राफेल डील का क्या है पूरा माजरा, सवाल-जवाब फार्मेट में समझें पूरा मामला

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Rafale Deal Scam : राफेल डील पर क्यों मचा है देश में हल्ला.

नई दिल्ली:

राफेल (Rafale) का मामला देश में गरमाया हुआ है. कांग्रेस (Congress) इस डील में घपले का आरोप लगा रही है तो मोदी सरकार (Modi Govt)आरोपों को झूठा करार दे रही है. इस मुद्दे पर दायर याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) खारिज कर चुका है. अब प्रशांत भूषण और अरुण शौरी ने अदालत में पुनर्विचार याचिका दाखिल की है. संसद के शीतकालीन सत्र में भी यह मामला खूब गूंज रहा.राहुल गांधी कई बार राफेल को एक लाख 30 हजार करोड़ की डील कह चुके तो लोकसभा में अरुण जेटली ने बताया कि कुल डील 58 हजार करोड़ की ही है. जिस पर राहुल गांधी ने बाद में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि सरकार कहती है कि कीमत गोपनीय है, फिर कैसे जेटली ने 58 हजार करोड़ की डील की बात स्वीकार की.इस प्रकार 36 विमानों की संख्या से भाग देने पर एक विमान की कीमत 16 सौ करोड़ बैठती है. जेटली पूछते हैं कि 1600 का आंकड़ा कहां से आ रहा है, खुद उन्होंने ही तो दाम का खुलासा कर दिया है. राहुल ने फिर दोहराया कि पांच सौ करोड़ के विमान मोदी सरकार ने क्यों 1600 करोड़ में खरीदे?

यह डील क्यों हुई, कब हुई, कैसे हुई, किसके बीच हुई, आरोप क्या हैं, सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है और सरकार के क्या जवाब हैं, इससे जुड़े ढेरों सवाल आम आदमी के मन में कौंध रहे हैं. यहां हम ऐसे ही 10 प्रमुख सवालों के जरिए आपको राफेल डील(Rafale Deal) की पूरी कहानी समझाने की कोशिश करेंगे.

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सवाल 1- राफेल विमानों की जरूरत कब और क्यों पड़ी ?
जवाब- बात वर्ष 2000 की है. जब वायुसेना ने मिग-21की जगह मिराज-2000 विमानों की जरूरत महसूस की. फिर वायुसेना ने 126 मध्यम बहु भूमिका वाले युद्धक विमान(MMRCA)खरीदने का मूड बना लिया. सात साल बाद वर्ष 2007 में विमानों की खरीद के लिए प्रस्ताव अनुरोध जिसे अंग्रेजी में रिक्वेस्ट फार प्रपोजल(आरएफपी) कहते हैं, जारी की गई. कुल छह विक्रेता(वेंडर्स) ने टेंडर भरे. फील्ड मूल्यांकन परीक्षण के पूरा होने पर छह में से दो फर्म के विमानों को ही योग्य पाया गया. इन दो विक्रेताओं के नाम रहे दसॉल्ट एविएशन(फ्रांस) और ईएडीएस(जर्मनी). इन्हीं दोनों कंपनियों के प्रस्ताव खोले गए. चूंकि दसॉल्ट की कीमत कम थी, इस नाते दसॉल्ट एविएशन के साथ एल 1 विक्रेता के रूप में नवंबर, 2011 में पहली बार डील को लेकर बातचीत शुरू हुई.

सवाल 2-कांग्रेस सरकार में क्या हुआ था सौदा
जवाब- यूपीए-2 सरकार के दौरान दसॉल्ट एविएशन के साथ एल 1 विक्रेता के रूप में नवंबर, 2011 में पहली बार डील को लेकर बातचीत शुरू हुई.तब तय हुआ था कि कुल 126 में से 108 विमानों का उत्पादन सार्वजनिक कंपनी हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड( HAL)करेगी. बाकी 18 विमान फ्रांस से डायरेक्ट मिलने थे. कांग्रेस के मुताबिक उस वक्त यानी 2007 में राफेल विमानों की कीमत करीब पांच सौ करोड़ रुपये तय हुई थी.

सवाल 3-मोदी सरकार के वक्त क्या हुई डील ?
जवाब- 26, मई 2014 में केंद्र में यूपीए की जगह नरेंद्र मोदी सरकार ने ले ली. राफेल की फाइल पर नई सरकार ने काम करना शुरू किया. इस बीच अप्रैल, 2015 में पीएम मोदी फ्रांस के दौरे पर गए. इस दौरान दोनों देशों ने राफेल सौदे पर संयुक्त वक्तव्य जारी किया . जिसके बाद राफेल डील का प्रारूप तय करने के लिए वार्ता दल गठित हुआ. वार्ता दल की रिपोर्ट के आधार पर डील फाइनल हुई. आखिरकार, तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर(अब गोवा के सीएम) के कार्यकाल में 23 सितंबर 2016 को राफेल की खरीद के लिए फ्रांस के साथ अंतर सरकारी करार यानी इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट(IGA)किया गया. डील से पहले 126 मध्यम बहु भूमिका वाले युद्धक विमान(MMRCA)के लिए प्रस्ताव वाले अनुरोध(आरएफपी) को 24 जून, 2015 में मोदी सरकार ने वापस ले लिया था. यह आरएफपी यूपीए के दौरान हुई थी. सरकार का कहना है कि कांट्रैक्ट को लेकर दसॉल्ट से जारी वार्ता में गतिरोध पैदा होने के कारण 126 की जगह 36 राफेल विमानों की डील हुई. निर्मला ने कहा कि इतने बड़े आर्डर के लिए इतनी लागत ही प्रभावी थी.

सवाल 4- क्या नियमों का पालन हुआ ?
जवाब-14 मार्च, 2016 को कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ ने भी राफेल डील में नियमों के पालन को लेकर सवाल पूछा था. तब रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने जवाब दिया था-भारतीय वायुसेना में सभी तरह की खरीद मौजूदा रक्षा अधिप्राप्ति प्रक्रिया(डीपीपी) के अनुसार ही होती है. 24 अगस्त 2016 को सुरक्षा संबंधी मंत्रिमंडल समिति (सीसीएस) के अनुमोदन के बाद 23 सितंबर 2016 को फ्रांस सरकार के साथ 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए एक अंतर-सरकारी करार(IGA)पर हस्ताक्षर हुए थे. ऑफसेट पार्टनर के सवाल पर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि डीपीपी 2013 के आफसेट दिशा-निर्देशों के अनुसार ही फैसले हुए.

सवाल 5- क्या यूपीए के वक्त डील फाइनल हुई थी ?
जवाब- रक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुभाष भामरे आधिकारिक तौर पर यह संसद में बता चुके हैं कि 126 राफेल विमान खरीदने के लिए यूपीए सरकार के समय कोई अंतिम समझौता नहीं हो सका था , इसलिए दसॉल्ट को कोई अंतिम आर्डर नहीं दिया गया. दरअसल तीन जनवरी, 2018 को सांसद कमलेश पासवान ने सरकार से पूछा था- क्या पिछली सरकार द्वारा रफाल(राफेल) से 126 लड़ाकू विमान खरीदेने का समझौता अंतिम था. उक्त खरीद में 12 वर्ष से अधिक की देरी होने के पीछे क्या कारण हैं ?

सवाल 6- रिलायेंस डिफेंस कैसे बनी ऑफसेट पार्टनर ?
जवाब- राफेल डील में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर बनाने पर सबसे ज्यादा घमासान मचा है. कांग्रेस का आरोप है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अनिल अंबानी को फायदा दिलाने के लिए राफेल डील का ठेका दिलाया. जबकि मोदी सरकार का कहना है कि ऑफसेट पार्टनर चुनने में सरकार की भूमिका नहीं रही, यह फैसला दसॉल्ट एविएशन ने लिया है. 20 सितंबर, 2017 को संसद में एक सवाल के जवाब में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि रिलायंस डिफेंस और दसॉल्ट के बीच ऑफसेट मामले में सरकार ने किसी तरह का कोई हस्ताक्षर नहीं किया. लोकसभा में बुधवार(दो जनवरी) को अरुण जेटली बता चुके हैं कि कुल 58 हजार करोड़ की डील है, जिसमें से करीब आठ सौ करोड़ रुपये का काम ही रिलायंस डिफेंस को मिलेगा. जबकि कांग्रेस अध्यक्ष एक लाख 30 हजार करोड़ की डील कह रहे हैं.

सवाल 7- राफेल की आखिर कीमत क्या है
जवाब- राफेल की कीमत का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में है. यहां आपको सबसे पहले समझना है कि राफेल की दो कीमत है. एक बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत यानी इसमें हथियार नहीं रहेंगे और दूसरी कीमत वेपनाइज्ड यानी हथियारों से लैस राफेल एयरक्राफ्ट की कीमत है. मोदी सरकार संसद में बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत 18 नवंबर 2016 को संसद में बता चुकी है. एक विमान की कीमत है 670 करोड़ रुपये. कांग्रेस का आरोप है कि भारत ने 526 करोड़ के एक विमान को 1670 करोड़ में खरीदा है. जबकि मोदी सरकार का कहना है कि चूंकि सरकार ने बेसिक एयरक्राफ्ट की जगह हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट खरीदने की डील की है, इस नाते उसकी कीमत ज्यादा है. अरुण जेटली ने लोकसभा में यह दावा किया कि मौजूदा सरकार ने जो डील की है, उसके मुताबिक बेसिक एयरक्राफ्ट यूपीए की तुलना में नौ प्रतिशत और वेपनरी एयरक्राफ्ट 20 प्रतिशत सस्ता है. यहां बता दें कि वेपनाइज्ड (Weaponized)राफेल की कीमत को सरकार देश की सुरक्षा और भारत-फ्रांस के बीच हुई (intergovernmental agreement)करार के आर्टिकल 10 का हवाला देकर गोपनीय बता रही है

सवाल 8- राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
जवाब- सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता एमएल शर्मा, विनीत ढांडा, आप सांसद संजय सिंह ने अलग-अलग तो यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण अरुण शौरी ने संयुक्त याचिका दायर की थी. याचिकाओं में डील में पारदर्शिता न होने, कीमत में बदलाव और प्रक्रिया की जांच की मांग की गई थी. जिस पर कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में सरकार से कीमत बताने को कहा था. 15 दिसंबर को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अपनी सीमाओं का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला, जिससे प्रक्रिया पर संदेह की जाए. अदालत ने कहा-हम इस बात से संतुष्ट हैं कि प्रक्रिया को लेकर संदेह करने का कोई मौका नहीं मिला. अगर कोई मामूली विचलन भी हुआ होगा, तो अदालत की समीक्षा की ज़रूरत नहीं है. हम इसकी समीक्षा नहीं कर सकते कि सरकार ने 126 की जगह 36 विमान क्यों खरीदे. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कीमत या तकनीकि बातों की समीक्षा करना उसके दायरे की बात नहीं है. हालांकि राहुल गांधी जजमेंट के एक हिस्से में सीएजी की रिपोर्ट का उल्लेख होने पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि यह गलत दावा किया गया है कि कीमत सीएजी को बताई गई और वह रिपोर्ट पीएसी में गई. क्योंकि पीएसी के चेयरमैन मल्लिकार्जुन खड़गे को इस रिपोर्ट की जानकारी ही नहीं है. बाद में सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर टाइपिंग मिस्टेक की बात कही.

सवाल 9- सरकार ने क्यों ठुकराई जेपीसी की मांग ?

जवाब- लोकसभा में बुधवार को बहस के दौरान राहुल गांधी ने राफेल की संयुक्त संसदीय कमेटी ( जेपीसी) से जांच की मांग की. यह मांग अरुण जेटली ने ठुकरा दी. वित्तमंत्री अरुण जेटली ने जने तर्क देते हुए कहा कि जेपीसी से जांच की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसकी प्रक्रिया, कीमत, ऑफसेट उपबंध और HAL के मुद्दे पर अपना फैसला सुना दिया है. उन्होंने कहा कि जेपीसी पर सर्वसम्मति तब हो सकती है जब नीति का मसला हो, लेकिन जब जांच का मसला होगा तो वह पक्षपाती हो सकती है.

जेटली ने कहा, "राफेल मुद्दा नीति, प्रशासनिक या शासन का विषय नहीं है. यह जांच का मसला है कि डील साफ-सुथरी है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 'कीमत, HAL और ऑफसेट को लेकर हम 'संतुष्ट' हैं.' जांच में JPC क्या करेगी ?" इस दौरान जेटली ने बोफोर्स सौदे के दौरान गठित जेपीसी का मुद्दा भी उठाते हुए कहा कि "दिवंगत शंकरानंद की अध्यक्षता में समिति ने जो रिपोर्ट दी उसमें कहा गया कि रिश्वत नहीं दी गई बल्कि वाइंडिंग अप भुगतान किया गया. इस प्रकार जेपीसी ने भ्रष्टाचार के मसले की लीपापोती कर दी." कांग्रेस पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, "सर्वोच्च न्यायालय का विवेक संतुष्ट हुआ, लेकिन कांग्रेस के चुनावों की आवश्यकता की संतुष्टि नहीं हुई. "

सवाल 10- क्या टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण होगा ?
जवाब- कांग्रेस का कहना है कि यूपीए के दौरान राफेल डील को लेकर बातचीत की शर्तों में टेक्नोलॉजी हस्तांतरण की भी बात थी. जिससे भारत इन विमानों को बनाने में सक्षम होता. मगर मोदी सरकार ने जो डील फाइनल की, उसमें ऐसी व्यवस्था नहीं है. सरकार भी यह बात स्वीकार कर चुकी है कि मौजूदा डील में टेक्नोलॉजी हस्तांतरण नहीं होगा. दरअसल,7 फरवरी, 2018 को सांसद रवींद्र कुमार जेना ने सरकार से पूछा था- क्या 36 राफेल जेट विमानों की खरीद के लिए किए समझौतै में प्रौद्यौगिकी का हस्तांतरण भी निहित है ? इस पर सरकार ने बताया कि जिन 36 राफेल विमानों की आपूर्ति होने वाली है, वे उड़ान भरने की स्थिति में होंगे. हालांकि, विनिर्माण लाइसेंस और प्रौद्यौगिकी अंतरण की मांग नहीं की गई है.

कांग्रेस के प्रमुख सवाल और सरकार के जवाब
1-यूपीए के 126 की तुलना में मोदी सरकार ने 36 विमानों की डील क्यों की

सरकार का जवाब- वायुसेना को उड़ने की स्थिति में 36 विमान चाहिए थे, इसलिए 36 विमानों का सौदा हुआ. पिछली सरकार में 126 विमानों की डील फाइनल नहीं हुई थी. इस नाते जून, 2015 में 126 का प्रस्ताव (RFP) वापस हुआ.
2-मोदी सरकार ने 526 करोड़ के एक विमान को 1670 करोड़ में क्यों खरीदा ?

सरकार का जवाब- अंतर सरकारी करार की धारा 10 के तहत राफेल डील की कीमतों का खुलासा नहींं हो सकता. बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत की तुलना वेपनाइज्ड यानी हथियारों से लैस विमान की कीमत से नहीं हो सकती. हथियारों से लैस विमान की कीमत ज्यादा होगी. अरुण जेटली ने लोकसभा में यह दावा किया कि मौजूदा सरकार ने जो डील की है, उसके मुताबिक बेसिक एयरक्राफ्ट यूपीए की तुलना में नौ प्रतिशत और वेपनरी एयरक्राफ्ट 20 प्रतिशत सस्ता है..
3-रिलायंस डिफेंस को विमान क्षेत्र का अनुभव नहीं, फिर डील का ठेका क्यों

सरकार का जवाब- रिलायंस डिफेंस का ऑफसेट पार्टनर के रूप में चयन दसॉल्ट ने किया है न कि केंद्र सरकार ने. यूपीए के समय ही शर्त बनी थी कि जो मूल निर्माता कंपनी है वो भारत में कलपुर्ज़ों की आपूर्ति या रखरखाव के लिए खुद से भारतीय कंपनी को साझीदार बना सकती है. इसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है.
4-राफेल डील से सरकारी कंपनी HAL को बाहर क्यों किया गया, यूपी में 108 विमान एचएएल को बनाना था

सरकार का जवाब- इसमें सरकार की कोई भूमका नहीं है. दसॉल्ट से एचएएल को निर्धारित समय-सीमा के भीतर विमानों के निर्माण का भरोसा नहीं मिल सका. जिससे वार्ता में गतिरोध उत्पन्न के कारण दसॉल्ट ने एचएएल को डील के केंद्र में नहीं रखा. दसॉल्ट रिलायंस डिफेंस सहित करीब सौ ऑफसेट पार्टनर के साथ काम करेगा.

सवाल 5- रिलायंस डिफेंस को 30 हजार करोड़ का फायदा पहुंचाने की कोशिश

सरकार का जवाब- डील ही कुल 58 हजार करोड़ रुपये की है. जिसमें ऑफसेट पार्टनर को करीब 30 हजार करोड़ रुपये के काम मिलेंगे. कुल सौ ऑफसेट पार्टनर हैं. ऐसे में रिलायंस डिफेंस को करीब आठ सौ करोड़ रुपये के ही काम मिलेंगे.

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