क्या हम पटेल के विचारों की ऊंचाई भी छू पाएंगे?

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आज सरदार का दिन है. जन्मदिन है. हम सबके सरदार दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं. जन्मदिन पर सरदार को एक नई सोहबत मिली है. दुनिया की ऊंची प्रतिमाओं की सोहबत मिली है. अब उनकी तुलना जिन प्रतिमाओं से होगी उनमें उनकी प्रतिमा नहीं है, जिनके साथ और जिनके पीछे सरदार सरदार बने रहे. मतलब सरदार गांधी और नेहरू से अलग इन प्रतिमाओं की सोहबत में भी खूब चमक रहे हैं. फकत 3000 करोड़ से ही सरदार पटेल की प्रतिमा दुनिया में सबसे ऊंची हो गई. 3000 करोड़ सुनकर अफसोस न करें. सोचें कि आपने स्कूल कॉलेज या अस्पताल के लिए कब संघर्ष किया. कब लाइब्रेरी की मांग की. हां आप कह सकते हैं कि जब यूपी में मायावती, फूले, शाहू, अंबेडकर की प्रतिमाएं लगा रही थीं तब उनका विरोध क्यों हुआ था. तब भ्रष्टाचार के आरोप तो लगे ही, जिसकी जांच का आज तक पता नहीं, मगर उस दौरान मायावती की बनाई मूर्तियों का खूब मज़ाक उड़ाया गया. कहा गया कि अस्पताल चाहिए मूर्ति नहीं. इसलिए अफसोस न करें. कोई कुछ नहीं बोलेगा. न ज़माना बोलेगा न ज़मीर बोलेगा.
Statue Of Unity की वेबसाइट पर आइये यहां सबसे आगे 182 मीटर ऊंचे हैं हमारे सरदार. उसके बाद 153 मीटर ऊंची है चीन की स्प्रिंग टेंपल ऑफ बुद्धा. तीसरे नंबर पर है 120 मीटर ऊंची जापान के उशिकू दाईबुशू की प्रतिमा. चौथे नंबर पर है 93 मीटर ऊंची अमरीका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी, जिसकी ऊंचीई 93 मीटर है. पांचवे नंबर है 85 मीटर ऊंची रूप की दि मदर लैंड कॉल्स की प्रतिमा और छठे नंबर 38 मीटर ऊंची ब्राज़ील के क्राइस्ट दि रीडीमर हैं.
सरदार पटेल भारत की राजनीति के एक वर्ग में दमित इच्छा के रूप में गढ़ दिए गए हैं. नेहरू बनाम पटेल की प्रतिस्पर्धा के बग़ैर न नेहरू की बात हो पा रही है न पटेल की. एक बड़े वर्ग को लगता रहा कि यदि पटेल प्रधानमंत्री होते. जबकि पटेल ने कभी नहीं कहा कि यदि वे प्रधानमंत्री होते. वे खुद को गांधी का सिपाही कहते थे. नेहरू को अपना नेता मानते थे. Statue Of Unity की वेबसाइट पर गांधी और नेहरू की तस्वीरों के बग़ैर सरदार की दुनिया बड़ी तो हो गई है, लेकिन अकेली भी हो गई है. आप कह सकते हैं कि नेहरू के नाम पर बने स्मारकों में क्या सरदार की प्रतिमा है. यह सवाल भी सही है.
आप खुद भी प्रधानमंत्री के भाषण सुने. उन्होंने बहुत ही सहजता से अपने भाषण में सरदार के योगदानों का एकीकरण अपनी सरकार की योजनाओं से कर दिया. इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने कहा कि सरदार की प्रतिमा को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए. उनका खुद का भाषण राजनीति से भरा है या वाकई गैर राजनीतिक भाषण है, आपको तय करना है. दरअसल सरदार पटेल के विरासत के साथ यही बड़ी नाइंसाफी है कि उनकी बात हमेशा नेहरू के संदर्भ में होती है, जबकि उनका जीवन गांधी के संदर्भ में था. उन्होंने कभी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नहीं की, न ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए गुटबाज़ी. एक बार जब वकालत छोड़ दी, ऐशो आराम छोड़ दिया तो जीवन भर के लिए छोड़ दिया. नेहरू और पटेल दोनों ही वाकिफ थे कि उन्हें लेकर किस तरह की चर्चा होती है. दिसंबर 1950 में डॉक्टरों के कहने पर पटेल को दिल्ली छोड़ना पड़ रहा था. छोड़ने के पहले पटेल ने एमवी गाडगिल से कहा कि मैं अब नहीं जीऊंगा. मुझसे एक वादा करो. गाडगिल ने हां कहा तब पटेल ने उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि पंडित जी से तुम्हारे जितने भी मतभेद हों, लेकिन उनका साथ मत छोड़ना. ये थे सरदार पटेल.
राजमोहन गांधी ने पटेल की जीवनी में पेज नंबर 532 पर यह प्रसंग लिखा है. 2 अक्तूबर 1950 को कहा था कि जवाहरलाल नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है. और इसकी घोषणा भी उन्होंने की है. बापू के सारे सैनिकों का फर्ज़ है कि वे जवाहरलाल जी के आदेशों का पूरा पालन करें. मैं बेवफा सिपाही नहीं हूं. मैं जिस स्थान पर हूं उसके बारे में मुझे कभी विचार भी नहीं आता था. मैं तो इतना जानता हूं कि मुझे जहां रखा था मैं वहा हूं.
दिल्ली छोड़कर जाते हुए सरदार पटेल ने गाडगिल से क्यों कहा कि वादा करो, जवाहर को अकेला मत छोड़ना. दोनों के बीच ठोस मतभेद थे मगर आपसी सम्मान भी ठोस था. मणिबेन पटेल सरदार की बेटी थीं. डाह्याभाई पटेल वल्लभभाई पटेल उनके बेटे थे. सरदार पटेल के निधन के बाद डाह्याभाई पटेल कांग्रेस के टिकट पर 1957 और 1962 में लोकसभा का चुनाव जीते. मणिबेन कांग्रेस के टिकट पर 1952 और 1957 में लोकसभा के लिए चुनी गईं और फिर राज्यसभा भी गईं. मणिबेन ने आपातकाल का विरोध किया और तब जनता पार्टी के टिकट पर मेहसाणा से 1977 में चुनाव जीत गईं. शेष नारायण सिंह ने अपने फेसबुक पेज पर यह जानकारी दी है. यह जानकारी देते हुए भी दुख हो रहा है कि हम इतिहास को किन चश्मों से देखने लगे हैं. इतिहास समझने के लिए होता है, हिसाब के लिए नहीं.
आज इंदिरा गांधी की पुण्यतिथी है. इसी दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी और उसके बाद सिखों के साथ नरसंहार हुआ था. अजीब सा मुकाबला है. कहीं सरदार को बड़ा किया जा रहा है तो कहीं इंदिरा को. होड़ में लिखा जा रहा है कि इंदिरा ने भी पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए. अमरीका के आगे नहीं झुकीं. प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें ट्विट के ज़रिए श्रद्धांजलि दी है. उनके ट्वीट में 84 के दंगों का कोई ज़िक्र नहीं है. कायदे से दोनों पक्षों को मारे गए सिखों को याद करना चाहिए था. इससे हमारे राजनीति बड़ी बनती न कि छोटी हो जाती. कितना अच्छा होता कि राहुल गांधी भी और नरेंद्र मोदी भी नरंसहार में मारे गए सिखों को याद करते, राजनीति को हिंसा से दूर रखने के लिए आज भी कहते तो पता चलता कि हमारे नेता हिंसा को लेकर बाद में कितना अच्छा सोचते हैं. इन तस्वीरों में आप राहुल गांधी और सोनिया गांधी के अलावा अन्य कांग्रेसी नेताओं को देख रहे हैं. राहुल गांधी ने इंदिरा गांधी को व्यक्तिगत रूप में और राजनेता के रूप में भी याद किया है.
कांग्रेस पर आरोप लगता है कि उसने पटेल की विरासत को कभी आगे नहीं किया. कांग्रेस को सोचना चाहिए कि उस पर यह आरोप लगने का मौका कहां से आया. ऐसा नहीं है कि पटेल के नाम पर संस्थान, एयरपोर्ट, अस्पताल, या नगर नहीं हैं. फिर भी यह जवाब कांग्रेस को देना है कि वह पटेल को लेकर क्यों असहज रही. पिछले चार साल में कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता नेहरू पर होने वाले अनाप शनाप हमलों का भी बचाव नहीं कर पाए. पटेल का बचाव क्या करेंगे.
राहुल गांधी ने ट्वीट किया है कि सरदार पटेल राष्ट्रभक्त थे जिन्होंने आज़ादी, एकता और सेकुलर भारत की लड़ाई लड़ी. स्टील के इरादे वाले सरदार करुणा से भरे थे, वे दिल से कांग्रेसी थे, जिन्होंने धर्मांधता या सांप्रदायकिता को कभी बर्दाश्त नहीं किया. उनकी जन्मशति पर भारत के इस महान सपूत को सलाम करता हूं. इसी के साथ राहुल का एक और ट्वीट है कि यह भी विडंबना है कि सरदार पटेल की प्रतिमा का अनावरण हो रहा है, लेकिन उन्होंने जिन संस्थानों को बनाया वे सभी ढहाए जा रहे हैं. भारत की संस्थाओं का व्यवस्थित रूप से खंडित किया जाना देशदोह से कम नहीं है.
एकता की प्रतिमा तो बन गई, लेकिन आज वाकई सरदार की ज़रूरत है. जब हमारी राजनीति हिन्दू होने या न होने, असली हिन्दू होने या नकली हिन्दू होने की बहस में चली जाए तो यही वक्त है अपने भीतर उस सरदार को खोजने का जो कहीं गुम हो गए हैं. जो लोहे की तरह सांप्रदायिकता के खिलाफ थे. 1941 में जब अहमदाबाद में दंगे भड़क उठे तब सरदार पटेल ने कहा था आपको एकाएक यह क्या सूझा कि आप एक-दूसरे के गले काटने लगे. मुझे दुख इस बात का है कि हमारी आबरू चली गयी. अहमदाबाद शहर के नाम पर कलंक लग गया. कैसे मिटाया जाए इसे. इसे मिटाने का एक ही तरीका है कि हम इस बात की कोशिश करें कि दुबारा इस शहर में ऐसा वातावरण पैदा न हो.
2002 में अहमबादाबाद पर फिर से कलंक लगा था. क्या आज के दिन 84 और 2002 के दंगों के प्रति सभी को प्रायश्चित नहीं करना चाहिए था. जब गांधी की हत्या हुई तब गृहमंत्री पटेल ही थे. उन्होंने तब आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया. बल्कि अपने मंत्रालय के अधीन सूचनाओं का हवाला देते हुए साफ-साफ कहा कि हत्या के बाद संघ के लोगों ने मिठाई बांटी थी. 11 सितंबर 1948 को पटेल से आरएसएस के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर को पत्र लिखा था कि हिन्दुओं को संगठित करना और उनकी सहायता करना एक बात है, लेकिन अपनी तकलीफों के लिए बेसहारा और मासूम पुरुषों, औरतों और बच्चों से बदला लेना बिल्कुल दूसरी बात. इसके अलावा ये भी था कि उनके कांग्रेस विरोध ने, वो भी इस कठोरता से कि न व्यक्तित्व का ख्याल, न सभ्यता का, न शिष्टता का, जनता में एक प्रकार की बेचैनी पैदा कर दी. इनके सारे भाषण सांप्रदायिक विष से भरे थे. हिन्दुओं में जोश पैदा करना व उनकी रक्षा के प्रबंध करने के लिए आवश्वयक न था कि ज़हर फैले. इस ज़हर का फल अंत में यही हुआ कि गांधी जी की अमूल्य जान की कुर्बानी देश को सहनी पड़ी. सरकार व जनता की रत्ती भर सहानुभूति आरएसएस के साथ न रही, बल्कि उनके खिलाफ हो गई. गांधी जी की मृत्यु पर आरएसएस वालों ने जो हर्ष प्रकट किया और मिठाई बांटी, उससे यह विरोध और भी बढ़ गया. इन हालात में सरकार को आरएसएस के खिलाफ कदम उठाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.
इस प्रतिमा को लेकर सरदार सरोवर बांध के आस पास के गांव के लोगों ने सवाल उठाए हैं. 72 गांव के लोगों ने कहा कि 31 अक्तूबर को प्रतिमा के अनावरण के विरोध में उपवास रखेंगे. चूल्हा बंद रहेगा. 22 गांवों के प्रधानों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है कि यहां के जंगलों, नदियों, जलप्रपातों, खेतों ने सदियों से हमारा ख्याल रखा है. हम इन्हीं के आसरे जीते रहे हैं, लेकिन अब सब नष्ट किया जा रहा है. क्या आपको नहीं लगता कि यह किसी की मौत पर जश्न के समान है. हमें तो ऐसा ही लगता है. हम गांव वाले बहुत दुख के साथ कहना चाहते हैं कि हम 31 अक्तूबर को आपका स्वागत नहीं करेंगे. आप बिन बुलाए मेहमान की तरह आएंगे तो हम आपका स्वागत नहीं करेंगे. अगर सरदार पटेल ने देखा होता कि कैसे प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किया जा रहा है, हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो वे रो देते. जब हम अपनी आवाज़ उठा रहे हैं, आपकी पुलिस कार्रवाई कर रही है. आप हमारी तकलीफों को सुनने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा है कि इस प्रतिमा के कारण आस पास के आदिवासी लोगों को रोज़गार मिलेगा. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यहां एक ऐसी एकता नर्सरी बने कि यहां आने वाला टूरिस्ट अपने घर एकता का पौधा ले जाए और बोए
टिप्पणियां अब इम्तहान आपका है, आप यानी जनता का. टूरिस्ट स्पॉट बन गया है. इसलिए यह स्पॉट मुफ्त नहीं है. आपको भी ये न लगे कि आप सरदार का दर्शन मुफ्त में कर रहे हैं इसलिए ऑनलाइन टिकट की व्यवस्था है. दो प्रकार के टिकट हैं. 3 साल के बच्चों को टिकट नहीं लगेगा. Observation Deck view, Valley of Flower, Memorial, Museum & Audio Visual Gallery, SOU site, Sardar Sarovar Dam देखने के लिए 350 रुपये के टिकट लगेंगे. अगर आप Observation Deck view, नहीं जाना चाहेंगे तो उसके लिए अलग से पैकेज है. प्रौढ़ लोगों को 60 रुपये का टिकट लगेगा और बच्चों को 60 रुपये. बस का चार्ज है 30 रुपया.
टिकट के मामले में भी सरदार की प्रतिमा भारत के कई महलों, किलों और इमारतों से महंगी हो गई है. महंगी कहना ठीक नहीं होगा, कहना चाहिए कि टिकट के दाम भी सबसे ऊंचे हैं. जबकि दिल्ली के लाल किले का टिकट 35 रुपया है, ताजमहल का 50 रुपया. ताजमहल देखने के लिए हर साल 70 से 80 लाख पर्यटक आते हैं, जिनमें से 8 लाख विदेशी पर्यटक होते हैं विदेशी पर्यटकों के लिए 1100 रुपए का टिकट है. ताजमहल से 20 करोड़ की कमाई होती है. इस समय जब सीबीआई के दो-दो अफसर एक दूसरे पर मुकदमा करने के कारण दफ्तर से बाहर कर दिए गए हैं, तीसरे अफसर पर भी आरोप लग रहे हैं, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया अपनी स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहा है, चुनाव आयोग पर भी सवाल उठ जा रहे हैं. प्रधानमंत्री पटेल के बनाए हुए स्टील फ्रेम को याद कर रहे हैं. जो सरदार सबके लिए लड़े, उस सरदार के लिए सब लड़ रहे हैं. इसलिए सरदार सरदार थे, उन्हें लेकर लड़ने वाले सरदार नहीं हो सकते हैं.
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