क्या भारत में पत्रकारों के सवालों पर अंकुश नहीं?

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अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप

अमरीका में मध्यावधि चुनाव के नतीजे आए हैं. उन नतीज़ों पर अलग से चर्चा हो सकती है, होनी भी चाहिए लेकिन एक बात की चर्चा हिन्दुस्तान के पत्रकारों के बीच ज़्यादा है. उनके बीच भी है जो भारत की मीडिया को गोदी मीडिया में बदलते हुए देख रहे हैं. अमरीका में राष्ट्रपति ट्रंप की एक बात की दाद दी जा सकती है कि चुनाव में अनुकूल नतीजे न होने पर भी उन्होंने ख़ुद ट्वीट किया है कि वे प्रेस कांफ्रेंस करने वाले हैं. वहां इस बात की परंपरा भी है. अपनी चुनावी रैलियों के लिए रवाना होते हुए या रैलियों से लौटने के बाद हवाई अड्डे पर भी पत्रकार उनसे बिना किसी लाग-लपेट के सवाल पूछ लेते हैं. एक ऐसे ही कवरेज़ में मैंने देखा कि सीएनएन का पत्रकार अपने राष्ट्रपति से पूछ रहा है कि आप जो माइग्रेशन यानी बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ भय पैदा कर रहे हैं, उसके प्रमाण क्या हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने जवाब दिया. क्या भारत में मुमकिन है कि कोई पत्रकार प्रधानमंत्री से पूछ दे कि आप जो कह रहे हैं कि भगत सिंह से जेल में मिलने कांग्रेस का कोई नेता नहीं गया, इसका प्रमाण क्या है. क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं. 7 नवंबर को चुनावी नतीजे के बाद व्हाइट हाउस में जब सीएनन के पत्रकार जिम अकोस्टा ने ट्रंप से सवाल किया और अपने सवाल पर टिके रहे तब ट्रंप ने आपा खो दिया, फिर भी अकोस्टा ने अपना सवाल को नहीं छोड़ा. इस वीडियो को दुनिया भर में देखा गया है. भारत में मीडिया पर नज़र रखने वाले और पत्रकार दोनों आहें भर रहे हैं, कुछ आंखें चुरा रहे हैं कि क्या भारत में ऐसा मुमकिन है? क्या यह अच्छा है, क्या हमने ऐसे ही भारत की कल्पना की थी कि प्रधानमंत्री से खुलकर एक सवाल, एक इंटरव्यू कल्पना की बात हो जाए.
भारत में पांच साल होने जा रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने कभी खुलकर प्रेस कांफ्रेंस नहीं की. दो चार इंटरव्यू दिए लेकिन उनकी याद तभी आती है जब आप कहीं पकौड़ा तलते देखते हैं. ट्रंप आपा खोते हुए भी प्रेस के बीच हैं. प्रेस के सामने हैं. पत्रकार एक राष्ट्रपति के हावी होते हुए भी वहीं टिका है. भारत में अगर कोई ऐसा कर दे तो चैनल चलाने वाले सबसे पहले उस पत्रकार को बर्खास्त करना अपना कर्तव्य समझेंगे. उसके दफ्तर लौटने से पहले उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा. अकोस्टा से भी मान्यता छीन ली गई है मगर सीएनन उनके साथ खड़ा है. भारत होता तो घर पहुंचने से पहले निकाल दिया जाता. सीएनन ने बयान जारी कर कहा है कि अकोस्टा पर इंटर्न पर हाथ रखने के आरोप झूठे हैं और संस्थान उसके साथ खड़ा है. सीएनन ने अपने बयान में कहा है कि 'व्हाइट हाउस ने आज के प्रेस कांफ्रेंस में चुनौती देने वाले सवाल पूछने का बदला लेते हुए अकोस्टा की मान्यता रद्द कर दी है. प्रेस सचिव सारा सैंडर्स ने झूठ बोला है. उन्होंने फर्जी आरोप लगाए हैं और ऐसी घटना का ज़िक्र किया है जो हुई ही नहीं. यह अप्रत्याशित फैसला लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. देश को इससे बेहतर की उम्मीद थी. जिम अकोस्टा को हमारा पूरा समर्थन है.'
इसलिए हमने आज प्राइम टाइम की शुरुआत इस प्रसंग से की. हम लगातार मीडिया खासकर न्यूज़ चैनलों के गोदी मीडिया और गोदी मीडिया के सांप्रदायिक होते जाने को बर्दाश्त करते जा रहे हैं. हमारे न्यूज़ चैनल दिन रात हिन्दू मुस्लिम डिबेट दिखाते हैं. चार साल से इसी कोशिश में हैं कि टीवी देखने वाला हर दर्शक दंगाई हो जाए. दस साल बाद आपको मेरी हर बात बहुत याद आएगी. क्या भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए कि सारे पत्रकार हों, प्रधानमंत्री हों और फिर सवाल हो. प्रधानमंत्री मोदी जब लंदन गए थे तब लोगों ने इस बात को भी नोटिस नहीं किया कि उनसे बात करने वाले प्रसून जोशी उन्हीं के द्वारा नियुक्त किए गए हैं. प्रसून जोशी सेंसर बोर्ड के चीफ हैं. जो व्यक्ति जिस सरकार द्वारा नियुक्त हुआ हो वह सवाल क्या करेगा. मगर प्रसून जोशी न निराश नहीं किया. उन्होंने वही सवाल किया जो प्रधानमंत्री के इंटरव्यू के लिए चुने हुए पत्रकार करते. वही ड्रीम क्वेश्चन. प्रधानमंत्री आप सोते कब हैं. इतनी ऊर्जा कहां से आती है.
आज अगर प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस कर रहे होते तो नोटबंदी और रफाल को लेकर कई सवाल होते. रोज़गार को लेकर भी एकाध सवाल आ ही जाता और फिर सीबीआई और आरबीआई को लेकर पत्रकार इस तरह से पूछ ही लेते हैं कि आप इन विवादों को कैसे देखते हैंटबंदी 8 नवंबर को लागू हुई थी, आज 8 नवंबर है. दो साल हो गए. आज ऐसा कोई बयान नहीं आया है जबकि मोदी सरकार इस दिन को एंटी ब्लैक डे के रूप में मनाती है. इतने महत्वपूर्ण डे यानी दिवस पर प्रधानमंत्री का एक ट्वीट तक नहीं आया. फैज़ाबाद ज़िले का नाम अयोध्या करने पर ट्वीट नहीं आया लेकिन नोटबंदी पर तो आ ही सकता था. सवाल है प्रधानमंत्री नोटबंदी पर क्यों नहीं बोल रहे हैं.
2016 की तरह अब उनके भाषणों से नोटबंदी करीब करीब गायब है और माल्या, चौकसी और नीरव भी देश से गायब हैं. प्रधानमंत्री ने नोटबंदी छोड़ दी, माल्या और चौकसी ने देश ही छोड़ दिया. रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी नोटबंदी के असर की तारीफ करते हुए ट्वीट किया है और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी ब्लॉग लिखा है. जेटली ने लिखा है कि 'सरकार ने सबसे पहले भारत के बाहर कालाधन को टारगेट किया. संपत्ति जमाखोरों से कहा गया कि जुर्माना टैक्स देकर काला धन वापस लाएं. जो नहीं कर पाएं उन पर ब्लैक मनी एक्ट के तहत कार्रवाई हो रही है. कार्रवाई करने से बाहर के खाते और संपत्तियों के ब्यौरा सरकार के पास आ गए हैं.'
कितनी संपत्ति विदेशों में जमा थी, उनमें से कितना काला धन आया, कितना पैसा टैक्स के रूप में मिला, यह सब डिटेल ब्लॉग में नहीं है. वित्त मत्री लिखते हैं कि जनधन के कारण कमज़ोर लोग औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बने. मगर जनधन का अभियान तो नोटबंदी से पहले का है. उसका नोटबंदी से क्या लेना देना. उन्हें यह बताना चाहिए था कि जनधन के कितने खाते इस वक्त निष्क्रिय हैं क्योंकि अप्रैल महीने में विश्व बैंक की ग्लोबल फिनडेक्स रिपोर्ट आई थी, कई अखबारों में छपी है, इसके अनुसार 'भारत में पिछले साल बैंकों के 48 फीसदी खाते निष्क्रिय रहे, मतलब 12 महीने में न किसी ने पैसे डाले, न किसी ने निकाले. निष्क्रिय खातों के बारे में भारत दुनिया में नंबर एक है.'
नोटबंदी के दौरान जनधन खातों में कालाधन जमा होने की चर्चा हुई थी. उनसे कितना पैसा पकड़ाया है, ब्लॉग में संदिग्ध खातों की संख्या का ज़िक्र तो है, मगर बाकी डिटेल नहीं है. एनडीटीवी की साइट पर 18 सितंबर 2018 की एक खबर है. मुख्य सूचना आयुक्त ने भारतीय रिज़र्व बैंक को आदेश दिया था कि अलग-अलग बैंकों के जनधन खाते में नोटबंदी के समय के पुराने नोट कितने जमा हुए, उसके बारे में बताएं. इस बारे में हमारे पास अंतिम और ताज़ा सूचना नहीं है. पिछले साल के ब्लॉग में वित्त मंत्री ने ज़रूर कहा था कि बैंकों ने जो संदिग्ध खातों की संख्या रिपोर्ट की है, 2016-17 में 3,61,314 हो गई है. वित्तीय संस्थाओं और सेबी ने भी 1,11,789 संदिग्ध खातों की रिपोर्टिंग की है. इस साल के ब्लॉग में जेटली ने संदिग्ध खातों की संख्या 17.42 लाख बताई है.
काश यह भी बता देते कि इन संदिग्ध खातों में कितना पैसा जमा था, कितना पैसा टैक्स के रूप में आया और कौन-कौन लोग थे जिन्होंने इनमें पैसे जमा कराए. नोटबंदी के बाद एक नई चीज़ आई. बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न होने पर फीस लेना शुरू कर दिया. लाइव मिट की 5 अगस्त की रिपोर्ट आप देख सकते हैं. न्यूनतम बैलेंस के नाम पर बैंकों ने अपने खाताधारकों से 5000 करोड़ कमा लिए. एसबीआई ने सबसे अधिक कमाया. अगर बैंकों के पास कैश का फ्लो बढ़ गया तो फिर उन्हें यह कदम उठाने की ज़रूरत क्यों पड़ी. वित्त मंत्री ने अपने ब्लॉग में दावा तो यही किया है. जेटली लिखते हैं, 'जब कैश बाजार में घूमता है तो तो उसकी मिलकियत रिकॉर्ड में पता नहीं लगती, वह एनोनिमस होता है. जब बैंक में जाता है तो एकदम पता चल जाता है कि किसके खाते में गया है, उसका मालिक कौन है, उसको हिसाब किताब देना पड़ेगा. लगभग 18 लाख लोग जिन्होंने बड़ी रकम लगभग करोड़ों में या कई लाखों में बैंकों में डाली उनको आईडेंटिफाई किया गया, उनके डिपॉजिट उनकी आमदनी की तुलना में बहुत अधिक है तो आज उनको जवाबदेही देनी पड़ रही है और टैक्स देकर छुटकारा पा रहे हैं.'
वित्त मंत्री अपने ब्लॉग में भी दावा करते हैं कि इसके कारण बैंक में कैश ज्यादा आया जिससे कर्ज़ देने की उनकी क्षमता काफी बढ़ी. क्या वाकई बैंकों के कैश की क्षमता बढ़ी तो फिर यह क्यों कहा जा रहा है कि रिज़र्व बैंक के सरप्लस रिज़र्व पर इसलिए नज़र है क्योंकि बैंकों के पास कर्ज़ देने के लिए लिक्विडिटी यानी कैश नहीं है. फिर क्यों सबसे बड़ी गैर बैंकिंग वित्तीय संस्था आईएलएफएस डिफॉल्ट कर रही है, अपना लोन नहीं चुका रही है. फिर क्यों वित्त मंत्री बैंकों को पैसे दे रहे हैं क्योंकि वे फिर से खड़े हो सकें. इसकी जानकारी उनके ब्लॉग में नहीं है. नोटबंदी के बाद रिज़र्व बैंक और सरकार के बीच साढ़े तीन करोड़ के सरप्ल्स रिज़र्व को लेकर तनातनी क्यों है.
एक साल पहले वित्त मंत्री जेटली ने ब्लॉग में लिखा था कि नोटबंदी का मकसद था चलन में करेंसी की मात्रा को कम करना क्योंकि कैश की मात्रा बढ़ने से काला धन बढ़ जाता है. इस साल कहते हैं कि बगैर जाने आलोचना की जाती है कि सारा कैश सिस्टम में आ गया. करेंसी ज़ब्त करना नोटबंदी का मकसद नहीं था. औपचारिक अर्थव्यवस्था में आना और टैक्स देने पर मजबूर करना इसका मकसद था. कैश से डिजिटल की तरह भारत को ले जाने के लिए सिस्टम को झकझोरना ज़रूरी था.
करेंसी ज़ब्त करना मकसद नहीं था तो फिर करेंसी को अमान्य घोषित क्यों किया गया. डिजिटल की तरफ जाना मकसद था तो फिर आज पहले से कहीं ज़्यादा कैश चलन में क्यों है. क्या रुपे कार्ड, भीम एप के प्रसार के लिए नोटबंदी ही एकमात्र रास्ता थी. क्या दुनिया में डिजिटल पेमेंट और क्रेडिट कार्ड वहीं फैला जहां नोटबंदी आई. पिछले साल 8 नवंबर के अपने ब्लॉग में अरुण जेटली ने लिखा था कि 8 नवंबर 2016 को उस रोज़ सभी प्रकार की 17.77 लाख करोड़ मुद्रा चलन में थी. अब 2016 की तुलना में 3.89 लाख करोड़ की करेंसी चलन से कम हो गई है.'
2017 के ब्लॉग में वित्त मंत्री बता रहे हैं कि जितनी करेंसी चलन में थी उसकी तुलना में करीब चार लाख करोड़ की कमी आ गई. अब के आंकड़े बता रहे हैं कि करीब चार लाख करोड़ करेंसी ज़्यादा चलन में है. 10 जून 2018 की रिपोर्ट है बिजनेस लाइन की जिसमें कहा गया है कि 'लोगों के पास जो कैश है और बैंकों में जो कैश है दोनों की मात्रा नोटबंदी की तुलना में बहुत ज़्यादा हो गई है. 1 जून 2018 को चलन में मुद्रा की संख्या 19.3 लाख करोड़ थी जो नोटबंदी के 15.47 लाख करोड़ से ज्यादा है. नोटबंदी के समय की तुलना में करीब चार लाख करोड़ ज्‍यादा कैश सर्कुलेशन में है.
टिप्पणियां राहुल गांधी ने भी एक बयान जारी किया है. मनमोहन सिंह ने भी बयान जारी किया है. राहुल गांधी ने कहा है कि नोटबंदी एक त्रासदी थी. भारत ने अतीत में कई मुश्किलें देखी हैं. कई बार बाहरी ताकतों ने भारत को नुकसान पहुंचाया है. लेकिन हमारी त्रासदी के इतिहास में नोटबंदी का स्थान विशिष्ट है क्योंकि यह भीतर से पहुंचाया गया नुकसान था, आत्मघाती था. जिसने लाखों लोगों की ज़िंदगी तबाह कर दी. कई छोटे कारोबारियों का बिजनेस बर्बाद कर दिया.
कुछ न्यूज़ एंकर तो यह दावा कर रहे थे कि 2000 के नोट में चिप लगा है, नकली नोट कोई बना नहीं सकता और इसे छिपाने पर चिप की मदद से पकड़ लिया जाएगा. एंकर बता रही थीं कि नोट से सीधा सिग्नल इंकम टैक्स डिपार्टमेंट में चला जाएगा. यह कोई सामान्य गलती नहीं थी जो बोलते हुए या नज़र से चूक जाने के कारण हुई थी. रही बात जाली नोटों की मात्रा की तो हम आपको सिर्फ इतना बता दे रहे हैं कि 2017-18 में 2000 के नए नोटों का जाली नोट 2710 प्रतिशत अधिक हो गया, 500 के नए नोट का जाली रूप मात्र 4871 प्रतिशत हो गया है. यह रिज़र्व बैक का कहना है जिसे 29 अगस्त को हिन्दू ने छापा है. वित्त मंत्री के ब्लॉग में ये नहीं था. वित्त मंत्री ने यह भी बताया है कि कैसे जीएसटी का कलेक्शन बढ़ा है, इस पर भी अलग अलग दावे हैं लेकिन क्या जीएसटी नोटबंदी के बाद का अगला चरण था या नोटबंदी से अलग एक प्रक्रिया है जो तब भी लागू होती अगर नोटबंदी न होती. कहीं ऐसा तो नहीं कि वित्त मंत्री सरकार के अलग अलग कार्यों को नोटबंदी से मिला दे रहे हैं ताकि इसका फायदा बड़ा दिखे.
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