मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की मुसीबतों का ‘खलनायक’ कौन?

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ.

नई दिल्ली :

मध्य प्रदेश की गद्दी संभालने के बाद कांग्रेस अपने वादे पूरे कर पाती, इससे पहले ही घमासान शुरू हो गया है और विपक्ष को एक के बाद एक मुद्दे मिलते जा रहे हैं, जो मुख्यमंत्री कमलनाथ (Kamal Nath) की मुसीबत तो बढ़ाएंगे ही, साथ ही सरकार की छवि पर भी असर डालेंगे. राज्य की बागडोर संभालते ही कमलनाथ (Kamal Nath) ने किसानों की कर्जमाफी सहित कई बड़े फैसले लिए. इसके बाद मंत्रिमंडल चयन, विभाग वितरण, नए मुख्य सचिव के चयन में काफी माथापच्ची हुई. सरकार का काम रफ्तार पकड़ पाता कि उससे पहले वल्लभ भवन के उद्यान में होने वाले 'वंदे मातरम्' पर अस्थायी रोक का विवाद पनपा, मीसाबंदी सम्मान निधि (पेंशन) के फिर से निर्धारण और अब भोपाल के पुल पर लगी उद्घाटन पट्टिका पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम पर रंग पोते जाने का मामला गरमा गया है.

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भाजपा के हमलों के बाद सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और सरकार ने कहा कि अब 'वंदे मातरम्' को नए स्वरूप में लागू किया जाएगा, मगर उसके पास यह जवाब नहीं है कि आखिर एक तारीख को होने वाला सामूहिक 'वंदे मातरम्' वल्लभ भवन के उद्यान में आखिर हुआ क्यों नहीं. कहा तो यह जा रहा है कि उस दिन नए मुख्य सचिव के तौर पर एस.आर. मोहंती को पदभार संभालना था और नौकरशाही संशय में थी कि अगर 'वंदे मातरम्' कराया तो कहीं नई सरकार नाराज न हो जाए. बस इसीलिए 13 साल की परंपरा आगे नहीं बढ़ी. सामूहिक 'वंदे मातरम्' पर हुई किरकिरी से सरकार उबर नहीं पाई है कि मीसाबंदियों की पेंशन का मामला उलझ गया. एक उलझाऊ आदेश सामने आया, इस आदेश के बाद मीसाबंदियों को दिसंबर माह की पेंशन नहीं मिल पाई है. इस मसले को भाजपा ने हाथो-हाथ लिया और भोपाल में मीसाबंदियों की बैठक कर डाली. इतना ही नहीं, मीसाबंदियों ने आंदोलन का ऐलान तक कर दिया है.

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ये मामले जोर पकड़े ही थे कि असामाजिक तत्वों ने राजधानी के ओवरब्रिज की उद्घाटन पट्टिका पर किसी ने पीला रंग पोत दिया. इससे तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम दब गया. इसे भाजपा ने मुद्दा बना दिया है. भाजपा इसे संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक बता रही है. प्रशासनिक हलकों में 'वंदे मातरम्' और मीसाबंदी पेंशन के मामलों के बेवजह तूल देने वाला बताया जा रहा है. साथ ही तर्क दिया जा रहा है कि अगर 'वंदे मातरम्' हो जाता तो क्या नुकसान होता और दूसरा मीसाबंदी पेंशन को जारी रखते हुए जांच कराई जाती तो सरकार पर इतना तो बोझ न आता कि आर्थिक व्यवस्था चौपट होती. (इनपुट- IANS)

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