रोशनी प्रधानमंत्री से आ रही है, इसलिए पुलिस आईबी को पीट रही है

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“रोशनी नहीं है, अंधेरा दिख रहा है”- प्रधानमंत्री मोदी
“रोशनी आपसे आ रही है प्रधानमंत्री जी”- आनंद महिंद्रा
महान भारत की बर्बादी के दौर में उस खूबसूरत मंच पर हुआ यह संवाद शेक्सपियर के संवादों से भी क्लासिक है. अपने प्रोफेसर की बात पर क्लास रूम में एक छात्र खड़ा हो गया. खेतों में पराली जल रही थी, क्लास रूम में सवाल उबल रहे थे. जबकि आग की आंच और क्लास रूम में पांच हज़ार मील का फ़ासला था.
छात्र- प्रधानमंत्री को अंधेरा दिख रहा है तो रोशनी उन्हीं से कैसे आ सकती है?
प्रोफ़ेसर ने पहले यूजीसी का आदेश निकाला और कहा कि हम सब एक बेहतर भविष्य की कल्पना में साथ-साथ पढ़ेंगे. सरकार की नियमावली ये और वो के तहत हम यहां पढ़ने आए हैं, देखने नहीं. हमारा काम सरकार की आलोचना नहीं है. जो भी आलोचना करे उससे हमारी दोस्ती नहीं है. हम आलोचना करने वाले संगठन के साये से दूर रहेंगे. जब भी आलोचना करने का जी करे, यूजीसी-यूजीसी नाम जपेंगे. यह बात हम क्लास शुरू होने से पहले और ख़त्म होने के पहले रोज़ याद करेंगे.
छात्र ने सुनते ही कहा था कि सर क्या रोशनी का प्रधानमंत्री से आना भी आलोचना है?
प्रोफ़ेसर- अगर कोई यह दावा कर दे कि पीयूष गोयल के कोयला मंत्रालय के तहत निकलने वाले कोयले को पीयूष गोयल के बिजली मंत्रालय के पावर प्लांट में जलाने से रोशनी आती है तो यह आलोचना है.
छात्र- क्या आपने इशारे में यह कहा कि सीबीआई के आलोक वर्मा ने सीबीआई के राकेश अस्थाना के खिलाफ केस किया और अस्थाना और आलोक दोनों को पावर प्लांट से बाहर कर दिया गया?
प्रोफ़ेसर- यह यूजीसी के आदेश के अनुसार प्रधानमंत्री की आलोचना हो सकती है. इस पर पाबंदी है. जोर से बोलो यूजीसी, यूजीसी. और जोर से बोलो यूजीसी, यूजीसी.
छात्र- पर प्रधानमंत्री को अंधेरा क्यों दिख रहा है? रोशनी क्यों नहीं है?
प्रोफ़ेसर- यह बात साबित है कि रोशनी है और रोशनी प्रधानमंत्री से आती है. ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी. और ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी.
छात्र- प्रोफ़ेसर क्या आपको भी अंधेरा दिख रहा है?
प्रोफ़ेसर- मत कहो आकाश में कोहरा घना है. यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.
छात्र- तो क्या हमें सवालों की हत्या करनी होगी? क्या हम चुप रहें? प्रधानमंत्री से रोशनी कैसे आ सकती है प्रोफ़ेसर?
प्रोफ़ेसर- मैंने भारत के फुटपाथों पर महापुरुषों के हज़ारों कैलेंडर बिकते देखे हैं. देवी देवताओं के कैलेंडर में देखा है कि उनके मुखमंडल के पीछे एक आभामंडल है. वो आभामंडल ही रोशनी है. इसलिए प्रधानमंत्री मोदी से रोशनी आ सकती है. ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी. और ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी.
छात्र- लेकिन आईबी का अधिकारी आलोक वर्मा के घर जासूसी करते पकड़ा गया. उसे घसीटकर लाया गया और सड़क पर मारा गया है. इसकी रोशनी कहां से आ रही है?
प्रोफ़ेसर- हम पर यूजीसी की पाबंदी है. हम न पढ़ सकते हैं और न पढ़ा सकते हैं. हमारा काम है तुम्हें कॉलेज में लाकर पढ़ने के लायक नहीं बनने देना. यही सरकार का हुक्म है. मुल्क को बर्बाद करने के लिए नौजवानों का बर्बाद होना बेहद ज़रूरी है. नौजवानों को जब तक मिट्टी में मिला नहीं दिया जाएगा, मूर्ति नहीं बनेगी. रोशनी नहीं आएगी. तुम नौजवान इस मुल्क के लिए अभिशाप हो. हम तुम्हारे सवालों को कुचलकर, जबानों को काटकर मूर्ति के लिए वरदान में बदल देंगे.
कक्षा समाप्त होती है. एक वीडियो वायरल होता हुआ क्लास के स्मार्ट बोर्ड पर नाचने लगता है. दिल्ली पुलिस के लोग आईबी के लोगों को सड़क पर घसीटकर मार रहे हैं. आईबी के लोग मार खा रहे हैं. गुमनाम होकर अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं. एक सूचना के लिए वे क्या-क्या नहीं करते. वही सूचना जिसे आप तक नहीं पहुंचने देने के लिए सत्ता क्या-क्या नहीं करती है. आईबी के नौजवान अपना काम कर रहे थे. उनका कॉलर किसके कहने पर पकड़ा गया? क्या यह सब उस भरोसे के टूट जाने का नतीजा था?
हर किसी को हर किसी पर शक है. घर-घर शक है. दफ़्तरों में शक है. अधिकारियों में शक है. दिल्ली में रहते हैं तो बिना कॉलर वाली क़मीज़ पहनकर चलें. वर्ना किस अफ़सर का आदमी किस आदमी को अफ़सर समझकर कॉलर पकड़ ले. महान भारत के बेख़बर बाशिंदों, सुनो इस बात को. दिल्ली में न गर्दन होगी और न गिरेबां होगा. सिर्फ महान होगा. केवल महान होगा.
प्रोफ़ेसर भागता हुआ आता है. बंद करो-बंद करो.. क्लास रूम में प्राइम टाइम नहीं चल सकता है. केबल नेटवर्क से गायब कर दिया गया रवीश कुमार क्लास रूम में कैसे पहुंच गया! बंद करो प्राइम टाइम के इंट्रो को.
सर बस थोड़ी देर. आईबी के अफ़सरों को सड़क पर घसीटकर मारा गया है. सूत्रों के हवाले से आए उनके बयान को सुन लेने दें. आज हमारी एक यूनिट को जनपथ के पास कुछ लोगों के द्वारा रोका गया.
प्रोफ़ेसर- इसमें ख़बर क्या है?
छात्र- भारत में ख़बर वही नहीं है जो ख़बर है. ख़बर वह है जो ख़बर में नहीं है.
आईबी का यह बयान पूरा नहीं है. ख़बरों में बताए गए दो से चार लोगों का इस तरह धरा जाना, मारा जाना उस राज्य के इक़बाल के ख़ाक में मिल जाना है जिसके लिए आप हमें मिट्टी में मिला रहे हैं. यह लड़ाई मैनेज हो गई. किसी ने थाने में केस नहीं किया. सड़कों पर लड़-मर कर सब अपने-अपने घर गए. किसके इशारे पर हुआ यह बात बेमानी है. आईबी के लोगों पर हाथ उठ जाना, इक़बाल का कुचल जाना है. उनके लिए हमें दुख है. वे अच्छे हैं. वे बुरे भी हैं. मगर उनके काम का हिसाब इतना भी ख़राब नहीं कि इस तरह सड़क पर तमाशा बना दिए जाए. सत्ता की लड़ाई में फंसे मध्यम श्रेणी और उससे नीचे के इन अफ़सरों के स्वाभिमान को भी कुचल दिया गया. दिल्ली की सड़कों पर उन्हें पीट दिया गया. दिल्ली में रात और दिन दोनों महफ़ूज़ नहीं हैं. रात को कुर्सी चली जाती है. दिन में कोई सड़क पर पटक देता है.
प्रोफ़ेसर- सब चुप रहो. प्राइम टाइम बंद करो. ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी.. और ज़ोर से बोलो यूजीसी.. यूजीसी.
छात्र- सर, रोशनी न आपसे आ रही है न प्रधानमंत्री से, पर रोशनी कहीं तो होगी?
प्रोफ़ेसर- हां रोशनी टाउन हॉल के मंच पर है. उस हॉल में बैठे लोग अंधेरे में रहने की आदत डाल चुके हैं. इसलिए तुम लोग दिल्ली में अब मत रहो. टाउन हॉल में रहो. जो टाउन हॉल में नहीं रहेगा वह कब दिल्ली पुलिस, सीबीआई और आईबी के खेल में मारा जाएगा, पता नहीं. इसलिए दीवारों पर नारे लिख दो- टॉउन हॉल चलो. वहीं रोशनी बची है. वहीं से रोशनी आ रही है. अंधेरे का एक नया शहर बसा है. उसे आबाद करने के लिए बाक़ी शहरों का बर्बाद होना ज़रूरी है.
दूसरा छात्र- धन्यवाद. आपने यूजीसी के आदेशों का उल्लंघन कर दिया. हम आपके चेहरे पर कालिख पोतेंगे. हम टेस्ट कर रहे थे कि क्या आपके भीतर सवालों की कोई संभावना बची है? क्या आपने वाकई आलोचना बंद कर दी है? आप फेल हो गए प्रोफ़ेसर.
प्रोफ़ेसर- अब पता चला तुम क्यों चुप थे? तुम हम पर नज़र रख रहे थे. उन छात्रों पर नज़र रख रहे थे जो पूछ रहे थे. मगर तुमने मुझे पास भी किया है. मेरी बात को साबित किया है.
दूसरा छात्र – वो क्या प्रोफ़ेसर?
प्रोफ़ेसर- “नौजवानों को जब तक मिट्टी में मिला नहीं दिया जाएगा, मूर्ति नहीं बनेगी. रोशनी नहीं आएगी. तुम नौजवान इस मुल्क के लिए अभिशाप हो. हम तुम्हारे सवालों को कुचलकर, जबानों को काटकर मूर्ति के लिए वरदान में बदल देंगे.”
टिप्पणियां #लटियन का लोटा- रवीश कुमार की नाटक श्रृंखला
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