अब केवल रोम नहीं, पूरा यूरोप जल रहा है…

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प्रतीकात्मक तस्वीर.

यह वह महाद्वीप है, जो दुनिया के कुल देशों के एक चौथाई (50) राष्ट्रों का भौगोलिक क्षेत्र है. इसके पास दुनिया की कुल आबादी के लगभग 11 प्रतिशत (75 करोड़) लोग हैं, जो एशिया महाद्वीप की दूसरी बड़ी जनसंख्या वाले हमारे देश का महज 58 फीसदी ही है. इस महाद्वीप के देशों ने ढाई-तीन सौ सालों तक उपनिवेशवाद के नाम से लगभग पूरी दुनिया पर शासन कर अकूत दौलत इकट्ठा की है. इस महाद्वीप के देश सीना खोलकर अपनी बहादुरी और वैभव का गान करते थे, तथा गर्दन ऐंठकर अपनी बुद्धिमत्ता का बखान करते हुए उसे दूसरों पर यह कहकर थोपते थे कि "हम तुम जैसे असभ्य लोगों पर एहसान कर रहे हैं…"

आज इसी महाद्वीप का सीना सुलग रहा है. इसके एक तिहाई से ज़्यादा देश अनेक तरह के आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों, परस्पर संघर्षों तथा अन्य संकटों से जूझ रहे हैं. यदि इन सभी देशों के आंदोलनों का एक कोलाज बना दिया जाए, तो उसमें उन देशों की संघर्ष गाथा सुनाई दे जाएगी, जिन पर इन्होंने निर्मम शासन किया था, और जिनके स्वायत्तता संबंधी विरोधों को ये राष्ट्रद्रोह कहकर सूलियों पर चढ़ा दिया करते थे.

आइए, कुछ ऐसे दृश्यों की एक झलक देखते हैं…

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ब्रेग्ज़िट को लेकर ब्रिटेन न केवल यूरोप में अपनी भूमिका को लेकर ही संघर्ष कर रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री इसे लेकर अपनी ही पार्टी के सांसदों साथ जूझ रही हैं. उनकी अपनी ही पार्टी के लोगों ने प्रधानमंत्री टेरेसा मे के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया. हालांकि अविश्वास प्रस्ताव तो पारित नहीं हो सका, लेकिन इसके कारण उनकी स्थिति न केवल उनकी अपनी कंज़रवेटिव पार्टी में कमज़ोर हो गई, बल्कि दुनिया की निगाहों में भी.

दूसरा बड़ा उपनिवेशवादी राज्य फ्रांस पिछले लगभग डेढ़ महीनों से पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स बढ़ाने तथा कई अन्य मुद्दों को लेकर हिंसक विरोधों से जूझ रहा है. सोशल मीडिया की एक छोटी सी मुहिम से इसकी शुरुआत हुई थी और लाखों लोग पीली बनियान (येलो वेस्ट) पहनकर विश्व कला की नगरी पेरिस की सड़कों पर जमा हो गए. इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक हताशा और गरीब परिवार के राजनीतिक अविश्वास को अभिव्यक्त करना है.

हंगरी की संसद ने 13 दिसंबर को नया श्रम कानून क्या पारित किया कि उसके विरोध में लोग इस कंपकंपा देने वाली सर्दियों में भी रात-दिन प्रदर्शन कर रहे हैं.

सर्बिया में लोग सरकार की हिंसा के विरोध में हिंसा पर उतर आए हैं. प्रदर्शनकारी विपक्ष के नेता बोर्को पर हुए जानलेवा हमले को सरकार की साजिश बता रहे हैं.

अल्बानिया के विश्वविद्यालयों में वार्षिक फीस 160 से 2,560 यूरो तक है. जबकि वहां की औसत आय 350 यूरो प्रतिमाह है. फिलहाल वहां के छात्र सस्ती शिक्षा की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. छात्रों ने देशभर के राज्यमार्गों को जाम कर रखा है.

जर्मनी में पर्यावरण को बचाने को लेकर लगातार आंदोलन हो रहे हैं. इसका नेतृत्व वहां की ग्रीन पार्टी कर रही है. इन आंदोलनों के कारण कुछ ही दिनों में इस पार्टी की लोकप्रियता में 10 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है.

इटली की इन दिनों यूरोपीय संघ के साथ कशमकश जारी है. इटली की लोकप्रियतावादी पार्टी ने अपनी जनता से बेरोज़गारों को न्यूनतम आय देने जैसे लोक लुभावने वादे किए थे. फलस्वरूप यूरोपीय संघ ने इटली के खिलाफ एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उससे अपने बजट की समीक्षा करने को कहा. पोलैंड और हंगरी की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हुए हमलों ने भी यूरोपीय संघ की उदारवादी बुनियाद के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है.

केरोलोनिया तो पिछले दो साल से स्पेन से अलग होने के लिए लगातार जूझ रहा है.

कुल मिलाकर बात यह कि जिस महाद्वीप के देश अपने उदारवादी लोकतंत्र का डंका पीटते हैं, मुक्त बाज़ार व्यवस्था का राग अलापते हैं, अन्य देशों को उनकी आदिम वृत्तियों के लिए फटकारते हैं, वे आज स्वयं अपने ही देश में इन मामलों के लिए कठघरे में खड़े हैं…?

यहां एक बहुत चिंता पैदा करने वाला प्रश्न यह खड़ा होता है कि फिर किया क्या जाए…? ज़ाहिर है., आंखें बंद कर विकसित देशों की व्यवस्था का अनुसरण एवं उनके विचारों का एकतरफा गुणगान दुनिया के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है.

टिप्पणियां

डॉ. विजय अग्रवाल वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं…

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