राजद का भविष्य और बिहार की राजनीति की दिशा क्यों और कैसे तय करेंगे नीतीश कुमार…

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बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीति को लेकर जो भी क़यास लगाए जा रहे हैं उसके केंद्र में एक ही बात की प्रमुखता होती है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अगला कदम क्या होगा और राजद टूटेगी या अब एक बार फिर नीतीश कुमार की शरण में जाएगी. इन सारी राजनीतिक अटकलों की जड़ में दो बातें हैं. एक तो है नीतीश कुमार के साथ लोकसभा चुनाव में बिहार की 39 सीटें जीतने के बावजूद केंद्रीय मंत्रिमंडल में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को उनके मनमुताबिक अनुपातिक आधार पर हिस्सेदारी न देना. दूसरा प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई एक नहीं दो बैठकों में मन मारकर भाग लेने के बावजूद देश में कृषि के सुधार के लिए मुख्यमंत्रियों की समिति में नीतीश कुमार के नाम का विचार भी नहीं करना, जिससे साफ़ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़िलहाल उन्हें उनकी औक़ात में रखना चाहते हैं.

सब जानते हैं कृषि और रेल नीतीश कुमार के प्रिय विषय रहे हैं. अपने संसदीय जीवन में पहली बार 30 वर्ष पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंत्रिमंडल में नीतीश कुमार कृषि राज्य मंत्री ही बने थे. लेकिन इसके बावजूद देश में जब कृषि सुधार के लिए मुख्यमंत्रियों की समिति बनी तो उसमें नीतीश कुमार का नाम नहीं होना भाजपा के लोगों के लिए आश्‍चर्य का कारण था. नीतीश कुमार को इस बात का आभास है कि वर्तमान भाजपा उनके साथ पुराने विश्वासी सहयोगी के रवैये की जगह हर बात में नफ़ा नुक़सान का आकलन कर फ़ैसला लेती है. लेकिन जहां तक आगामी विधानसभा चुनाव का प्रश्न है, वहां नीतीश कुमार को भी मालूम है कि उनके पास दो विकल्प हैं. एक भाजपा और रामविलास पासवान के साथ मुक़ाबला तेजस्वी यादव के साथ मिलकर किया जाये जिसमें उनकी जीत पर उनके विरोधियों को भी शक नहीं है. क्योंकि लोकसभा चुनाव में क़रीब 23 प्रतिशत वोटों का जो अंतर है, उसे पाट देना फ़िलहाल तेजस्वी यादव के बूते के बात नहीं है. तेजस्वी के समर्थक भी मानते हैं कि जब लालू यादव ख़ुद नीतीश कुमार के सामने रामविलास पासवान के साथ 2010 में थे तब वो 22 सीट पर सिमट गए थे.

नीतीश के पास दूसरा विकल्प है कि उनके मनमुताबिक विधानसभा में सीटों का बंटवारा न होने पर एक बार फिर राजद, कांग्रेस महागठबंधन को पुनर्जीवित कर चुनाव मैदान में जाएं. लेकिन इसमें राजनीतिक जोखिम कई हैं. सबसे पहला नीतीश कुमार को एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से दो-दो हाथ करना होगा. लेकिन उन्हें इस बात का अंदाज़ा है कि मोदी-शाह अब पिछले लोकसभा चुनाव से ज़्यादा ताक़तवर और आक्रामक होंगे. और ये दोनों नेता पिछले चुनाव की ग़लतियां शायद ही दुहराएं. और नीतीश कुमार को लालू यादव की जगह तेजस्वी यादव से बातचीत के साथ-साथ भ्रष्टाचार के मामलों में सवालों का जवाब देना होगा. इसलिए नीतीश कुमार जैसे राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी निश्चित को छोड़कर अनिश्चित का विकल्प चुनेंगे, इसकी उम्मीद कम ही है. उन्हें ये भी मालूम है कि उनके समर्थक या नज़दीकी कोई भी नेता पार्टी के लिए काम नहीं करना चाहता और बिना संगठन के आज की भाजपा से लोहा लेना जोखिम भरा विकल्प है. नीतीश कुमार की पार्टी का क्या हाल है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय बजट में उनके 'हर घर नल' योजना को पूरे देश में लागू करने की घुमा कर घोषणा की गयी लेकिन पूरे राज्य तो दूर, पटना शहर में एक होर्डिंग नहीं लगी कि मुख्यमंत्री जी आपके कार्यक्रम को केंद्र अपना रहा है. हालांकि नीतीश के पास प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार हैं लेकिन भाजपा के साथ संबंध या कोई और ऐसा कारण है जिसकी वजह से उन्हें शुरू के एक दो महीनों को छोड़कर कभी बिहार में सक्रिय नहीं देखा गया. जिस तरीके से नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर की अनदेखी कर रखी है, उससे 'घर की मुर्गी दाल बराबर' की कहावत याद आती है.

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नीतीश कुमार भाजपा के विकल्प पर इसलिए भी फ़िलहाल नहीं सोचेंगे क्योंकि उन्हें तेजस्वी यादव के साथ राजनीति करनी होगी. नीतीश इस घटना से भली भांति अवगत हैं कि जो तेजस्वी यादव लोकसभा चुनाव में हार के बाद अपने पिता से मिलने एक बार भी रांची नहीं गये और विधानसभा सत्र से किसी ना किसी बहाने ग़ायब रहे, उनके साथ गठबंधन की राजनीति आसान नहीं. इसका एक बड़ा कारण यह है कि राजनीति में लालू यादव के जो भी बच्चे हैं उनमें राजनीतिक शिष्टाचार का अभाव है. ये बात किसी से छिपी नहीं कि राजद के विधायक विधानसभा सत्र में लॉबी में खड़े रहते हैं लेकिन तेज़ प्रताप यादव किसी को नमस्ते या प्रणाम तक नहीं कहते. तेजस्वी यादव से अधिकांश विधायकों की शिकायत रहती है कि उन्हें फ़ोन कर कर के आप थक जाएंगे लेकिन वो कॉल रिटर्न करने के संस्कार में विश्वास नहीं करते. मीसा भारती की राजनीतिक अक़्ल लोगों को उसी समय समझ में आ गई जब लोकसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने अपने एमपी लैड की अनुशंसा वापस लेने की चिट्ठी लिख डाली. और अब तो खुल्लम खुला राजद के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि वो भले दबाव देकर अपनी पार्टी से प्रस्ताव पास करा लें कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा वही रहेंगे, वो पार्टी को क्या जीत दिलाएंगे, अपनी सीटें ये दोनों भाई अपने बलबूते जीत जाएं तो चमत्कार होगा. राजद में हर नेता अपनी उपेक्षा या व्यक्तिगत रूप से लालू यादव की अनुपस्थिति में तेजस्वी से उम्मीदों के जो पुल बांधे था वो टूट रहा है. हर नेता निजी बातचीत में वर्तमान और भविष्य को लेकर बेचैन दिखता है.

लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद राजद विधायकों की बेचैनी इस बात को लेकर और भी ज़्यादा है कि जो वोट का अंतर है वो केवल राजद, मांझी, मल्लाह समीकरण से जीत में बदल नहीं सकता. राजद के विधायक ये बात बिना हिचक स्वीकार करते हैं कि राजद के टिकट पर वो जीत नहीं सकते और नीतीश कुमार का साथ हो जाये तो कोई उन्हें हरा नहीं सकता. इसलिए अधिकांश विधायक अब वापस 'नीतीश शरणम गच्‍छामि‍' हैं. अधिकांश ने अपनी अर्ज़ी दे दी है, सबको अपने भविष्य की चिंता है. और विधानसभा सत्र में आपको राजद विधायकों का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति नरम और भाजपा के प्रति गरम रुख साफ़ झलक जायेगा. वहीं राजद के मुस्लिम विधायकों को नीतीश से कोई परहेज़ नहीं क्योंकि भाजपा के साथ रहकर भी तीन तलाक़, यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों पर वो अपने स्टैंड पर जैसे क़ायम हैं उससे मुस्लिम समाज में उनके लिए इज़्ज़त बढ़ी है. इसके अलावा जो कार्यक्रम चल रहे हैं उससे विरोध के तेवर विधानसभा चुनाव में और नर्म पड़ेंगे. लेकिन फ़ैसला नीतीश को लेना है कि वो इन विधायकों को कब और कैसे अपनी पार्टी में शामिल कराते हैं या राजद का विलय चाहते हैं. लेकिन राजद, उसकी पार्टी के विधायकों, नेताओं का भविष्य अब उनके हाथ में है. समय उन्हें तय करना है.

हालांकि नीतीश कुमार को मालूम है कि अगर विपक्ष कमज़ोर है तो सरकार में उनकी सहयोगी भाजपा भी बैठी रहने वाली नहीं. भाजपा की नजर सबके वोट बैंक में सेंध लगाने की रहती है. और अब भाजपा के पास साधन, संसाधन और मीडिया पर जैसा नियंत्रण है उसका परिणाम है कि मौत बच्चों की हो रही हो, स्वास्थ्य मंत्रालय भाजपा के पास केंद्र से लेकर राज्य तक का हो, पर निशाने पर नीतीश कुमार थे. और ये एक बार की घटना नहीं बल्कि पिछले साल मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका कांड के समय भी वही हुआ. दोनों घटनाओं में जो चैनल सबसे ज़्यादा उनके ख़िलाफ़ मुखर थे उनका ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ आज तक उन्होंने एक शब्द नहीं बोला या दिखाया. हालांकि जैसे राज्य में चमकी बुखार हुआ वैसा असम में होने पर ये लोग मौन धारण कर लिए. इसलिए नीतीश को अपने ऊपर सहयोगी के इशारे पर मीडिया के एजेंडा के बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं.

इसलिए नीतीश कुमार के विरोधी भी मानते हैं कि उन्हें अब हर मुद्दे पर आक्रामक होना होगा. जैसे जलवायु परिवर्तन पर उन्होंने जल, जीवन और हरियाली कार्यक्रम की शुरुआत की जिसके तहत अगर गांव और शहर में काम शुरू हो गया तब नीतीश कुमार को बिहार में सत्ता से हिलाना मुश्किल होगा. उसी तरह से चमकी बुखार के बहाने अगर उन्होंने मात्र कुछ आईसीयू में बिस्तर बढ़ाने के जगह ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों लक्ष्य बनाकर कोई कार्यक्रम शुरू कर दिया तो शायद बिहार में एक दो टर्म चुनाव जीतना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा.

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मनीष कुमार NDTV इंडिया में एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं…

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