देश के अन्नदाता दिल्ली आए, हम रोशनी का इंतजाम भी न कर पाए

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सोचता हूं महीने-डेढ़ महीने पहले जब दिल्ली के रामलीला मैदान में दशहरा मनाया जा रहा होगा क्या तब भी यह ऐसे ही अंधेरे में डूबा होगा ? महानगरों क्या, अब तो कस्बों तक में रामलीला-दशहरा मैदान रोशनी में जगमगा जाते हैं. देश भर के कोने-कोने से जब हजारों किसान दिल्ली के दिल से अपनी व्यथा-कथा कहने आए तो क्या देश की राजधानी किसानों के लिए मामूली रोशनी का इंतजाम नहीं कर पाई. रामलीला मैदान के तकरीबन आधे हिस्से में लगा किसानों का शामियाना रोशनी से उतनी ही दूर था जितनी दूरी अक्सर शहर और गांवों में रहती है. मैदान के आसपास की अट्टालिकाओं से दिखती रोशनी और शामियाने में पसरा अंधेरा बहुत ठीक तरह से इस देश में किसानों की व्यथा कह रहा था. किसानों के लिए शायद यह रोज की बात हो, वे मीलों चलकर बहुत तैयारी के साथ दिल्ली आये थे. वे किसी भी जोखिम को उठाने को तैयार थे, लेकिन दिल्ली के लिए तो जरूर यह शर्म की बात है.
यह पहला मौका नहीं था जबकि दिल्ली को किसानों ने घेरा होगा. इसी साल तकरीबन चार बार बड़ी संख्या में किसान दिल्ली को घेरने आ चुके हैं, लेकिन इस बार का किसान मुक्ति मार्च कई मायनों में भिन्न था. इसके पीछे बड़ी मेहनत थी और तैयारी थी. तभी सबसे ज्यादा उत्साह लेकिन अनुशासन में यह हो भी पाया. जहां तक मैं देख पाया, एक भी किसान किसी तरह के अतिरेक में नहीं नजर आया. यह शायद मुंबई में हुए मार्च का विस्तार ही था, जिसका जिक्र पी साईंनाथ सेवाग्राम में अपने व्याख्यान में कर रहे थे. इसी साल अगस्त के महीने में सेवाग्राम में पत्रकारों का एक सम्मेलन हुआ था. जिसमें पी साईंनाथ ने किसानों के संदर्भ में ही तकरीबन दो घंटे अपनी बात कही थी. उन्होंने बताया था कि कैसे किसानों ने अपने मार्च का समय बदलकर पूरी रात पैदल चलना तय किया था, क्योंकि सुबह बच्चों की परीक्षा थी और किसान नहीं चाहते थे कि एक भी बच्चे को इससे कोई दिक्कत होय इसी में उन्होंने कहा था कि किसानों के संघर्ष के लिए अब केवल किसानों को नहीं सभी को आगे आना होगा. इसलिए अब नारा होना चाहिए ‘नेशन फॉर फार्मर्स', ‘डॉक्टर्स फॉर फार्मर्स', ‘जर्नलिस्ट फॉर फार्मर्स', समाज के हर तबके को किसानों के लिए उठ खड़ा होना होगा.
हुआ भी, थोड़ी संख्या में सही. शायद ही किसी दिल्लीवासी को किसानों के इस मार्च से परेशानी हुई हो,और हुई भी हो तो समाज के सबसे वंचित इस वर्ग के लिए इस परेशानी को सहकर भी सहयोग किया जा सकता है. पर क्या यह संघर्ष किसी नतीजे पर पहुंचेगा. यूं तो राहुल गांधी भी मंच पर आए और अरविंद केजरीवाल भी आ ही गए. फारूक अब्दुल्ला से लेकर प्रकाश करात, डी राजा सहित तकरीबन नौ दलों के नेता वहां पहुंचे. एक दिन पहले रामलीला मैदान में जिस वक्त देश में पहली बार एक शाम किसानों के नाम चल रही थी, उसी समय पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा भी पहुंचे और किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि अटल सरकार के समय वह खुद कर्नाटक के 2500 किसानों को लेकर राजधानी आए थे, लेकिन उनकी 24 में से एक भी मांग पूरी नहीं हो सकी. तो ऐसे में कैसे विश्वास कर लिया जाए कि ऐसे मार्च का सत्ता पर कोई असर भी होगा या ठीक चुनाव के पहले राजनीतिक दलों को भी ऐसे बड़े मार्च में शामिल होने में वोटों की महक आ रही है. इस सवाल का जवाब खोजना होगा, क्योंकि राजनीतिक दलों ने आज ही नहीं हमेशा ही किसानों को वोट बैंक के लिए भरपूर इस्तेमाल किया है.
टिप्पणियां किसानों के मंच पर नेताओं की उपस्थिति ने जरूर सवाल करने के मौके दिए हैं, लेकिन क्या वह यह बताएंगे कि क्या उनके दलों से किसी नेता को मंच पर आने से रोका गया था. क्या प्रधानमंत्री देश के कोने-कोने से आए किसानों को संबोधित नहीं कर सकते थे. मन की बात कहना तो दूर रामलीला मैदान में वह किसानों की केवल एक रात तक रोशन नहीं कर सके। डॉक्टर्स फॉर फार्मर्स सोलर लालटेन की रोशनी में थके-हारे किसानों को दवा दे रहे थे. मीडिया के कैमरे केवल फ्लैश लाइट के सहारे बोलने वाले का चेहरा दिखा पा रहे थे. क्या यह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की भी जिम्मेदारी नहीं थी, जो अगले दिन मंच से किसान हित की बात कर रहे थे. खैर दिल्ली की ठंड में ठिठुरते किसान सुबह वैसी ही शांति से उठे और चल दिए क्योंकि अब सिर्फ उन्हें नहीं सोचना है, बल्कि उन्हें भी है सोचना है जिन्हें कुछ करने की जिम्मेदारी देश की आवाम ने दी है.
राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं…

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