लोक संगठनों को सत्ता में बैठे लोगों का ‘सेवक’ नहीं होना चाहिए : संघ प्रमुख

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मोहन भागवत ने सरकार पर किया हमला

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने शनिवार को कहा कि लोक संगठनों को सत्ता में बैठे लोगों का सेवक नहीं होना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को राजनीति से भी दूर रहना चाहिए. आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि प्रशासन तंत्र को संविधान के अनुसार काम करना होता है और लोक संगठनों की अगुवाई में सतर्क नागरिकों को इसे सुनिश्चित करना होगा. उन्होंने कहा कि इसकी क्या गारंटी है कि सत्ता संविधान का पालन करेगी? लोक संगठनों के नेतृत्व में सतर्क नागरिक इसकी गारंटी हैं और इसलिए उन्हें सत्ता में बैठे लोगों का सेवक नहीं होना चाहिए.
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आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सत्ता में कई लोग हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं लेकिन मौजूदा व्यवस्था के कारण उनके हाथ बंधे हैं. भागवत ने कहा कि लोक संगठनों को सत्ता की राजनीति से दूर रहना चाहिए..सत्ता एक व्यवस्था है. व्यवस्था का हिस्सा बनकर सत्ता कभी बदलाव लाने में मदद नहीं करती. सत्ता में कई लोग हैं जो बदलाव लाना चाहते हैं लेकिन सत्ता की व्यवस्था के कारण उनके हाथ बंधे हैं. ठेंगड़ी के जीवन के बारे में भागवत ने कहा कि हर किसी को उनके जीवन का अनुसरण करना चाहिए. आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हमें ठेंगड़ी की विचारधारा के मुताबिक उनके जीवन को देखना होगा. हमें यह भी देखना होगा उनके द्वारा स्थापित संगठनों के पीछे उनकी क्या भावनाएं थीं.
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गौरतलब है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब मोहन भागवत ने सरकार की कार्यशैली और उससे जुड़ी संस्थाओं पर हमला बोला हो. इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को संघ के स्वयंसेवकों को शाखाओं को सर्व स्पर्शी बनाने के साथ अपने-अपने क्षेत्र में सामाजिक समरसता के लिये कार्य करने को कहा. उन्होंने कहा कि इसके लिये कार्यकर्ताओं को सही तरीके से योजना बनानी चाहिए. राजस्थान के नागौर में आरएसएस की बैठक के एक सत्र को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि जनमानस को भी सामाजिक समरसता के कार्य करने लिये योग्य बनाना है, इस कार्य को शीघ्र गति से शाखाओं द्वारा करना हम सभी स्वयंसेवकों का दायित्व है.
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उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता जितनी सर्वव्यापी होगी उतना ही संगठित समाज होगा जिससे देश मजबूत व शक्तिशाली होगा. उन्होंने कहा कि हर गांव स्वावलंबी बने, हर गांव में सभी जातियों के लिये प्रयुक्त किये जाने वाला एक कुंआ, एक मंदिर व एक श्मशान हो. हमारा कार्य सर्वस्पर्शी, सर्वव्यापी एवं समरसता युक्त हो यह भी कार्यकर्ताओं को अपने व्यवहार से सिद्ध करना होगा.
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संघ के सरसंचालक ने विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए इस कार्यक्रम में कार्यकर्ता के व्यवहार, भूमिका व कार्य करने की निरंतरता पर बल दिया. अपने व्यवहार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अपने विचार को संतुलित व मर्यादित ढंग से रखना एक कार्यकर्ता के लिये बहुत जरूरी है.
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