सपा-बसपा के बीच क्या 1955 के इस लेटर ने कराया गठबंधन, अखिलेश यादव ने क्यों किया इसका जिक्र?

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SP-BSP alliance : बसपा मुखिया मायावती के साथ सपा सुप्रीमो खिलेश यादव.

नई दिल्ली:

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन(SP-BSP alliance) की बुनियाद में क्या 64 साल पुराना वह लेटर है, जिसे राम मनोहर लोहिया ने डॉ. भीम राम अंबेडकर को लिखा था. अब अखिलेश यादव(Akhilesh Yadav) ने भी यह साफ कर दिया है कि गठबंधन की बुनियाद में लोहिया के खत की भी अहम भूमिका है. सपा और बसपा के गठबंधन को बेमेल बताए जाने के सवालों के जवाबी ढाल के रूप में अखिलेश ने शुक्रवार को एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में इस पुराने पत्र का जिक्र किया. अखिलेश यादव ने बहुत आशिंक रूप से उस पुराने प्रसंग को छेड़ा. उनका यह कहना काबिलेगौर है-…'वो' लेटर भी कहीं होंगे, जिसे लोहिया ने अंबेडकर को लिखा था. दोनों की विचारधारा में क्या फर्क है ? एक समय नेताजी, काशीराम और मायावती ने मिलकर रास्ता निकाला, अब हम उसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है. ? यहां अखिलेश यादव 1993 में सपा-बसपा के बीच हुए पहली बार हुए गठबंधन की बात कह रहे हैं. लेटर के जरिए अखिलेश ने यह दर्शाने की कोशिश कि जिन दो महापुरुषों की प्रमुखता से उनकी पार्टियां बात करतीं आई हैं, वे पहले भी गठजोड़ चाहते थे.

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दरअसल, जिस विचारधारा की नींव पर दोनों दलों की स्थापना हुई है, उन विचारधाराओं के बीच 1960 के दशक में गठजोड़ की कोशिशें हुईं थी. जब समाजवादी विचारधारा खातिर लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने दलितों के मसीहा डॉ. भीम राव अंबेडकर से गठजोड़ की कोशिशें की थीं. यह दीगर बात है कि यह कोशिश सफल नहीं हुई थी. इस पुराने प्रसंग का जिक्र इसलिए कि आज उत्तर-प्रदेश में धुर विरोधी माने जाने वाली सपा और बसपा फिर से गठबंधन करने जा रहीं. शनिवार को इसकी आधिकारिक घोषणा होनी बाकी है. अखिलेश यादव ने एनडीटीवी को दिए इस इंटरव्यू में गठबंधन को बेमेल बताए जाने पर इस पत्र का संदर्भ दिया. अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने जिस पुराने लेटर का जिक्र किया, आखिर उसमें क्या लिखा है. क्यों डॉ. अंबेडकर और लोहिया एक साथ आने चाहते थे. यहां जानिए पूरी कहानी.

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बात 10 दिसंबर 1955 की है. जब डॉ. राम मनोहर लोहिया ने हैदराबाद से भीम राव अंबेडकर को पत्र लिखा. इस पत्र में लोहिया ने यह इच्छा जताई थी कि डॉ. अंबेडकर सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता तक सीमित न रहें, बल्कि वह पूरी हिंदुस्तानी जनता की आवाज बनकर उभरें. वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी अपने एक पुराने लेख में इस लेटर का मजमून कुछ यूं बताते हैं-

'प्रिय डॉक्टर अंबेडकर, मैनकाइंड (अखबार) पूरे मन से जाति समस्या को अपनी संपूर्णता में खोलकर रखने का प्रयत्न करेगा. इसलिए आप अपना कोई लेख भेज सकें तो प्रसन्नता होगी. आप जिस विषय पर चाहें लिखिए. हमारे देश में प्रचलित जाति प्रथा के किसी पहलू पर आप लिखना पसंद करें, तो मैं चाहूंगा कि आप कुछ ऐसा लिखें कि हिंदुस्तान की जनता न सिर्फ क्रोधित हो बल्कि आश्चर्य भी करे. मैं चाहता हूं कि क्रोध के साथ दया भी जोड़नी चाहिए. ताकि आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें. मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपकी कोई दिलचस्पी होगी या नहीं. सम्मेलन में आप विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में आ सकते हैं. अन्य विषयों के अलावा सम्मेलन में खेत मजदूरों, कारीगरों, औरतों, और संसदीय काम से संबंधी समस्याओं पर भी विचार होगा और इनमें से किसी एक पर आपको कुछ बात कहनी ही है.' – सप्रेम अभिवादन सहित, आपका राम मनोहर लोहिया.

बाद में डॉक्टर अंबेडकर ने डॉ. लोहिया को जवाबी पत्र लिखा,

'प्रिय डॉक्टर लोहिया ,आपके दो मित्र मुझसे मिलने आए थे. मैंने उनसे काफी देर तक बातचीत की. अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की कार्यसमिति की बैठक 30 सितंबर, 56 को होगी और मैं समिति के सामने आपके मित्रों का प्रस्ताव रख दूंगा. मैं चाहूंगा कि आपकी पार्टी के प्रमुख लोगों से बात हो सके, ताकि हम लोग अंतिम रूप से तय कर सकें कि साथ होने के लिए हम लोग क्या कर सकते हैं. मुझे खुशी होगी अगर आप दिल्ली में मंगलवार दो अक्तूबर 1956 को मेरे आवास पर आ सकें. अगर आप आ रहे हैं तो कृपया तार से मुझे सूचित करें ताकि मैं कार्यसमिति के कुछ लोगों को भी आपसे मिलने के लिए रोक सकूं.' आपका, बी.आर. अंबेडकर.

बाबा साहेब अंबेडकर ने इस बीच लोहिया को पांच अक्तूबर को एक और पत्र लिखा, 'आपका 1 अक्तूबर 56 का पत्र मिला. अगर आप 20 अक्तूबर को मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैं दिल्ली में रहूँगा. आपका स्वागत है. समय के लिए टेलीफोन कर लेंगे.' आपका बी.आर. अंबेडकर. सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले दोनों नायकों की जब मुलाकात तय मानी जा रही थी, तब होनी को कुछ और मंजूर था. छह दिसंबर 1956 को डॉ. अंबेडकर ने इस दुनिया को ही अलविदा कह दिया. जिससे डॉ. लोहिया से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी. जानकार बताते हैं कि अगर यह मुलाकात हो गई होती तो न केवल सामाजिक न्याय की लड़ाई का आज रंग-रूप कुछ और होता बल्कि देश की राजनीति की दिशा भी दूसरी होती.

क्यों एक होना चाहते थे अंबेडकर-लोहिया ?
पत्र से यह साफ हो जाता है कि कमजोरों की लड़ाई लड़ने वाले अंबेडकर और लोहिया बाद में देश से जाति-व्यवस्था के समूल नाश की जरूरत महसूस कर रहे थे. यही वजह है कि राम मनोहर लोहिया अपने पत्र में डॉ. अंबेडकर से कहते हैं कि मैं चाहता हूं कि आप न सिर्फ अनुसूचित जातियों के नेता बनें बल्कि पूरी हिंदुस्तानी जनता के भी नेता बनें. मैं नहीं जानता कि समाजवादी दल के स्थापना सम्मेलन में आपकी कोई दिलचस्पी होगी या नहीं. हालांकि मुलाकात न होने पर दोनों बड़े नेताओं की यह मंशा फलीभूत नहीं हो सकी. लोहिया और अंबेडकर विचारधारा के जानकारों के बीच अब यह भी चर्चा शुरू हो गई है क्या जिस मकसद से लोहिया और अंबेडकर एक होना चाहते थे, क्या वही मंशा इस बार सपा-बसपा की भी है या फिर 1993 में सत्ता के मकसद के लिए बनाया गए गठबंधन का यह पार्ट-2 है.

1993 में क्यों हुआ था सपा-बसपा गठबंधन
बीजेपी की सरकार में अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया. जबर्दस्त उपजी हिंदुत्व और राम लहर को रोकने के लिए सपा और बसुा ने गठबंधन करने का फैसला किया. काशीराम, मायावती की सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से मीटिंग हुई और चर्चित नारा दिया- मिले मुलायम काशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम.1993 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 177 सीटें मिलीं, जबकि 1991 में 221 सीटें पार्टी ने जीती थी. वहीं सपा ने 109 और बसपा ने 67 सीट के साथ गठबंधन कर सरकार बना ली. यह पहला मौका था, जब बसपा ने इतनी संख्या में सीटें जीतीं. मगर सत्ता की खींचतान को लेकर मुलायम और मायवती में कलह हुई. फिर यूपी का चर्चित गेस्ट हाउस कांड हुआ. दरअसल दो जून 1995 को मायावती ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी. जिससे मुलायम की सरकार गिर गई. इस दौरान लखनऊ के मीरा बाई गेस्ट हाउस में मायावती पर हमले की घटना हुई. मायावती ने जान बचाने के लिए खुद को कमरा बंद कर लिया था. बीजेपी नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की वजह से वह बच सकीं थीं. ऐसा बताया जाता है. अब 25 साल बाद दोबारा दोनों दल करीब आए हैं.

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