गोधरा, गठबंधन, राफेल : PM मोदी के लिए कैसे संकट मोचक बन जाते हैं अरुण जेटली ?

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लोकसभा में राफेल पर राहुल गांधी के सवालों का जवाब देते अरुण जेटली.

नई दिल्ली:

दिल्ली के पॉवर कॉरिडोर में तीन सबसे शक्तिशाली ठिकानों पर अगर कभी एक साथ किसी का कब्जा रहा है, तो वह हैं अरुण जेटली(Arun Jaitley). मोदी सरकार(Modi Govt) में वह ऐसे नेता हैं, जिन्हें रायसीना हिल्स स्थित नॉर्थ और साउथ ब्लॉक और उद्योग भवन में एक साथ बैठने का मौका मिला. नार्थ ब्लॉक और उद्योग भवन में आज भी वह बतौर मंत्री विराज रहे हैं, हालांकि अब डिफेंस मिनिस्ट्री उनके पास नहीं है. उद्योग भवन से वह कारपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री चलाते हैं. नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक और उद्योग भवन में अगर काम करने का जेटली को मौका मिला तो यह मोदी सरकार में उनके रुतबे का परिचायक है- ऐसा उन्हें जानने वाले कहते हैं. पिछले साल जब किडनी ट्रांसप्लांटेशन के चलते उन्होंने वित्तमंत्री का कामकाज छोड़ा था, तब पीयूष गोयल ने उनकी जगह ली थी. जब से ढाई महीने बीत गए तो सत्ता के गलियारे में सवाल उछलने लगा- देश का वित्त मंत्री कौन, जेटली या पीयूष गोयल ? खुद यह सवाल बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी उठाया था.

अटकलें लगने लगीं थीं कि अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर विपक्ष और अंदरखाने हमले झेल रहे प्रधानमंत्री मोदी इसी बहाने उनकी वित्तमंत्री पद से विदाई कर कोई दूसरा मंत्रालय दे सकते हैं, मगर तीन महीने बाद दोबारा वित्तमंत्री की कुर्सी पर वापसी कर जेटली ने न केवल आलोचकों का मु्ंह बंद कर दिया, बल्कि मोदी सरकार में अपनी पकड़ मजबूत होने का फिर सुबूत दे दिया. अरुण जेटली और मोदी के संबंधों को करीब से जानने वालों के लिए यह कोई अचरज का विषय़ नहीं था. वह जानते थे कि अरुण जेटली को उनकी इच्छा के विपरती मोदी कभी नहीं छेड़ना चाहेंगे. इन सबके पीछे एक प्रमुख वजह है, वह अरुण जेटली का पीएम मोदी का 'मिस्टर भरोसेमंद होना'. मोदी के दिल्ली आने से पहले से उनके नजदीकी संबंध रहे हैं. दोस्ताना दो दशक पुराना है. नजदीकी की वजह का लिंक गुजरात के गोधरा से भी जुड़ा है. यह सरकार में जेटली का प्रभाव ही है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे अरूण शौरी पूर्व में कई दफा कह चुके हैं कि मोदी, शाह और जेटली की तिकड़ी ही देश और बीजेपी को चला रही है.

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राफेल (Rafale) पर बने संकटमोचक
लोकसभा में बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पूरे शबाब में रहे. उन्होंने राफेल डील (Rafale) पर सवालों के गोले दागे, मसला डिफेंस से जुड़ा था. कायदे से तो सवालों का जवाब रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण को देना था. मगर, सरकार की तरफ से तर्कों और सवालों की ढाल-तलवार लेकर अरुण जेटली खड़े हुए. राहुल के सवालों और अरुण जेटली के जवाबों कितने सही-गलत रहे, यह अलग बहस का विषय है, मगर जेटली ने एक हद तक राहुल गांधी के तीखे सवालों से सरकार को बचाने की प्रभावी कोशिश की. राफेल डील पर शुरुआत से लेकर अब तक अरुण जेटली मोदी सरकार के लिए 'ट्रबलशूटर' (Troubleshooter) यानी 'संकट मोचक' साबित हुए हैं. जितनी प्रेस कांफ्रेंस उन्होंने की, जितनी बार उन्होंने ब्लॉग लिखकर राफेल (Rafale) को लेकर सरकार की तरफ से पक्ष रखा, उतना रक्षामंक्षी निर्मता सीतारमण ने भी नहीं. सवाल उठता है, आखिर ऐसी क्या बात है जो अरुण जेटली पीएम मोदी के लिए हर मर्ज की दवा बन गए हैं. हर बार संकटमोचक नजर आते हैं. चाहे बहस संसद में हो या फिर सड़क पर. जवाब देने के लिए अक्सर जेटली ही नुमाया होते हैं.

वाजपेयी की तुलना में वर्तमान मोदी कैबिनेट में प्रतिभाशाली मंत्रियों की कमी के आरोप लगते हैं. आलोचक कहते हैं कि अरुण जेटली सहित कुछ ही मंत्री ऐसे हैं, जिनमे राजनीतिक ही नहीं हर तरह का चातुर्य नजर आता है. जो टू द प्वाइंट बहस में भाग लेते हैं और ट्रोलिंग की जगह तर्कों की ढाल बनाकर मैदान में उतरते हैं. अरुण जेटली वर्तमान मोदी कैबिनेट के सबसे टैलेंटेड मंत्रियों में से एक हैं. इसमें बड़ी भूमिका सुप्रीम कोर्ट में लंबी वकालत भी है. राजनीतिक बहस हो जाए तो उसमें अपनी वकालत की कला का समुचित इस्तेमाल करते हैं. अंग्रेजी पर जितनी पकड़ है, उतनी ही हिंदी पर. अच्छे कम्युनिकेटर हैं. बहस हर स्तर पर और हर ढंग से कर सकते हैं. बात रखने के दौरान कभी नरम हो जाते हैं, कभी आक्रामक नजर आते हैं तो फिर व्यक्तिगत हमले से भी गुरेज नहीं करते. जैसे बुधवार को लोकसभा में बहस के दौरान दिखा. जब उन्होंने राफेल पर बहस के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से कह दिया- इन्हें अपना ज्ञान एबीसीडी से शुरू करने की जरूरत है.

हर पेंच फंसने पर याद आते हैं जेटली (Arun Jaitley)
हाल में जब बिहार में एनडीए के बीच सीटों की शेयरिंग का मुद्दा फंसा था तो यहां भी अरुण जेटली संकटमोचक की भूमिका में दिखे. उन्होंने रामविलास पासवान से करीब घंटे भर लंबी मीटिंग कर सीटों का पेंच सुलझा लिया था. जबकि अधिकांश को लगने लगा था कि उपेंद्र कुशवाहा के बाद अब पासवान भी एनडीए से नाता तोड़ने वाले हैं. अरुण जेटली ऐसे नेता हैं, जिनके विपक्ष के नेताओं से भी अच्छे रिश्ते हैं. यही वजह है कई बार जब लोकसभा में किसी बिल के मसले पर सरकार को विपक्ष से बातचीत करने को मजबूर होना पड़ा है तो जेटली ही आगे किए. विवादित भूमि अधिग्रहण बिल का मामला नजीर है. ललित गेट प्रकरण में आरोपों की बौछार झेल रहीं सुषमा स्वराज के बचाव में भी जेटली पुरजोर तरीके से सामने आए थे.

गोधरा, एनकाउंटर केस से मोदी-शाह को कैसे उबारा ?

2002 में जब गोधरा दंगा हुआ तो बीजेपी के शीर्ष नेताओं में अगर कोई तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के समर्थन में खडा़ हुआ तो वह अरुण जेटली ही थे. जब अटल बिहारी वाजपेयी मोदी के खिलाफ कार्रवाई की सोच रहे थे,तब जेटली ने आडवाणी को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध किया था. जेटली की लॉबिंग पर कई नेता मोदी के पीछे खड़े नजर आए. यूं तो मोदी की जेटली से जान-पहचान पहले से थी, मगर इस घटना ने मोदी को जेटली के ज्यादा नजदीक ला दिया. 2005 में सोहराबुद्दीन शेख का बहुचर्चित एनकाउंटर हुआ.इसमें गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह फंसे. गोधरा में मोदी और कथित फेक एनकाउंटर में फंसे अमित शाह को डिफेंड करने में अरुण जेटली हमेशा मानो 'एक पांव' पर खड़े रहे.

आप 2002 से लेकर 2013 तक के अखबारों के पन्ने पलट लीजिए तो गोधरा, सोहराबुद्दीन शेख, इशरत जहां, हरेन पांड्या आदि केस में मोदी और शाह को डिफेंट करने से जुडे़ तमाम बयान अरुण जेटली के मिल जाएंगे. इतना बीजेपी के अन्य किसी शीर्ष नेता ने मोदी के पक्ष में बयानबाजी नहीं की थी.बयानबाजी ही नहीं जेटली ने केस में कानूनी मदद भी खूब की. हर क्षेत्र में अपने संपर्कों का भी बखूबी इस्तेमाल भी किया.

लिखा था चर्चित लेटर

27 सितंबर 2013 को अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक चर्चित पत्र लिखा था. इस पत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज भी अपनी वेबसाइट पर संभालकर रखा है. इस पत्र में अरुण जेटली ने यूपीए सरकार पर जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह को फंसाने का आरोप लगाया था.अपने पत्र में अरुण जेटली ने हरेन पांड्या से लेकर सोहराबुद्दीन, इशरत जहां, सोहराबुद्दीन आदि एनकाउंटर केस के जरिए बीजेपी के संबंधित नेताओं को फंसाने का आरोप लगाया था.

गुजरात से बाहर होने पर जेटली के घऱ गए थे शाह
सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में सीबीआई ने 2010 में अमित शाह को गिरफ्तार कर लिया था. बाद में जमानत पर वह छूटे थे. मगर सुप्रीम कोर्ट ने जब उन्हें गुजरात छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था. कहा जाता है कि उस वक्त वह गुजरात से दिल्ली में अगर कहीं सबसे पहले पहुंचे थे तो वह अरुण जेटली का आवास था. अरुण जेटली ने इस केस से बचाने में हर संभव कानूनी सहायता अमित शाह को दिलाई. कहा जाता है कि अमित शाह को केस से बचाने में राम जेठ मलानी ही नहीं अरुण जेटली का भी बड़ा हाथ रहा.

मोदी के लिए शाह के बाद दूसरे मिस्टर भरोसेमंद

लोकसभा में भले ही राजनाथ सिंह उपनेता हैं. आधिकारिक तौर पर राजनाथ सिंह को सरकार में नंबर दो कहा जाता है. मगर राज्यसभा में लीडर ऑफ हाउस की हैसियत से अरुण जेटली को मोदी सरकार में सबसे प्रभावशाली माना जाता है. बीजेपी के कई नेता यह स्वीकार करने से हिचक नहीं करते कि नरेंद्र मोदी अगर अमित शाह के बाद किसी को सबसे ज्यादा करीबी और भरोसेमंद मानते हैं, तो वह अरुण जेटली हैं. यही वजह है कि सरकार के ज्यादातर फैसलों में अरुण जेटली की सीधी भूमिका नजर आती है. इस भरोसे के पीछे अरुण जेटली का मोदी-शाह को संकट के समय साथ देना है.

जानकार यह भी बताते हैं कि जब मई, 2014 में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो एक प्रकार से वह दिल्ली के लिए 'आउटसाइडर' ही थे. लगातार तीन बार चीफ मिनिस्टर रहते भले ही उन्हें सत्ता के रंग-ढंग मालुम थे, मगर यह भली-भांति जानते थे कि दिल्ली गांधीनगर नहीं हैं. यहां की चाल-ढाल कुछ अलग ही है. नरेंद्र मोदी को अपनी कैबिनेट में एक ऐसे शख्स की तलाश थी, जो दिल्ली और लुटियन्स जोन की रग-रग से वाकिफ हो. उनकी यह तलाश अरुण जेटली पर जाकर टिकती थी. यही वजह है कि अमृतसर से 2014 का लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद भी उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया. डिफेंस और कारपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री बने. वे मोदी कैबिनेट के ऐसे मंत्री रहे, जिन्हें एक साथ नॉर्थ ब्लॉक( वित्तमंत्रालय) और साउथ ब्लॉक( रक्षामंत्रालय) में बैठने का मौका मिला. यह उनमें मोदी के भरोसे का सुबूत है.

जेटली की पृष्ठिभूमि
जेटली छात्र जीवन में एबीवीपी से जुड़े थे. 1975 में इमरजेंसी का विरोध करने पर इंदिरा गांधी सरकार में 19 महीने तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी थी. उनके पिता किशन जेटली दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में वकालत करते थे. जेटली ने भी कानून की पढ़ाई की और अपने पिता का साथ देने लगे. मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे जेटली बाद में वकील दोस्त राजीव नायर के साथ मिलकर दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत शुरू किए. 2014 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान जेटली ने अपनी संपत्ति 113 करोड़ दिखाई थी. अरुण जेटली का मुख्य पेशा वकालत ही है.

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वीडियो- लोकसभा में राफेल की कीमतों पर राहुल गांधी और अरुण जेटली के बीच बहस

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