दे रहे कई यूरोपीय देशों की हैसियत भी कम हो जाएगी।चीन की डरावनी योजनाएंचीन की कई ऐसी भावी योजनाएं हैं, जो इस समय दुनिया को आश्चर्यचकित करने के साथ-साथ डरा भी रही हैं। निवेश और कर्ज के भी जाल में वह कई देशों को फांस चुका है। हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश भी उसके इस जाल में फंसता जा रहा है। चीन वहां 2030 तक 100 स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एसईजेड) स्थापित करने की घोषणा कर चुका है। इसमें अरबों डॉलर का निवेश करने के लिए कई चीनी कंपनियां भी तैयार हैं।बीआरआई योजनाइसी तरह चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) योजना है जिसके तहत 2049 तक दुनिया के करीब 70 देशों में बुनियादी संरचनाओं का निर्माण कर उन्हें एकसाथ लाया जा रहा है, लेकिन इसका असली मकसद व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना व भारत और अमेरिका को घेरना है। इन तमाम योजनाओं में एक और महत्वाकांक्षी योजना है – ‘मेड इन चाइना 2025’ जिसे चीन ने साल 2015 में लॉन्च किया था। फिर अंतरिक्ष का क्षेत्र भी है जहां चीन अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कर दुनिया पर नजर रखने की महत्वाकांक्षा पाले हुए है। हाल ही में उसने अपने तीन अंतरिक्षयात्रियों को पृथ्वी की कक्षा में भेजा है। ये तीनों चीन के निर्माणाधीन अंतरिक्ष स्टेशन में तीन महीने तक रहेंगे।अंतरिक्ष में चुनौतीअंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण के लिए चीन ने 2021 से 2022 के बीच 11 बार अंतरिक्ष यानों को भेजने की योजना बनाई है जिनमें तीन अभियान पूरे हो चुके हैं। वह तियांजू-2 कार्गो शिप को पहले ही अंतरिक्ष में भेज चुका है। चीनी एजेंसी के अनुसार 11 में से तीन बार उसके यानों से स्टेशन के मॉड्यूल, चार बार कार्गो स्पेसशिप और चार बार अंतरिक्ष यात्री स्टेशन के लिए रवाना होंगे। वह साल 2022 तक 10 ऐसे ही और मॉड्यूल लॉन्च करना चाहता है जो पृथ्वी का चक्कर लगाएंगे।आशंकित अमेरिकाअमेरिका कई बार आशंका जता चुका है कि चीन भविष्य में अपनी अंतरिक्ष परियोजनाओं का इस्तेमाल अमेरिका और उसके मित्र देशों की जासूसी करने में कर सकता है। यही वजह है कि वो खुद को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से अलग कर चुका है और अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन पूरा करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।जासूसी का खतरा?अब तक अंतरिक्ष में अमेरिका का वर्चस्व था। वह स्पेस सुप्रीमेसी का फायदा भी उठा रहा था। लेकिन अब चीन पर अंतरिक्ष से जासूसी करने के आरोप लगने लगे हैं। ताइवान पहले ही अपने सरकारी कर्मचारियों को उन स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से मना कर चुका है जिसमें नेविगेशन के लिए चीनी सॉफ्टवेयर बाइदू इंस्टॉल हैं। उसे शक है कि इस नेटवर्क का इस्तेमाल कर जरूरी सूचनाएं चीन की सेना व सरकार तक पहुंचाई जा सकती हैं।आशंका की वजह क्या है?दरअसल, चीन की अंतरिक्ष एजेंसी ‘चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ सेना का अंग है। इसलिए वह अपने हर प्रोजेक्ट के लिए सेना के प्रति उत्तरदायी है। हालांकि अंतरिक्ष अनुसंधान में चीन अब भी अमेरिका से काफी पीछे है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी प्रगति चौंकाने वाली है। चीन ने पिछले साल बाइदू नेटवर्क अभियान के तहत पांच टन वजनी उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किया था। बाइदू नेटवर्क अमेरिका के विश्वव्यापी ‘ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम’ (जीपीएस) के विकल्प के रूप में बनाया गया है। चीन ने अपने इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 10 अरब डॉलर खर्च किए हैं।

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अनुच्छेद 370: केंद्रीय मंत्री तोमर बोले- दिग्विजय सिंह का बयान देश का कांग्रेस मुक्त कराने वाला

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Fri, 18 Jun 2021 06:01 PM IST

सार
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के बयान पर अब केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पलटवार किया है। तोमर ने कहा कि इसे बहाल करना संभव नहीं होगा।  

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर
– फोटो : एएनआई

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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा हाल ही में अनुच्छेद 370 को लेकर दिए गए बयान को देश को कांग्रेस से मुक्त कराने वाला करार दिया है।तोमर ने शुक्रवार को ग्वाालियर में मीडिया से बातचीत में कहा, ‘सारा देश अनुच्छेद 370 को बहाल करने के खिलाफ है और दिग्विजय सिंह का बयान भारत को कांग्रेस से मुक्त करने वाला है। अभी तो कांग्रेस सरकार बनने की संभावना भी नहीं दिखाई देती है, और यदि बन भी गई तो इसे दोबारा बहाल करना संभव नहीं होगा। गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह ने कथित रूप से कहा था कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनने पर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लागू करने पर पुनर्विचार किया जा सकता है ।कानूनी वापसी को छोड़कर किसानों से बात को तैयारकेंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों द्वारा कई माह से किए जा रहे आंदोलन के सवाल पर केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार हमेशा किसानों से बात करने को तैयार है। कानूनों को वापस लेने की बात को छोड़कर, कानून संबंधित प्रावधानों को लेकर कोई किसान यूनियन आधी रात को भी बात करने को तैयार है तो नरेंद्र सिंह तोमर उसका स्वागत करेंगे।उन्होंने बताया कि ग्वालियर-चंबल अंचल में मेडिकल सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है और कोविड संक्रमण की तीसरी लहर से निपटने की तैयारी हो रही है। अस्पतालों में पीएम केयर फंड और राज्य सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट से लेकर मेडिकल उपकरण दिए हैं और इसके बाद भी जरुरत होने पर कई निजी कंपनियों से मदद लेकर प्रत्येक जिले में मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। कोरोना के टीके को लेकर उन्होंने कहा कि अगस्त महीने से ज्यादा मात्रा में टीके उपलब्ध रहेंगे और यह काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह द्वारा हाल ही में अनुच्छेद 370 को लेकर दिए गए बयान को देश को कांग्रेस से मुक्त कराने वाला करार दिया है।

तोमर ने शुक्रवार को ग्वाालियर में मीडिया से बातचीत में कहा, ‘सारा देश अनुच्छेद 370 को बहाल करने के खिलाफ है और दिग्विजय सिंह का बयान भारत को कांग्रेस से मुक्त करने वाला है। अभी तो कांग्रेस सरकार बनने की संभावना भी नहीं दिखाई देती है, और यदि बन भी गई तो इसे दोबारा बहाल करना संभव नहीं होगा। गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह ने कथित रूप से कहा था कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनने पर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को लागू करने पर पुनर्विचार किया जा सकता है ।

कानूनी वापसी को छोड़कर किसानों से बात को तैयार
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों द्वारा कई माह से किए जा रहे आंदोलन के सवाल पर केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार हमेशा किसानों से बात करने को तैयार है। कानूनों को वापस लेने की बात को छोड़कर, कानून संबंधित प्रावधानों को लेकर कोई किसान यूनियन आधी रात को भी बात करने को तैयार है तो नरेंद्र सिंह तोमर उसका स्वागत करेंगे।
उन्होंने बताया कि ग्वालियर-चंबल अंचल में मेडिकल सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है और कोविड संक्रमण की तीसरी लहर से निपटने की तैयारी हो रही है। अस्पतालों में पीएम केयर फंड और राज्य सरकार ने ऑक्सीजन प्लांट से लेकर मेडिकल उपकरण दिए हैं और इसके बाद भी जरुरत होने पर कई निजी कंपनियों से मदद लेकर प्रत्येक जिले में मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। कोरोना के टीके को लेकर उन्होंने कहा कि अगस्त महीने से ज्यादा मात्रा में टीके उपलब्ध रहेंगे और यह काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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वार : कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल बोले- प्रधानमंत्री ने शासन करने का नैतिक अधिकार खो दिया

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पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: योगेश साहू
Updated Fri, 18 Jun 2021 06:37 PM IST

सार
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने एक साक्षात्मकार में कहा कि प्रधानमंत्री ने शासन करने का नैतिक अधिकार खो दिया है।

कपिल सिब्बल
– फोटो : PTI

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने एक साक्षात्मकार में कहा कि प्रधानमंत्री ने शासन करने का नैतिक अधिकार खो दिया है, लेकिन अपने राजनीतिक भाग्य को सुरक्षित मानते हुए वह कर्तव्यों का निर्वहन करना बंद नहीं कर सकते।सिब्बल ने कहा कि प्रधानमंत्री को कोविड के दौरान चिकित्सा सहायता की जरूरत वाले लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन वह पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में व्यस्त थे। समाचार एजेंसी पीटीआई से चर्चा में पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पीएम मोदी पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय राजनीतिक नेतृत्व के अभाव का मतलब यह नहीं है कि पीएम को अपने कर्तव्य का निर्वहन रोक देना चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित है। सिब्बल ने सरकार पर कोविड-19 टीकाकरण की रणनीति के लिए अपनी अयोग्यता के लिए भी हमला किया। उन्होंने कहा कि यह आपराधिक लापरवाही की हद है। महामारी से निपटने में सरकार की प्राथमिकताएं गलत और दोषपूर्ण हैं और ईमानदारी की कमी है। उन्होंने यह भी कहा कि टूलकिट मुद्दा और कुछ नहीं बल्कि उनकी सरकार की विफलताओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए जालसाजी का एक प्रयास है।सिब्बल ने दूसरी लहर के दौरान लोगों की जिंदगियों को बचाने में निष्क्रियता के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि कोई विश्वसनीय विकल्प हो भी सकता है और नहीं भी, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित मानते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना बंद कर देना चाहिए।

विस्तार

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने एक साक्षात्मकार में कहा कि प्रधानमंत्री ने शासन करने का नैतिक अधिकार खो दिया है, लेकिन अपने राजनीतिक भाग्य को सुरक्षित मानते हुए वह कर्तव्यों का निर्वहन करना बंद नहीं कर सकते।

सिब्बल ने कहा कि प्रधानमंत्री को कोविड के दौरान चिकित्सा सहायता की जरूरत वाले लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए था, लेकिन वह पश्चिम बंगाल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में व्यस्त थे। समाचार एजेंसी पीटीआई से चर्चा में पूर्व केंद्रीय मंत्री ने पीएम मोदी पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि विश्वसनीय राजनीतिक नेतृत्व के अभाव का मतलब यह नहीं है कि पीएम को अपने कर्तव्य का निर्वहन रोक देना चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित है। 

सिब्बल ने सरकार पर कोविड-19 टीकाकरण की रणनीति के लिए अपनी अयोग्यता के लिए भी हमला किया। उन्होंने कहा कि यह आपराधिक लापरवाही की हद है। महामारी से निपटने में सरकार की प्राथमिकताएं गलत और दोषपूर्ण हैं और ईमानदारी की कमी है। उन्होंने यह भी कहा कि टूलकिट मुद्दा और कुछ नहीं बल्कि उनकी सरकार की विफलताओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए जालसाजी का एक प्रयास है।
सिब्बल ने दूसरी लहर के दौरान लोगों की जिंदगियों को बचाने में निष्क्रियता के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि कोई विश्वसनीय विकल्प हो भी सकता है और नहीं भी, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित मानते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना बंद कर देना चाहिए।

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