किसान ने 19 हजार किलोग्राम आलू बेचने के बाद कमाए सिर्फ 490 रुपये!

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किसान प्रदीप शर्मा अपने साथियों के साथ.

नई दिल्ली:

आपके यहां आलू किस रेट में मिल रहा है? यह सवाल हम इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि इस खबर को पढ़ने के बाद आपके मन में यही सवाल आएगा. आगरा के एक आलू किसान की कहानी पढ़िए, जिसे 19000 किलो आलू बेचने के बाद मिले केवल 490 रुपये.

दिल्ली के लुटियन जोन में किसान कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले से मिलने के लिए आगरा के नंगला नाथू गांव से आलू उत्पादक किसान प्रदीप शर्मा आए. वे लुटे पिटे से, मायूस बैठे अपने साथियों को अपना दर्द बताते दिखाई दिए. प्रदीप के मुताबिक करीब 19000 किलो आलू महाराष्ट्र की अकोला मंडी में बेचने के बाद उनके हाथ में सिर्फ 490 रुपये आए, इसलिए अब पीएम से मिलकर यह रकम सौंपने का इरादा है. एनडीटीवी इंडिया से बात करते हुए प्रदीप शर्मा ने कहा कि 'मैंने 19 टन आलू अकोला की मंडी में भेजा जिसके बदले में मुझे सिर्फ 490 रुपये मिले. अब मैं इसको लेकर प्रधानमंत्री जी के पास जाऊंगा और उनको यह दूंगा.'

किसान प्रदीप शर्मा आगरा के अपने गांव से दिल्ली केवल मौखिक दावा करने नहीं आए बल्कि सुबूत के साथ सरकारों के एमएसपी, डेढ़ गुना दाम जैसे हवाई दावों की हकीकत बताने आए हैं. आगरा में आलू के दाम नहीं मिल रहे थे इसलिए प्रदीप शर्मा ने महाराष्ट्र की अकोला मंडी में लगभग 19000 किलो आलू बेचा.

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प्रदीप शर्मा ने अकोला मंडी की आढ़ती की वह पर्ची दिखाई जिसमें सारा हिसाब लिखा था. इस रसीद के मुताबिक कुल 18828 किलो आलू 4 से 6 रुपये प्रति किलो के रेट पर बिका जिससे प्रदीप को 94677 रुपये मिलते. लेकिन आगरा से अकोला का माल ढुलाई का खर्च करीब 42,030 रुपये, कोल्ड स्टोरेज का किराया 46000 रुपये, उतराई 993.60 रुपये, कटाई व छंटाई 828 रुपये, दलाली 3790 रुपये, ड्राफ्ट कमीशन 100 रुपय, छंटाई मजदूरी 400 रुपये और सुतली के 45.90 रुपये के खर्च को जोड़ने के बाद प्रदीप के हाथ में केवल 490 रुपये ही बचे. यानी एक किलो आलू के जहां आप और हम शहरों में 10 से 20 रुपये चुका रहे हैं वहीं प्रदीप जैसे किसान को एक किलो आलू के 50 पैसे भी नहीं मिल रहे.

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अगर प्रदीप ने आलू अकोला न भेजा होता तो किराये के करीब 42000 रुपये बचते. यानी करीब सवा दो रुपये प्रति किलो की बचत होती. लेकिन प्रदीप शर्मा के मुताबिक 'दिल्ली की मंडी में पंजाब से आलू आ रहा है. ऐसे में तो महाराष्ट्र में आलू की अच्छी मंडी समझते थे. लेकिन वहां पर भी जाने क्या हो गया है.'

प्रदीप शर्मा के परिवार के पास 15 एकड़ की खेती है. इस पर परिवार के 14 सदस्य निर्भर हैं. बताते हैं कि बीते चार साल से कभी फसल खराब होने और खेती की खराब हालत को लेकर डीएम से लेकर सीएम और पीएम तक को चिट्ठी लिखी लेकिन कोई फायदा नहीं. एक बार तो जिलाधिकारी ने फसल खराब होने के चलते मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखकर पांच लाख रुपये का मुआवजा देने के लिए भी कहा, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

आलू उत्पादक समिति के महासचिव आमिर ने कहा कि प्रदीप शर्मा जैसे हजारों किसान आगरा में परेशान हैं और उनको सरकार की तरफ से तत्काल राहत दिए जाने की जरूरत है. हालत यह है कि लागत मिलना तो छोड़िए किसानों के पास कोल्ड स्टोरेज का भाड़ा देने का भी पैसा नहीं है.

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कहने को प्रदीप शर्मा की गिनती बड़े किसानों में होती है क्योंकि उनके परिवार के पास 15 एकड़ जमीन है. हम अक्सर मानते हैं कि बड़े किसान खेती में फायदे में होते हैं जबकि छोटे किसानों की ही हालत अक्सर खराब मानी जाती है. लेकिन इस कहानी से पता चलता है कि छोटे ही नहीं बल्कि देश में बड़े किसानों की हालत भी खस्ता है. यह कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि किसान जिए तो जिए कैसे?

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