एग्जिट पोल के आंकड़ों पर रवीश कुमार का विश्‍लेषण

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नई दिल्ली:

मोदी लहर मिल गई है. तीन महीने से न्यूज़ चैनल और ढेर सारे पत्रकार गांव गांव में मोदी लहर खोज रहे थे, बता रहे थे कि नहीं मिल रही है. जब नहीं मिली तो अंडर करंट ढूंढने लगे. आख़िरकार आज उन्हें मोदी लहर मिल गई है. शुक्रिया एग्ज़िट पोल का. एग्ज़िट पोल के नतीजे बता रहे हैं कि मोदी लहर धुंआधार है. हर सर्वे में बीजेपी प्लस की सरकार आराम से बन रही है. यह पूरी तरह आप पर है कि आप एग्ज़िट पोल पर भरोसा करते हैं या नहीं करते हैं. दोनों ही स्थितियों में एग्ज़िट पोल वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यह ज़रूर है कि 23 तारीख तक आप टीवी पर कुछ नहीं देख पाएंगे. यह शिकायत तभी करें जब आप 23 से पहले काफी कुछ देख पा रहे थे. बस दो बातें बताना चाहता हूं एक व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से है और एक आस्ट्रेलिया से हैं. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की यह बात पसंद आई कि टीवी की आवाज़ कम रखें, मित्र या परिजनों के आस-पास रहें, ढीला सूती कपड़ा पहनें, कूलर या एसी चालू रखें, सांस गहरी लें, बीच बीच में मुस्कुराते रहें, संसार मोह-माया है, इसका स्मरण करते रहें.

आज एग्ज़िट पोल का पहला दिन है. अभी से घबरा जाएंगे तो कैसे चलेगा. अभी तो नतीजों के दिन तक आपको इसका सामना करना है. याद कीजिए आपने ऐसे कितने एग्ज़िट पोल देखे हैं, उनका सामना किया है. ग़लत होने के बाद फिर से देखने की हिम्मत जुटाई है. इस आधार पर मैंने एग्ज़िट पोल को लेकर एक थ्योरी बनाई है. पेंटेट नहीं हुआ है और न ही नोबेल प्राइज़ मिला है. तो एग्ज़िट पोल दुनिया का पहला वैज्ञानिक काम है जो ग़लत होने के बाद भी ग़लत होने के लिए किया जाता है. एक थ्योरी और निकल कर आई है. वह यह है कि एग्ज़िट पोल में संख्या गलत हो सकती है मगर ट्रेंड सही हो जाता है. सभी पोल ग़लत नहीं होते हैं. कुछ पोल सही भी होते हैं. इस बार के सभी पोल में बीजेपी की सरकार बन रही है. तो ग़लत कौन सा पोल होगा, यह 23 को पता चलेगा. न्यूज़ चैनल एग्ज़िट पोल को लेकर काफी सीरीयस हैं. आस्ट्रेलिया में भी लोग सीरीयस थे. वहां जितने भी चुनाव के पहले ओपिनियन पोल्स हुए, 50 से अधिक वे सभी ग़लत निकले. एग्ज़िट पोल नहीं थे, प्री पोल्स सर्वे ग़लत निकले हैं.

मगर इस ग़लती का एक अंजाम बहुत अच्छा हुआ कि सर्वे के नतीजे देखकर लेबर पार्टी ने जश्न मना लिया कि वे जीत रहे हैं. जब रिज़ल्ट निकला तो जश्न मनाने का मौक़ा लिबरल पारटी को. लेकिन इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है. सर्वे और एग्जिट पोल हर जगह ग़लत होते हैं. अमरीका और ब्रिटेन जैसे मुल्क में एक ही दिन मतदान होता है और उसी दिन नतीजा आ जाता है. वहां एग्ज़िट पोल नहीं होता है. क्योंकि मतदान खत्म होने और नतीजे आने में समय का बेहद कम अंतर होता है. इसलिए मतदान के पहले कराए गए पोल को लेकर ही वहां के चैनलों में टाइम काटा जाता है.

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भारत एक जटिल मुल्क है. सीटों की संख्या भी अधिक है. कई बार यहां चुनाव आयोग भी फैक्टर हो जाता है तो किसी सर्वे में नहीं दिखता है. बगैर चुनाव आयोग के फैक्टर के कोई पोल कैसे सही हो सकता है. आप एग्ज़िट पोल के ग़लत होने से बिल्कुल न घबराएं. बल्कि स्टार्ट अप के तहत एग्ज़िट पोल का बिजनेस सेटअप करना चाहते हैं तो अवश्य करें. हमने देखा है कि कई चुनावों में कई सर्वे कंपनियों के सर्वे गलत निकले. मगर अगले चुनाव में उन सबको बिजनेस मिला है. इतना तगड़ा बिजनेस है जिसमें ग़लत साबित होने पर आपको एक और बार ग़लत होने का मौक़ा मिलता है. कई सारे एग्जिट पोल हैं. हम नहीं करते हैं लेकिन हम सबका औसत बताते हैं. 2014 में बीजेपी को अकेले 282 सीटें आई थीं. एनडीए को 336.

सुदर्शन न्यूज़, रिपब्लिक-सी वोटर, रिपब्लिक जन की बात, सुवर्णा न्यूज़ 24×7, साक्षी टीवी, न्यूज़ नेशन, सारे एग्ज़िट पोल एक तरफ अमित शाह का दावा एक तरफ. उन्होंने दावा किया है कि 300 सीटें आ रही हैं. आराम से सरकार बन रही है. यूपी के बारे में अमित शाह ने कहा था कि 73 से एक सीट कम नहीं आएगी बल्कि 74 भी हो सकता है. याद रखिए कि अमित शाह 2014 में जब प्रभारी थे तभी 72 सीटें आई थीं.

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2015 में अमित शाह ने बिहार के लिए मिशन 185 रखा था, बीजेपी को 99 सीटें आईं, 86 सीटें कम आईं. 2016 में बंगाल विधानसभा में मिशन 150 का लक्ष्य था, 3 सीटें आईं, 147 सीटें कम आईं. यूपी विधानसभा 2017 में मिशन 203 का लक्ष्य थ, 325 सीटें आ गई थीं. 122 सीटें अधिक आईं. 2017 में गुजरात विधानसभा में मिशन 150 का लक्ष्य था, बीजेपी को 99 सीटें आईं, 51 सीटें कम आईं. 2017 में हिमाचल प्रदेश में मिशन 50 प्लस का लक्ष्य था, 44 सीटें आईं, 6 सीटें कम आईं. 2018 में कर्नाटक विधानसभा में मिशन 150 था, बीजेपी को 104 सीटें आईं. 46 सीटें कम आईं.

आपने साइलेंट वोटर के बारे में काफी कुछ सुना था. साइलेंट वोटर क्या होता है. क्या यह डरा हुआ वोटर होता है या इसकी अपनी रणनीति होती है. अकादमी की दुनिया में कई दशक से इस पर रिसर्च होता रहा है. दुनिया भर में. क्या हम कभी साइलेंट वोटर को जान पाएंगे. यही वो साइलेंट वोटर है जो अचानक सारे आंकलन पलट देता है. बिहार मे लालू यादव इसे बक्से से निकला जिन्न कहते थे. लोकतंत्र में या तानाशाही में नागरिक कब साइलेंट हो जाता है इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं. अंग्रेज़ी में इस प्रक्रिया को 'pluralistic ignorance' के ज़रिए समझा गया है. मतलब नागरिक का बर्ताव पब्लिक में या भीड़ में उसके जैसा होता है लेकिन अकेले में वह ठीक उसका उल्टा सोचता है. इस बारे में एक किताब है आप पढ़ सकते हैं. Cristina बिक्यरी की The grammar of society. एक और किताब है Timur Kuran की Private Lies, Public Truths जिसमें पूर्वी यूरोप की कम्युनिस्ट सरकारों के पतन का अध्ययन किया गया है. सोवियत संघ का विघटन हुआ तो पूर्वी यूरोप के कई मुल्कों में कम्युनिस्ट सरकारें भरभरा कर गिर गईं. किसी को अंदाज़ा नहीं हुआ. क्योंकि सार्वजनिक रूप से जनता सरकार का समर्थन करती थी मगर अकेले में विरोध करती थी. हमने दोनों किताबें नहीं पढ़ी हैं मगर हमारे मित्र वत्सल ने बताया कि साइलेंट वोटर के बारे में दर्शकों को बताया जाना चाहिए. जब लोगों को पब्लिक में बोलने की आज़ादी नहीं होती, भय होता है तो वे चुप हो जाते हैं. यह दोनों ही अध्ययन तानाशाही सरकारों के हैं. भारत में लोकतंत्र है. लेकिन क्या भारत जैसे आजाद मुल्क में साइलेंट वोटर को अलग से समझा जा सकता है. उसे कैसे समझा जाना चाहिए.

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