दिल्ली : रोगी कल्याण समिति में लाभ के पद का मामला, राष्ट्रपति ने फैसले में देरी की?

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प्रतीकात्मक फोटो.

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के 27 विधायकों को बड़ी राहत मिली है. चुनाव आयोग ने उन पर लगे आरोप कि, ये 27 विधायक अलग-अलग अस्पतालों की 27 रोगी कल्याण समितियों में अध्यक्ष के पद पर होते हुए लाभ के पद पर थे, को खारिज कर दिया है.
दो साल पहले विभोर आनंद नाम के शिकायतकर्ता ने एक शिकायत राष्ट्रपति के पास भेजी थी जो राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग के पास भेजी थी. इस पर चुनाव आयोग ने फैसला किया और अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी और राष्ट्रपति ने भी सिफारिश स्वीकार कर ली है.
अब आम आदमी पार्टी और दिल्ली की केजरीवाल सरकार इस फैसले पर सवाल उठा रही है. उनका कहना है कि जब जनवरी में विधायकों की सदस्यता रद्द किए जाने की सिफारिश चुनाव आयोग ने की थी तो 24 घंटे के भीतर राष्ट्रपति ने उसको मंजूर किया और नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया था. लेकिन अब जब रोगी कल्याण समिति के मामले में फैसला विधायकों के पक्ष में आया तो राष्ट्रपति ने इस पर मुहर लगाने में करीब चार महीने का वक्त ले लिया.
आम आदमी पार्टी के विधायक मदनलाल जो इन 27 विधायकों में से एक हैं, का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब फैसला हमारे पक्ष में नहीं आया तो एक दिन भी नहीं लगा और राष्ट्रपति जी ने नोटिफिकेशन जारी करवा दिया लेकिन अब जब फैसला हमारे पक्ष में आया है और शिकायतकर्ता की याचिका रद्द हो गई तो राष्ट्रपति जी ने इसको मंजूरी देने में करीब चार महीने का वक्त लगा दिया.'
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यही नहीं, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मीडिया सलाहकार नागेंद्र शर्मा ने ट्वीट कर कहा कि 'बेहद आश्चर्य की बात है कि रोगी कल्याण समिति मामले में दिल्ली के 27 विधायकों के खिलाफ फर्जी शिकायत को खारिज करने चुनाव आयोग की सिफारिश पर आदेश को जारी करने के लिए लगभग चार महीने बाद का वक्त भारत के माननीय राष्ट्रपति को लगा, लेकिन जनवरी में 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने में 24 घंटे नहीं लगाए.'
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आम आदमी पार्टी के विधायक अपने इन सवालों के समर्थन में राष्ट्रपति का वह आदेश दिखा रहे हैं जिसमें साफ लिखा हुआ है कि चुनाव आयोग ने रोगी कल्याण समिति मामले में अपना मत 10 जुलाई 2018 को ही राष्ट्रपति को भेज दिया था. आदेश में लिखा है ' चुनाव आयोग ने इस मामले की जांच करके 10 जुलाई 2018 को यह मत दिया है कि अलका लांबा और 26 अन्य विधायकों पर लाभ के पद मामले में अयोग्यता का मामला नहीं बनता.'
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आपको बता दें कि 19 जनवरी 2018 को चुनाव आयोग ने 20 विधायकों को संसदीय सचिव होने के चलते लाभ के पद पर होने का दोषी माना था और अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी थी. राष्ट्रपति ने 20 जनवरी 2018 को उस पर मुहर लगाई थी. इसके बाद नोटिफिकेशन जारी किया गया था. हालांकि मार्च में दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की सिफारिश और राष्ट्रपति का नोटिफिकेशन रद्द कर दिया था.
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